पुष्यमित्र


 

आज पीएम नरेंद्र मोदी मोतिहारी जाने वाले हैं और वहां से ‘सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह’ अभियान की शुरुआत करेंगे. इसके लिए पूरे देश से हजारों स्वच्छता दूत कई दिनों से बिहार आये हुए हैं और जगह-जगह लोगों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे हैं. आज से शुरू होने वाला यह अभियान दो अक्टूबर, 2019 तक चलेगा और इस अवधि में पूरे भारत को खुले में शौचमुक्त करने की योजना है. कहा जा रहा है कि एक तरह से यह मोदी द्वारा 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान की शुरुआत होगी.

10 अप्रैल 1917 को चंपारण से ही गांधी ने सत्याग्रह की शुरुआत की थी, इसलिए चंपारण को हर अभियान का शुरुआती बिंदु मान लिया गया है. आंदोलनकारी भी अपने अभियान की शुरुआत चंपारण से करते हैं और सरकार भी.

सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह अभियान संभवतः गांधी के उस अभियान का अनुसरण है, जब नवबंर, 1917 में सर्वेंट सोसाइटी ऑफ इंडिया के और अन्य संस्थाओं के कई कार्यकर्ताओं के साथ उन्होंने चंपारण में शिक्षा, स्वास्थ्य और सेहत का अभियान शुरू किया था. इसके तहत यहां तीन स्कूल खुले थे. जो विद्यालय सह आश्रम थे. यहां बच्चों को पढ़ाया भी जाता था और आस-पास के गांवों में यहां से स्वच्छता अभियान भी चलाया जाता था, सेहत का भी इंतजाम होता था. क्योंकि गांधी ने यहां अपने लंबे प्रवास के दौरान यह महसूस किया था कि शिक्षा, स्वच्छता और सेहत के अभाव से ही यहां के लोगों की यह हालत है. गरीबी है और कोई भी इनका शोषण कर लेता है. हालांकि बाद में एक महिला ने उनकी इस सोच को बदल दिया.
उस महिला की साड़ी काफी मैली रहती थी, लेकिन वह उसे कभी बदलती नहीं थी. गांधी उसकी मैली साड़ी देखते और खिन्न होते. सोचते इस महिला में सफाई का संस्कार नहीं है. एक रोज उन्होंने कस्तूरबा के जरिये उस महिला से कहवाया कि वे रोज मैली साड़ी क्यों पहनती हैं. तब वह महिला कस्तूरबा को अपने घर ले गयी और कहा कि देखिये, यहां कोई दूसरी साड़ी है? जब मेरे पास दूसरी साड़ी ही नहीं है, तो मैं इसे बदलूं कैसे ? फिर गांधी को समझ आया कि असली वजह शिक्षा, स्वास्थ्य और सेहत नहीं, गरीबी और अभाव है. जैसा मैला आंचल के डॉ. प्रशांत को समझ आय़ा, जब वे मलेरिया को खत्म करने के लिए मेरीगंज गये थे. तब गांधी ने तय किया कि वे तब तक एक ही कपड़ा पहनेंगे जब तक पूरे देश के लोगों के पास पहनने के लिए दूसरा वस्त्र न हो. फिर पूरी गभीरता से उन्होंने चरखा को अपनाया और इसे बदलाव का हथियार बनाया.

फोटो- स्वच्छ भारत के ट्विटर वॉल से। चंपारण में स्वच्छाग्रही लोगों को समझाते हुए ।

तो बात यह हुई कि महज शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई को बदलाव का हथियार मानने वाले गांधी ने चंपारण से ही सीख लिया कि गरीबी को दूर करना सबसे जरूरी है और असली सवाल अभाव का है. इस प्रसंग को समझना उन लोगों के लिए बहुत जरूरी है, जो सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह के अभियान की शुरुआत करने चंपारण पहुंच रहे हैं. कि एक गरीब-भूमिहीन आबादी के लिए महज स्वच्छता का संदेश कितना कोरा और कागजी होता है. सरकारी तंत्र की अपनी विवशता होती है, सीमा होती है. वह गरीबी के सवाल पर बात नहीं कर सकती, भूमिहीनता के सवाल पर बात नहीं कर सकती. किसानों के मसले पर बात नहीं कर सकती. यहां तक कि शिक्षा और स्वास्थ्य के मसले पर भी बात नहीं कर सकती. क्योंकि इसके लिए पहले उसे काम करना होगा. अपना ही ट्रैक रिकार्ड सुधारना होगा. क्योंकि आजादी के 70 साल बाद भी कोई सरकार इन मसलों का हल निकाल नहीं पायी. दरअसल सरकारों की कभी मंशा भी नहीं रही इन सवालों के समाधान की. पांच साल के लिए चुनी गयी सरकारों का ज्यादातर वक्त अपनी पार्टी को चंदा देने वालों को खुश करने में, पार्टी फंड मजबूत करने में बीत जाता है. और जब चुनाव आता है कि उसके पास दिखावे के कुछ अभियान चला देने का ही वक्त रह जाता है. वह कर्जमाफी की घोषणा कर देती है, वह स्वास्थ्य बीमा का चुग्गा फेंक देती है, वह सफाई से दुनिया बदलने का नारा लगा देती है. वह जमीनी सच्चाइयों से नहीं उलझती. उनसे दूरी बनाकर रहती है.

स्वच्छता की शपथ लेते चंपारण के लोग ।

आज चंपारण में जो होगा वह इसी का उदाहरण होगा. वहां उन भूमिहीनों का सवाल नहीं उठेगा जिनके हिस्से की जमीन पर दशकों से चीनी मिल मालिक और बड़े भूपति काबिज हैं. हजारों एकड़ के उन फार्म हाउसों पर सवाल नहीं उठेंगे, जो सीलिंग एक्ट को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं. उन परचाधारियों की बात नहीं की जायेगी, जिन्हें जमीन के स्वामित्व का सर्टिफिकेट तो दे दिया गया है, मगर सरकार उन्हें उनकी जमीन पर कब्जा नहीं दिला पा रही. उन गन्ना किसानों का सवाल उपेक्षित ही रहेगा, जिनकी फसल का दस-दस साल का बकाया चीनी मिलों के पास है. जिसकी वजह से ऐन 10 अप्रैल, 2017 को उसी मोतिहारी शहर में दो किसानों ने आत्मदाह कर लिया था. गांधी द्वारा खोले गये उन बुनियादी विद्यालयों का सवाल नहीं उठेगा जिन्हें डीएवी को लीज पर दिये जाने की तैयारी चल रही है. उस कोर्ट ऑफ वार्ड का सवाल नहीं उठेगा जहां सरकार पिछले सवा सौ सालों से किसी जमींदार की तरह व्यवहार कर रही है, इसी कोर्ट ऑफ वार्ड की वजह से चंपारण की एक-एक इंच जमीन पर नील प्लांटरों का कब्जा हुआ था. वहां न किसानी का सवाल उठेगा, न बेरोजगारी का, न महंगाई का और न ही भ्रष्टाचार का. वहां सिर्फ स्वच्छता का सवाल उठेगा, क्योंकि यह काम जनता को करना है, सरकार को नहीं.

स्वच्छता की ब्रांडिंग होगी, शो-केसिंग होगी, अच्छे बैनर-पोस्टर के बीच मोदी की लच्छेदार बोली सुनने को मिलेगी और उन रंगीन पोस्टरों के बीच चंपारण के सारे सवालों को ढंकने की कोशिश होगी. मगर यह होना नहीं चाहिए. इसलिए हम इन मसलों को जनता के सवाल की तरह पेश करेंगे. आपको याद होगा कि पिछले दिनों मैंने एक पुस्तिका लिखी थी, चंपारण-गांधी के बाद. उस पुस्तिका को कई लोगों को ईमेल से भेजा था. कई मित्रों ने इसे पढ़ा और अपनी टिप्पणी दी. मित्रों ने लेखक के मानदेय की राशि भी भेजी. अब मेरी योजना इस पुस्तक को धारावाहिक स्वरूप में आपके सामने पेश करने की है. अगले कुछ दिनों में इसे मैं अलग-अलग तरीके से इसे पोस्ट करूंगा ताकि आप चंपारण के असली सवालों को समझ सकें. 


PUSHYA PROFILE-1पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।

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