रवींद्र त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से

हिंदी की वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के सिंदूर-पोतने वाले शब्द- युग्म पर जो विवाद हो रहा है वह बेहद ओछेपन की तरफ संकेत करता है। मैत्रेयी जी हिंदी की वरिष्ठ लेखिका हैं और एक लेखक या लेखिका को परंपरा संबंधी सवाल उठाने पर विवाद क्यों? अगर लेखक (या लेखिका) सवाल नहीं उठाएगा तो कौन उठाएगा? हां, अगर किसी को आपत्ति है तो उसे इसे प्रकट करने का तरीका भी शिष्ट होना चाहिए। अगर परंपरा के बारे सवाल उठाने का सिलसिला बंद हो गया तो साहित्य की क्या उपयोगिता रह जाएगी? पर ऐसा नही है कि जिसे आधुनिकता कहा जाता है वह कम हिंसक होती है। बीसवीं सदी दुनिया की सबसे हिंसक सदी रही है उसमें हिसा के प्रचारक और हिंसा फैलानेवाले धर्मनेता नहीं बल्कि राजनैतिक दलों के नेता और चुने हुए जन प्रतिनिधि रहे हैं।
जहां तक छठ का प्रश्न है मैं पहले की कह चुका हूं कि ये एक लोकपर्व है। इसकी धार्मिकता का परीक्षण होना चाहिए। ये भी एक बौद्धिक कर्म है। पर मेरी निजी रूप से मान्यता है कि कुछ अन्य त्यौहारों की तुलना मे छठ अधिक लोकतांत्रिक है। इसमें कर्मकांड भी कम है। महिलाओं की अहमियत भी ज्यादा है। बल्कि उनकी केद्रीयता जैसी स्थिति है। यहां घोर दकियानुसी नहीं के बराबर है लेकिन शुद्धता पर बल है। वह तो दैनिक जीवन में होना भी होना चाहिए। छठ की कोई शास्त्र विधि नही है। ये लोकगीतों के माध्यम से अधिक अभिव्यक्त होता है। लोकगीत ही इसके मंत्र हैं। अगर मंत्र जरूरी हों तों। इसीलिए मेरा कहना है कि धर्मों का भी समाजशास्त्रीय अध्ययन होना चाहिए।
मेरा ये भी मानना है कि जब तक सभ्यता है उसमें से धर्म की भावना हट नही सकती है। आज भी दुनिया भर में अलग अलग देशों में धर्मुयुद्ध हो रहे हैं। लेकिन इन युद्धों को करानेवाले सिर्फ धार्मिक लोग नही हैं. उसके पीेछे राजनैैतिक दल, इजारेदार कंपनियां, मुुनाफाखोर और हिंसक राजनैतिक विचारधाराएं हैं। और ये आधुनिकता भी अपने मिजाज मे कम पितृसत्तात्क नही हैं। दुनिया के ज्यादातर राष्ट्रराज्य घोर हिंसक, क्रूर और पितृसत्तात्मक हैं।


रवींद्र त्रिपाठी/ वरिष्ठ पत्रकार, क्रिकेट और साहित्य में गहरी रुचि। मूल रूप से झारखंड के निवासी। इन दिनों दिल्ली से सटे गाजियाबाद में रहना हो रहा है।

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