पशुपति शर्मा

20 जनवरी, 2018 की उस दोपहर, राजधानी के मंडी हाउस इलाके में ‘अलग मुल्क के बाशिंदे’ से मुखातिब होने का मौका मिला। संगीत नाटक अकादमी के प्रेक्षागृह में नाट्य-कला प्रेमी सुबह से ही जुटे थे। संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित हस्तियों की प्रस्तुतियों का सिलसिला चल रहा था। कई रंगप्रेमी जो नाटक देखने आए थे, उनको नाटक का मुकर्रर वक्त पहले से पता नहीं होने की वजह से थोड़ी खीझ भी हो रही थी। बहरहाल, सरकारी कार्यक्रमों के इस मिजाज के बीच ही दोपहर के 1.30 बजे के बाद प्रेक्षागृह निर्देशक राजकमल नायक और उनकी टीम के सुपुर्द कर दिया गया। मंच में एक-एक कर अलग-अलग  प्रॉपर्टी जंचाई जाने लगी। दर्शकों का इंतजार खत्म हुआ करीब 2 बजकर 5 मिनट पर जब रंगकर्मी सुमन कुमार ने नाटक के प्रदर्शन की उदघोषणा की।

मंच पर एक कोने में सूखा सा पेड़। बीच में चिता की प्रतीकात्मक सेज और एक कोने में नाटक के केंद्रीय पात्र भैरव के रहने का ठिकाना। इन्हीं के साथ तुलसी का एक छोटा सा पौधा भी कोने में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता दिखता है। कहने को तो ये श्मशान है लेकिन इस श्मशान में कहीं जीवन का वैराग्य नहीं दिखता बल्कि जिंदगी का राग और सौंदर्य पसरा है। इसे बार-बार एक संवाद के जरिए उभारा भी गया है- क्योंकि इसी श्मशान में भैरव भी तो रहता है।

एक इंसान की यात्रा का अंतिम पड़ाव है श्मशान। एक दृष्टि से जीवन का अंत यहां आकर होता है, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? जीवन-मरण एक सातत्य भाव है और इसके साथ ही जुड़ा एक चक्र जिसमें इंसान उलझा है। आपकी मौत के बाद जिंदगी के दूसरे मायने हैं, जो आपके अजीजों के लिए ज्यादा अहम हो जाते हैं। मौत के बाद छोड़ी गई संपत्ति, गहने, जेवर इसके लिए लड़ता-झगड़ता परिवार भी मंच पर साकार होता है तो वहीं मानवीय भावनाओं से ओत-प्रोत सीधे-सादे लोगों का सच्चा मन भी बिलखता दिखता है।

भैरव के रूप में नीरज गुप्ता प्रभावशाली तरीके से केंद्रीय भूमिका को निभाने के साथ ही अलग-अलग किरदारों की बोली-बाणी और हाव-भाव इख्तियार करते हुए कथा को आगे बढ़ाते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा की बोलियों और संवाद-अदायगी के अलग-अलग अंदाज से वो इन किरदारों की अलग पहचान देते हैं। ये एक कठिन साधना है और इसके लिए जो अभ्यास अभिनेता और निर्देशक ने किया है, वो मंच पर अपना असर छोड़ता है।

दिल्ली की प्रस्तुति में जहां शुरुआत में भैरव दर्शकों को जोड़ते हैं, वहीं बाद के दृश्यों में ये संवाद और पुख्ता हो जाता है। भैरव के हर इशारे के साथ दर्शकों की प्रतिक्रिया से अभिनेता का विश्वास बढ़ता दिखा और बाद के दृश्य और भी प्रभावी हो चले। खास कर एक पिता का श्मशान में रहने वाले अपने बेटे को सजते-संवरते देखने की ख्वाहिश। पिता के दोस्त की भैरव पर उमड़ती ममता। बेटे का आई से उसकी तिजोरी और गहनों का ब्योरा मांगने वाला दृश्य। किसान की मौत पर सरकारी तामझाम। टुकड़ों-टुकड़ों में राजकमल नायक और शेफाली नायक ने आलेख में जो सवाल उठाए और मुद्दों को छेड़ा, उसे नीरज गुप्ता ने संप्रेषित करने की कोशिश की। प्रकाश संयोजक कमल जैन ने श्मशान के प्रभाव और सौंदर्य को पूरी प्रस्तुति में बरकरार रखा।

राजकमल नायक ने जहां एक तरफ व्यवस्थागत सवालों का प्रस्तुति में पिरोया है, वहीं प्रतीकों और रंगयुक्तियों के जरिए नाटकीयता भी बरकरार रखी है। एकल नाट्य प्रस्तुतियों की एकरसता को आप तोड़ते हैं और छोटे-छोटे सीन क्रिएट करते हैं। नाटक में प्रदूषण की चिंता भी है, भ्रष्टाचार की चिंता भी है, इंसान का नैतिक पतन भी है, उसका लालची और स्वार्थी मन भी खुलता है लेकिन इंसान कहीं हारता नहीं… क्योंकि इसी श्मशान में एक भैरव भी रहता है। वो भैरव जिसके पास मानवीय संवेदनाएं हैं, प्रेम है, रिश्तों की कद्र है, सौंदर्य है, संगीत है, कला है। सबसे अहम बात मुर्दों के शहर में एक इंसान है, जिसकी इंसानियत मरी नहीं, जिंदा है।


india tv 2पशुपति शर्मा ।बिहार के पूर्णिया जिले के निवासी हैं। नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संचार की पढ़ाई। जेएनयू दिल्ली से हिंदी में एमए और एमफिल। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। उनसे 8826972867 पर संपर्क किया जा सकता है।

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