राकेश कायस्थ

हिंसा, हाहाकार और बनारस में लड़कियों की पिटाई की ख़बरों से मन बहुत अशांत था। नज़र टेबल पर रखी एक किताब पर पड़ी, जिसे मैंने दो महीने पहले खत्म किया था। कई बार सोचा कि उस पर कुछ लिखूं, लेकिन वक्त नहीं निकाल पाया। किताब का नाम है, जल थल मल। किताब गांधी शांति प्रतिष्ठान ने छापी है और लेखक का नाम अंदर कहीं जाकर ढूंढने पर मिलता है। लेखक है- सोपान जोशी।

सोपान जोशी

लेखक के नाम के ठीक नीचे लिखा है— इस पुस्तक की किसी भी सामग्री का उपयोग किसी भी रूप में किया जा सकता है, स्रोत का उल्लेख कर देंगे तो अच्छा लगेगा। दुनिया में ऐसी बहुत कम किताबे होंगी जिसके लेखक यह दावा करें कि मैने जो कुछ लिया है, समाज से लिया है, इसलिए आप इसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं।  जल थल मल को पिछले दस साल में पढ़ी गई अपनी कुछ पसंदीदा किताबों में रखना चाहूंगा। विज्ञान, पर्यावरण, दर्शन और समाजशास्त्र के अलग-अलग सिरे जिस खूबसूरती से एक दूसरे से इस किताब में आकर मिलते हैं, वह वाकई कमाल है। पर्यावरण के सवाल को सहज लेकिन समग्र रूप से देखने का एक अनोखा नज़रिया देती है यह किताब।

किताब यह बताती है कि हम जिसे अज्ञान समझते हैं, दरअसल वही असली ज्ञान है। इंसान अपनी परंपरागत समझ से अपनी ज़मीन, अपने जल स्रोत और अपने पेड़ किस तरह बचाता आया है, इससे जुड़ी कई विलक्षण कहानियां इस किताब में हैं। ऐसी एक कहानी पूर्वी कोलकाता की जलभूमि की है। कोलकाता के बड़े हिस्से के सीवर का पानी यहां आकर जमा होता है। गंदगी इतनी कि रिहाइशी बस्तियां इससे बहुत दूर बसाई गई हैं। लेकिन यहां आकर बसे मछुआरों ने अपने परंपरागत ज्ञान से यह साबित कर दिया कि मैला पानी भी वरदान बन सकता है। कचरे से खाद बनाकर खेती करने और मछली पालन से ना सिर्फ यहां का पर्यावरण बदला बल्कि हज़ारों लोगो को रोजगार भी मिला। मछुआरों के परंपरागत ज्ञान और ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स को बिल्डरों से बचाकर उसे संयुक्त राष्ट्र से मान्यता दिलाने की लड़ाई लड़ने वाले सरकारी अधिकारी ध्रुबोज्योति घोष के संघर्ष की कहानी अपने आप में एक बेहतरीन फिल्म का कंटेट है।

चकित कर देने वाली बहुत सी बाते हैं, इस किताब में। भारत में वेस्ट मैनजमेंट के वैज्ञानिक, आर्थिक और समाजशास्त्रीय पहलुओं पर यह किताब एक अलग रौशनी डालती है। सोपान जोशी ने चर्चित पर्यावरणविद और अब भी खरे हैं तालाब’ जैसी कालजयी कृति के लेखक अनुपम मिश्र के साथ लंबे समय तक काम किया है। सोपान का ज्यादातर लेखन अंग्रेजी में है। लेकिन यह किताब उन्होंने बहुत आसान हिंदी में लिखी है। मैंने पुस्तक के एक बहुत छोटे से हिस्से का जिक्र किया है। यह एक बहुत बड़े फलक की किताब है। आखिर में दी गई संदर्भ सूची पर नज़र डालेंगे तो पता चलेगा कि इसे लिखने में कितनी मेहनत की गई है। विषय गंभीर है, लेकिन किताब दिलचस्प है। किताब ऑन लाइन मंगाई जा सकती है। अगर कुछ अच्छा पढ़ना चाहते हैं तो जल थल मल ज़रूर पढ़िये।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

संबंधित समाचार