ये बात अक्सर कही जाती है, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जैसे ये लकड़ी है। यूँ तो यह किसी पेड़ की शाखा है, लेकिन इस तरह की शाखा को हमारे यहां ‘हिंगोश’ कहते हैं। ये एक जुगाड़ है, जिसका इस्तेमाल गांव में ऊँचे पेड़ों से फल इत्यादि तोड़ने के लिए किया जाता है। मतलब जहां आपका हाथ नहीँ पहुँचता, वहां ‘हिंगोश’ पहुँच जाता है।

मैंने इस ‘हिंगोश’ से अपने छोटे से बगीचे से माल्टा (संतरा), पपीते और कागजी (नींबू) तोड़े। इस’हिंगोश’ का किस्सा दिलचस्प है। पड़ोस के कुछ शरारती बच्चों ने हमारे अखरोट के पेड़ से अखरोट चोरी करने के लिए ये ‘हिंगोश’ लटकाया हुआ था। वो छुप-छुप के जाने कब से हमारे अखरोटों पे डाका डाल रहे थे। एक दिन मेरी माँ ने ये ‘हिंगोश’ ज़ब्त कर लिया।

मेरी माँ कई बार पड़ोस में आवाज़ लगाके कह चुकी है कि अपना ‘हिंगोश’ वापस ले जाओ। मगर ‘गुनाह’ में इस्तेमाल हुआ ‘हथियार’ बरामद होने के बाद अब कोई भी ‘हिंगोश’ पर क्लेम करने आगे नहीँ आ रहा है। अपराधबोध भी क्या चीज़ है।

इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है : देवप्रयाग और ऋषिकेश के बीच हरे पानी की लकीर सी गंगा।

मनु पंवार, वरिष्ठ पत्रकार

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