जयंत कुमार सिन्हा

करीब साल भर पहले का एक दिन, मैं तब शहर सीवान में था। डाँ राजेन्द्र प्रसाद, मजहरुल हक, और खुदा बक्श का सीवान। जब शहर के स्कूल से लेकर प्रशासनिक स्तर के कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद की पुण्य तिथि पर पुष्प्पाजंली का कार्यक्रम चल रहा था। वहीं 10-15 लोग मालवीय नगर के एक कमरे में चाय के साथ कुछ नया करने की सोच रहे थे। कार्य ऎसा हो जो जन कल्याणकारी और कम खर्च में किया जा सके। सवाल यह कि कौन सा कार्य करें ताकि लोगों को सहजता से उसका लाभ मिले। साथ ही अपने व्यापार, रोजगार पर भी इसके कारण किसी तरह का असर न पड़े। इन साथियों ने अपने कार्य के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद को याद कर रक्त दान करने का निर्णय लिया। शहर के लिहाज से यह निर्णय सही भी था। जहां सरकारी अस्पताल खस्ताहाल हैं। सारी व्यवस्था प्राईवेट अस्पतालों के बूते हीचलती है। तबीयत बिगड़ने की विशेष स्थिति मे पटना या गोरखपुर ही जाना एकमात्र विकल्प होता है।

घाघरा की सहायक “दाहा” नदी के तट पर बसा शहर। शहर के एक तिहाई या उससे कहीं ज्यादा युवा खाड़ी देशों में रोजगार के लिए पलायन कर चुके हैं। शहर के उत्तर-पूर्व मे गोपालगंज, सारण तो दक्षिणपश्चिम में उत्तर प्रदेश का देवरिया और बलिया जिला। सुना है सीवान का मतलब दो सरहदों की सीमा होती है, लेकिन इस शहर को मजहरुल हक साहब से लेकर प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद तक की जन्मभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है। वहीं स्याह पक्ष ये भी कि बहुचर्चित नटवरलाल भी यहीं के हैं। बल्ड डोनर ग्रुप के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला, निलेश वर्मा “नील” जो पेशे से बिजनेश मैन हैं, वो इस क्लब के सक्रिय सदस्यों में शुमार हैं। सादगी ऐसी कि अपने आप को अग्रणी कहे जाने से उन्हें परहेज है। निलेश अपने को ब्लड डोनर से ज्यादा कुछ नहीं मानते। फिलहाल उनसे बात-चीत का सफर आगे बढ़ाते हैं।

बदलाव- रक्तदान महाकल्याण है और लोग करते भी हैं फिर इसमें आपलोगों की भूमिका क्या है ?

निलेश वर्मा- पूरे विश्व में 4 जून को विश्व रक्त दिवस मनाया जाता है। वहीं रक्त के अभाव में लोगों की मृत्यु रोज देखते व सुनते हैं। इसका कारण लोगों मे जागरुकता का अभाव। पोस्टर, बैनर या सरकारी ताम-झाम से कुछ नहीं होता। और हौरानी तब होती है जब हर दूसरा किसी तीसरे को रक्तदान का सुझाव जरुर देगा, लेकिन खुद अपने से इसकी शुरुआत नहीं करेगा। तो हमारे साथ वालों ने श्रीगणेश खुद से किया।

शुरुआत 4 जुलाई 2017 को स्वामी विवेकानन्द जी की पुण्यतिथि पर हुई थी। तब यही कोई 10-15 लोग साथ में थे। आज लगभग 200 सदस्य हैं, जिसमें विद्यार्थी, बिजनेसमैन, बैंकर, डॉक्टर से लेकर वो सभी लोग का हैं जो बिना स्वार्थ रक्तदान करके हमारे ग्रुप के साथ जुड़े। वैसे सीवान से बाहर गोरखपुर, पटना, दिल्ली, लखनऊ जहां से भी फोन आता है कि ब्लड चाहिए, वहाँ हमारे ग्रुप के सदस्य अपने-अपने स्तर से बल्ड का इन्तजाम करवाते हैं। अभी तक हमारा मिशन सफलता से चल रहा है।

निलेश वर्मा, ब्लड डोनर कैंप के सक्रिय सदस्य

डोनर क्लब के नियमित सदस्य अपने जन्मदिन या सालगिरह पर रक्तदान करते हैं। इसकी शुरुआत निलेश जी ने अपने सालगिरह 8 दिसम्बर से की। निलेश ‘नील’ का 35 वाँ रक्तदान था। सदस्यों के बीच रक्तदान एक उत्सव है। रक्त संग्रह के साथ-साथ पिछले वर्ष बाढ़ राहत कार्य में बढ़-चढ़ के हिस्सा लिया और बाढ़ पीड़ित को मदद पहुँचाने का काम किया।

पता:-सिवान ब्लड डोनर क्लब, मालवीय नगर, प्रभावती महिला कॉलेज से उत्तर, सीवान

मोबाइल नम्बर:-9431265220/9334262020/7004965990/9013560400

बदलाव- लोगों में जागरूकता लाने के लिए क्लब क्या करता है?

निलेश वर्मा- छुट्टी के दिनों मे खासकर रविवार को सीवान के देहात क्षेत्र में हमलोग गाँव वालों की मदद से कैम्प लगाते हैं। साथ में डॉक्टर, पैथोलोजिशियन भी रहते हैं। दिन में लोगों के साथ मीटिंग में रक्त दान की महत्ता पर चर्चा होती है। फिर उस गाँव से एक-एक कर युवा रक्त देने को तैयार हो जाते हैं। और उन्हें हम आश्वस्त करते हैं कि गर जरुरत हुई तो आपके लिए भी कई हाथ मदद को आ जाएंगे। बिना किसी संकोच के लोगों का समर्थन अनवरत जारी है। जहां सरकारी स्तर पर खर्च कम, लाभार्थी ज्यादा हैं। और हां ऐसे लोग जो डोनर क्लब से जुड़कर रक्त देते हैं, उसे सीवान ब्लड डोनर क्लब रक्तवीर कहके संबोधित करता है।  कुछ महिलाएं भी रक्तदान के लिए आगे बढ़ी हैं। सबसे अहम कि डोनर क्लब राजनैतिक मंचों से बराबर दूरी बनाए हुए है।

बदलाव-रक्त संग्रह कहां होता है ?

निलेश वर्मा- रेड क्रॉस के ब्लड बैंक में, चूंकि उनके यहाँ सारी सुविधा है। रक्त की एक-एक बूँद को बचाकर रखने की कोशिश होती है। कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही है अभी। लगभग 15 सदस्यों की एक समिति है जो अपने स्तर से रुपयों का बन्दोबस्त करती है। इसमें सभी लोग अपने सामर्थ्य के मुताबिक आर्थिक सहयोग करते हैं। फिलहाल किसी सरकारी मदद की इच्छा भी नहीं है। मेरा मानना है कि अर्थ उतना ही चाहिए जितने में काम चल जाए।


 

jayant profileजयंत कुमार सिन्हा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व छात्र। छपरा, बिहार के मूल निवासी। इन दिनों लखनऊ में नौकरी। भारतीय रेल के पुल एवं संरचना प्रयोगशाला में कार्यरत।