suaataकीर्ति दीक्षित

परम्पराएं, custom, rituals जैसे शब्द धरती के किसी भी कोने से खड़े होकर बोलें तो इनकी समृधि में भारत का नाम सबसे पहले आएगा, भारत ही ऐसा देश है जहाँ देवता पूजे जाते हैं तो राक्षस भी, स्त्री भी पूजी जाती है तो पुरुष भी, सब कुछ समानांतर चलता है बुंदेलखंड की ऐसी ही एक अनोखी परंपरा है जहाँ शक्ति पूजा के दिनों में अविवाहित कन्यायें सुआटा नामक  राक्षस की पूजा करती हैं, उत्सव मनाती हैं, नाचती हैं बालिकाएं सुआटा, झिंझिया गाती नाचती हैं तो बालक टेसू का द्वारे द्वारे जाकर मंचन करते हैं , विभिन्न प्रकार के लोकगीतों से सारा वातावरण अनुपम सौंदर्य की प्रतिकृति सा प्रतीत होता है

ऐसा माना जाता है प्राचीनकाल में एक सुआटा नामक राक्षस था जो अविवाहित बालिकाओं को उठा ले जाता था, उस राक्षस से बचने के लिए लड़कियों ने भगवान कृष्ण की अराधना की। लड़कियों की पूजा से खुश होकर भगवान कृष्ण ने पूछा कि उन्हें क्या चाहिए । लड़कियों ने कृष्ण से बताया कि सुआटा नाम का राक्षस 16 हजार कुंवारी लड़कियों से एक साथ शादी करना चाहता है, इसलिए वो कुंवारी कन्याओं को उठा ले जाता है। लड़कयों की व्यथा सुनने के बाद भगवान कृष्ण ने वरदान दिया कि टेसू नाम का एक वीर योद्धा आएगा और सुआटा का वद्ध करेगा। एक दिन सुआटा हिमाचल प्रदेश के राजा की बेटी झिंझिया को उठा ले गया । सुआटा झिंझिया समेत 16 हजार कुंवारी कन्याओं से शादी करने की तैयारी कर रहा था तभी टेसू आया और उसको मार डाला । लेकिन मरने से पहले सुआटा ने भगवान की अराधना की और कुंवारी कन्याओं से पांव पखारने का वरदान मांगा । जो कन्याएं शादी से पहले उसका पांव पखारेंगी, पूजा करेंगी उन्हें वो परेशान नहीं करेगा । भगवान ने सुआटा की ये मांगे पूरी कर दी । तभी से लड़कियां उसकी पूजा कर उसे प्रसन्न करती हैं ताकि वह उनको परेशान करे  

फोटो- हिमांशु मोहन त्रिपाठी
फोटो- हिमांशु मोहन त्रिपाठी

इस पूरी पूजा के दौरान बालिकाएं विभिन्न प्रकार के लोकगीतों और नृत्यों के साथ उस राक्षस का मान मनुव्वल करती थी। सुआटा की पूजा के साथ ही बुंदेलखंड में शादी-विवाह के कार्यक्रम शुरू होते हैं । ये परंपरा आज भी बुंदेलखंड में जीवित है, यह उत्सव अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होकर नवमी तक चलता है इस अवसर पर बालिकाएं सुआटा की मिट्टी की प्रतिमा दीवार पर बनाती हैं, कांच की कौड़ियों से इस चित्र को सजाया संवारा जाता है, रंग बिरंगे चौक पूरे जाते हैं, अन्तिम दिन टेसू और झिंझिया का विवाह होता है और विवाह के बाद सुआटा का अंग प्रत्यंग तोड़कर फेक दिया जाता है, उसकी कौड़ियां लेकर लोग अपनी तिजोरी में रखते हैं, इससे धन धान बढ़ने का शगुन माना जाता है, सुआटा को मनाने के लिए गए जाने वाले  ये लोकगीत सुआटा के नाम से जाने जाते हैं

उठोउठो सूरजमल भइया, भोर भये नारे सुआटा

मलिनी खड़ी है तेरे द्वारे, इन्दलगढ़ की मलिनी ना रे सुआटा

हाटई हाट बिकाए ।।

टेसू और झिंझिया के विवाह के सम्बन्ध में  मान्यता है कि टेसू नामक एक वीर योद्धा ने सुआटा राक्षस को मार गिराया था  और उसके चंगुल से छुड़ाकर झिंझिया से विवाह कर लिया, अतः तबसे झिंझिया गायन और नृत्य की परंपरा चली रही है , शारदीय नवरात्रि में अष्टमी से पूर्णिमा की रात्रि तक झिंझिया उत्सव मनाया जाता है, इस उत्सव में महिलाएं मटकी में कई छेद करके उसमें दीपक रखती हैं, इस झिलमिल प्रकाश से प्रकाशित मटकी नर्तकी अपने सिर पर रखकर नृत्य करती है और उसके चारों ओर थाप और वाद्य यंत्रों की धुन में झिंझिया गीत गाये जाते हैं, बालिकायें आशीर्वाद के अक्षत घरों में डालती हैं और झिंझिया गाती हैं

suaata5झिंझिया पूंछतपूंछत आये हैं नारे सुआटा

कौन बड़ी रे तोरी पीर

पौरन बैठे भइया पहिरिया नारे सुआटा, खिरकिन बैठे कोतवाल

हरौ दुपट्टा नील को नारे सुआटा कौन बड़ी री तोरी पीर

इसी उत्सव में बालक वर्ग सुआटा राक्षस और वीर योद्धा टेसू के बीच के संवादों का मंचन करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं गांव के घरों के द्वारों पर जाकर इस प्रकार टेसू का गायन करते हैं 

टेसू आए वीरन वीर, हाथ लिए सोने के तीर

नौ मन पीसे दस मन खाएं घरघर टेसू मांगन जाएं।।

राक्षस सुआटा के पुतले के साथ बुंदलेखंड की कन्याएं ।
राक्षस सुआटा के पुतले के साथ बुंदलेखंड की कन्याएं ।

बड़ो दुलारौ बड़ी अटरियां, बड़ो जान कें टेसू आए

मैड़नमैड़न रासो फूले वन फूले कचनार,

सदा बखरियां ऐसें फूलें जी में हाथी झुके दुआर ।।

ऐसी अनोखी प्रथाएं ही हमें अनोखा बनाती हैं, इनमें एक ओर जहाँ लोकसाहित्य का सौन्दर्य दिखाई पड़ता है तो दूसरी और सामाजिक सुदृढ़ता के आकाश प्रमाणित होते हैं, राक्षस की पूजा में भी सामाजिक सौहार्द और प्रेम की पराकाष्ठाएं छुई जाती हैं और यही विशेषताएं भारत को भारत बनाती  हैं


कीर्ति दीक्षित। उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जिले के राठ की निवासी। इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट रहीं। पांच साल तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में नौकरी की। वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता। जीवन को कामयाब बनाने से ज़्यादा उसकी सार्थकता की संभावनाएं तलाशने में यकीन रखती हैं कीर्ति।