डा. सुधांशु कुमार

आज अतिवाद के दौर में अधिकांश ‘मीडिया हाउस’ पूंजीवाद , सत्ता एवं विदेशी विघटनकारी शक्तियों के इशारों पर नाच रहे हैं ! पक्ष और विपक्ष के झमेले से दूर जिनके कंधे पर निष्पक्षता के साथ चौथे स्तंभ की गरिमा बचाए रखने की जिम्मेदारी थी, वे आज पक्ष एवं विपक्ष मीडिया के रूप में खुद को स्थापित कर चुके हैं। वर्तमान में सामान्य बुद्धि लब्धि का व्यक्ति भी मीडिया को सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा बता सकता है जबकि उसका मूल्य निष्पक्षता में है। अतिवाद के दौर से गुजरते हुए आज जरूरत है कि वह निष्पक्षता के साथ अपने मूल्यों की रक्षा करे। कबीरधर्मा बने। सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाला वह चाहे जो कोई भी हो, कबीर की तरह उसकी परतों को बेबाकी के साथ खोले, हो सके तो प्रचंड प्रहार भी करे। जहां कहीं भी अन्याय, जुल्म, शोषण और समाज के अंतिम पायदान पर पड़े हुए की पीड़ा हो, बिना लाग लपेट के वह उसकी वकालत करे। उनके लिए वह व्यवस्था से दो-दो हाथ करे।

विनय तरुण स्मृति कार्यक्रम 2018

आज यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि आज की पत्रकारिता भारतेंदु हरिश्चंद्र , गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी एवं महात्मा गांधी जैसे पत्रकारीय धर्म निभाने वाले स्तंभों के बतलाए मार्ग से भटक कर पूंजीपति घरानों की रखैल और विभिन्न दलों के दलदल में आकंठ धंसी दिखती है। उनके आदर्श महात्मा गांधी और माखनलाल चतुर्वेदी नहीं रहे, जिन्होंने अपनी राष्ट्रसेवा का सबसे बड़ा माध्यम पत्रकारिता को माना। माखनलाल चतुर्वेदी ने मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ” मैं पहले से ही शिक्षक और साहित्यकार होने के नाते ‘देवगुरु’ के पद पर आसीन हूं, मेरी पदावनति करके तुम मुझे देवराज के पद पर बिठाना चाहते हो ? यह मुझे सर्वथा अस्वीकार्य है।’ उनके इनकार के बाद ही रविशंकर शुक्ल को नवगठित मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। यह घटना उन तथाकथित पत्रकारों के लिए एक सीख है, जिनकी आत्मा सिक्कों की खनक के ताबूत में दफन हो चुकी है, जिनकी जिम्मेदारी तो थी गांव-जवार और देश के हाशिए पर पड़े लोगों का स्वर बनने की, लेकिन उन्होंने खुद को सत्ता प्रतिष्ठान एवं पूंजीपतियों के स्वर्ण पिंजर का रटंत तोता बनाना ही बेहतर समझा !!

इन विषम स्थितियों में देश की मूलभूत समस्याओं की पड़ताल करते हुए तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में सिमट रहे गांव, सिसक रहे किसान और उपेक्षित बेरोजगार युवाओं के चेहरे पर पसरे सन्नाटे से संवाद स्थापित करता हुआ ‘बदलाव’ मंच पत्रकारिता के क्षेत्र में छोटी सी ही सही सार्थक दस्तक दे रहा है। ‘बदलाव’ परिवार के इसी अभियान की एक सार्थक पहल सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों पर रिपोर्टों का क्रम रहा ! इसके अंतर्गत देश के विभिन्न हिस्सों के उन गांवों और पंचायतों की रपट प्रकाशित की गई जिन्हें सांसदों द्वारा गोद लिया गया। बदलाव परिवार द्वारा उनके गहन अध्ययनोपरांत उनमें से सर्वश्रेष्ठ ‘रपट’ के चयन की अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी जो किसी चुनौती से कम नहीं थी। उनके गहन अनुशीलनोपरांत तुलसी दास स्मरण हो आए , ” को बड़ छोट कहत अपराधू ” ! प्रथम दृष्टया लगभग सभी रपट एक से बढ़कर एक ! चयन का संकट ! इस संकट से निपटने के लिए मैंने पाँच बिंदुओं – भाषा, शैली, संवाद, संबंधित तसवीर और वर्तनी – को आधार बनाया। प्रत्येक बिंदु के लिए दस-दस अंक निर्धारित किए।

इस निष्यंदन प्रक्रिया के उपरांत तीन-चार रपट अग्रिम पंक्ति में आ खड़ी हुईं ! इनमें प्रथम स्थान पर दो एवं दूसरे और तृतीय स्थान पर एक एक रपट ने स्थान प्राप्त किया। इनमें से किसी की शैली अद्वितीय तो किसी की भाषा और वर्तनी अनुपम, कोई संवाद में सर्वोपरि है, तो किसी की तसवीर ही सारी दास्तान कह सुनाती है। किंतु इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं है कि जिन्हें अग्रिम सूची में शामिल नहीं किया जा सका , वे खारिज हो गए ! उन्हें कतई खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि ‘बदलाव’ मंच के इस मुहिम के अंतर्गत आदर्श ग्राम के ग्राउंड रिपोर्ट देने में सभी ने काफी मेहनत की है।  और सभी रिपोर्ट दो-चार अंकों के फासले पर ही उपस्थित हैं। सभी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों की परत -दर-परत सच्चाई का उद्घाटन किया है।

इन रिपोर्टों से गुजरते हुए मैंने पाया कि जिन गांवों को माननीयों ने चार वर्ष पहले अपनी-अपनी गोद में उठाया था, वे आज भी ‘गोदी के लड़िका’ ही हैं जो चार वर्षों में भी अपने-अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहे हैं। सांसद महोदय की सांस सांसत में है कि अभी तक उनकी गोदी का गांव चलना तो दूर , खड़ा भी नहीं हो पाता है , वह जैसे ही उठने की कोशिश करता है , ‘धम्म’ की ध्वनि के साथ गिर जाता है ! अब माननीय करें तो क्या करें ? खैर ! इस मुहिम के सभी सदस्य साधुवाद के पात्र हैं, जिन्होंने फलक से बरस रही सूरज की तपिश को झुठलाते हुए इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाया। उनके लिए किसी की दो पंक्तियां –

फलक को जिद है जहां बिजलियाँ गिराने की ,
हमारी जिद है वहीं आसियां बनाने की ।

पतनोन्मुख पत्रकारिता के इस दौर में मैं ‘बदलाव’ परिवार के उन सभी सदस्यों और ‘समय के पहरुए’ को कोटिशः धन्यवाद प्रेषित करता हूं जिन्होंने मूल्यपरक पत्रकारिता की दिशा में कदम बढ़ाने की जिद ठान रखी है। जूली जयश्री (दामोदर पुर/हुकुमदेव नारायण यादव) , विनीता सिंह (ददरी/अनुप्रिया पटेल) , ब्रह्मानंद ठाकुर (पिलखी/अनिल सहनी) , सत्येंद्र कुमार यादव (धरौहरा , पयासी /कलराज मिश्र) , कीर्ति दीक्षित (पिपरामाफ /पुष्पेंद्र सिंह ) , जयंत कुमार ( बेंती /राजनाथ सिंह), संदीप कुमार सिंह (दहियारी पंचायत/चिराग पासवान)  और गोविंद सिंह (रानीपतरा /संतोष कुशवाहा) ने आदर्श गांव का आंखों देखा हाल बयां किया और उनकी रपट इस कड़ी में हमारे बीच आई।  अंत में आप सभी पाठकों के लिए ‘बदलाव’ की ओर से दुष्यंत कुमार की चंद पंक्तियां –

‘हो गयी है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए….।’


डॉ सुधांशु कुमार- लेखक सिमुलतला आवासीय विद्यालय में अध्यापक हैं। भदई, मुजफ्फरपुर, बिहार के निवासी। मोबाइल नंबर- 7979862250 पर आप इनसे संपर्क कर सकते हैं। आपका व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘नारद कमीशन’ प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में है।

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