ब्रह्मानन्द ठाकुर

 महा शिवरात्रि यानी आदिम समाजवादी परिवार के मुखिया शिव के विवाह का दिन। हां, आदिम समाजवादी व्यवस्था मतलब जहां परस्पर दो विरोधी प्रवृतियों वाले जीव-जंतु साथ रहा करते थे, बिना किसी को नुकसान पहुंचाए। वहां सर्प था तो मोर भी थे। शिव का प्रिय वाहन नन्दी (बसहा) था तो व्याघ्र भी। कहीं किसी को किसी से भय नहीं। इस मायने में शिव समाजवादी समाजव्यवस्था  के आदि पुरुष माने जाते हैं । आज का दिन उन्हीं के विवाह का दिन है। आज ही के दिन शिव का पार्वती से विवाह हुआ था। वही पार्वती, जिसकी प्रतिज्ञा थी ‘ वरौं शम्भु न त रहौं कुमारी। ‘माता मैना की घोर असहमति के बाबजूद पार्वती ने बौराहा शिव का वरण किया था, एक नहीं, दूसरे जन्म में भी। मसलन जाति, धर्म के बंधन से मुक्त समाज के निर्माण का ये विवाद एक प्राचीन उदाहरण भी है । विस्तार से यह वर्णन धर्मग्रंथों में है ।

विद्वानों द्वारा किए गये शोध से यह तथ्य प्रकाश में आ चुका है कि देवराज इन्द्र के राजतंत्र  के विरुद्ध शिव ने सर्वप्रथम कैलाश में गणतंत्र की स्थापना की थी। उन्होंने तत्कालीन समाज में उपेक्षित वर्ग का नेतृत्व किया था।  उसे सिर उठाकर चलना सिखाया था।   जाहिर है, आज की तरह की उस दौर में एक आभिजात्य संस्कृति थी जिसे देव संस्कृति कहा जाता है। इस संस्कृति के लोग सम्भ्रांत, कुलीन और सभ्य माने जाते थे। वे  अपनी वैयक्तिक उन्नति और जातीय सुख-सुविधा की चिन्ता में ही लगे रहते थे। एक दूसरी संस्कृति भी थी जिसे गैर आभिजात्य संस्कृति कहा जाता है। ये लोग  दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करते थे। ये विभिन्न मान्यताओं में विश्वास रखने वाले और विभिन्न प्रकार की जीवन पद्धति को अपनाने वाले लोग थे। अनगढ़  व्यक्तित्व और सहज जीवन जीना इनकी विशेषता थी।  इनके कई समूह थे- कोल, किरात, नाग , द्रबिड़, आभीर,पिचास, आग्नेय आदि। इसके विपरित आभिजात्यों की अपनी समृद्ध संस्कृति थी। देव, किन्नर,यक्ष,गंधर्व आदि इनकी जातियां थीं। वे गैर आभिजात्य लोगों को बड़ी घृणा की दृष्टि से देखते थे । उन्होंने इनको कभी अपने में मिलाने की कोशिश नहीं की।  बराबरी का स्थान नहीं दिया। आभिजात्य देव संस्कृति के नेता इन्द्र थे और उपनेता विष्णु। तप इनके निजी भोग की भूमिका मात्र बन कर रह गया था। वे तप केवल भोग के लिए ही करते थे।

महाशिवरात्रि- उमड़ता है भक्ति का सैलाब

इसके विपरीत तत्कालीन पिछड़े  लोगों के पास न तो भोग की सामग्री थी और न बेहतर निवास स्थान और पोशाक ही उपलब्ध था। ऐसे लोगो के लिए   गोचारण और शिकार   ही उनकी जीविका का साधन था। देव जाति पितृसत्ता  प्रधान थी और वन्य जाति मातृसत्ता प्रधान। हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक डाक्टर रामप्रवेश सिंह ने लिखा है कि शिव मातृसत्ता प्रधान वन्य जाति के प्रथम पुरुष थे। शिव ने  तत्कालीन समाज की असम्बद्धता को सुनियोजित किया। अनगढ तत्वों को सुघरता की दृष्टि दी और उनमें आत्मसम्मान का भाव पैदा किया। उन्होंने आगे लिखा है कि इतना होने पर भी सामाजिक मूल्यों में अंतर बना रहा। इसका कारण था कि सुसम्बद्ध संस्कृति के गर्भ से पैदा हुए देव थे विष्णु और असम्बद्ध संस्कृति  के देव थे शिव।एक पूर्ण भोगी होकर भी आत्मवादी बना और दूसरा स्थितिप्रज्ञ होकर भी बौराहा कहा गया। एक घोर आत्मनिष्ठ होकर आत्मवादी सिद्धांत की दुहाई देकर वैयक्तिक भोग के लिए छल और छद्म का सहारा लेने से भी बाज नहीं आया और दूसरा लोकनिष्ठ होकर भोला नाथ कहलाया। एक भोग के लिए जीवन भर अमृत ही एकत्र करता रहा तो दूसरे ने लोकहित के लिए देव संस्कृति से उत्पन्न विषमता के विष का पान करता रहा। वह गरलपायी  कहलाया। शिव  को  इन्द्रलोक और विष्णु लोक  की  वैभव सम्पन्नता कभी  आकर्षित नहीं कर सकी। वृक्ष की छाया और पर्वतीय गुफाओं में रहते हुए उन्होंने कभी अपने लिए कुछ भी संग्रह नही किया। वे अहर्निश लोककल्याण के लिए समर्पित रहे।

शिव जमीन से जुड़े देवताथे इस लिहाज से उनका चिंतन और कर्म हमेशा ही आम लोगों से जुड़ा रहा।उन्होंने  धरती को ही अपना सर्वस्व माना। उनसे पहले कृषि की परम्परा नही थी।वे शिव ही हुए जिन्होंने कृषि-सभ्यता की नींव डाली और कृषि कार्य के उपयुक्त बैल (बसहा)  को अपना वाहन बनाया।  शिव ही वह प्रथम व्यक्ति हुए जिन्होंने सदानीरा गंगा को कैलाश के पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकाल कर भारत के समतल क्षेत्र मे लाने का काम किया और यहां की असिंचित भूमि को सींचने और धन्य- धान्य के उत्पादन मे उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी।  धरा को अन्न से परिपूर्ण करने वाली अन्नपूर्णा शिव की पत्नी शिवा कहलाई।पशुपालन और कृषिकर्म का प्रथम अधिष्ठाता होने के कारण शिव का एक अन्य नाम पशुपति भी है।शिव के इसी बहुआयामी व्यक्तित्व  और क्रांतिकारी चरित्र ने अन्य संस्कृतियों को भी प्रभावित किया। तत्कालीन द्रबिड और मंगोल जो  यायावर और लुटेरे थे,  शिव ने उन्हें लोकमंगल की दृष्टि दी। शिव में विभिन्न संस्कृतियों का अदभुत समन्वय देखा जा सकता है। उन्होने नाग संस्कृति से नाग की आकृति का माला, मंगोल संस्कृति से अर्धचंद्र ,व्रात्य संस्कृति से योगसाधना , आग्नेय संस्कृति से भस्म और धुनि,किरात से नृत्य-संगीत और आभीर संस्कृति से बृषभ को अपनाया। इतना ही नहीं, शिव ने देव संस्कृति से भी अनेक तत्व ग्रहण किया।  शिव के इस विराट व्यक्तित्व में अनेक संस्कृतियों के प्रतीक चिह्नों का समावेश यही सावित करता है कि वे वास्तव में निरपेक्ष हैं।  शिव ने ही  कैलाश में सर्व प्रथम  गण संस्कृति  की स्थापना की और दक्षिण के गणेश को भारत का प्रथम गणपति बनाया। भारत के इतिहास में शिव ही वह प्रथम पुरुष हुए हैं,  जिन्होंने छोटे लोगों को बड़ा बनाया और  उन छोटे लोगों से बड़े से बड़ा कार्य कराया। शिव के मिशन था हम  त्याग, तपस्या, अपरिग्रह, और योग को ही लोककल्याण के लिए सर्वस्व मानें, हमें भोग और सुख-सुविधा नहीं चाहिए । जब तक समाज का एक-एक व्यक्ति समृद्ध नहीं हो जाता, तब तक हम सामान्य जनों की तरह ही अपना जीवन-यापन करेंगे। हम अनिकेत रहेंगे, शीत से बचने के लिए धूनी रमाएंगे, बल्कल पहनेंगे लेकिन भोगवादी मनोवृति को निकट नहीं आने देंगे। उनका एक मात्र उद्घोष था, जन-जन को लोकमंगल की सीख दो, सभी लोकमंगल के माध्यम से विकास करें और अपने संरक्षण का दायित्व स्वयं ग्रहण करें।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

  

संबंधित समाचार