ग्राम सभा का इतिहास और ग्राम स्वराज का अधूरा सपना

ग्राम सभा का इतिहास और ग्राम स्वराज का अधूरा सपना

शिरीष खरे
भारत में स्थानीय शासन का अस्तित्व बहुत पुराना है। मध्यकाल के इतिहास में ग्राम-सभा का उल्लेख मिलता है जो कि पंचायतों के माध्यम से काम करती थीं। कहा जाता है कि ब्रिटिश-काल के दौरान यह संस्था कमजोर पड़ती गई। आजादी के बाद इस व्यवस्था पर फिर से विचार किया गया। पंचायती राज संस्थाओं को सत्ता के विकेंद्रीकरण और विकास संबंधी गतिविधियों में भागीदारिता का महत्त्वपूर्ण तंत्र समझा गया।
भारत में इसे फिर से स्थापित करने के पीछे एक ऐतहासिक क्रम है। वर्ष 1909 में रॉयल आयोग ने सिफारिश की थी कि विकेंद्रीकरण के लिए स्थानीय पंचायतों का उपयोग किया जाए। इसी वर्ष लाहौर में कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर सरकार से यह आग्रह भी किया था कि वह ग्राम-पंचायतों के निर्वाचन के लिए शीघ्र कदम उठाए और उन्हें वित्तीय सहायता भी दे। इसके दस वर्ष बाद 1919 में मांटेग सुधारो ने स्थानीय शासन को ‘स्थानांतरित विषय’ बना दिया। इसका अर्थ था कि स्थानीय स्वायत्त शासन को मंत्रियों के नियंत्रण में कर दिया जाए और इसे प्रतिनिधि निकाय बनाया जाए। किंतु, इससे पंचायती राज संस्थाएं लोकत्रांतिक नहीं बन सकीं।

ग्रामशाला पार्ट-9

महात्मा गांधी का मानना था कि हर गांव में उसका अपना ग्राम-स्वराज होना चाहिए। इसमें पंचायत को पूरे अधिकार हों। आजादी के बाद वर्ष 1957 में बलवंतराय मेहता की अध्यक्षता में निचले स्तर पर सत्ता का हस्तांरण करने के लिए इस पंचायत को महत्त्व दिया गया। इस प्रकार, वर्ष 1959 में पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में आई। इसके दो बुनियादी उद्देश्य थे
1- लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, 2- स्थानीय भागीदारिता। वर्ष 1977 में पंचायती राज संस्थाओं की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए अशोक मेहता समिति गठित हुई। इसने पंचायती राज के पतन के लिए ऐसी संस्थाओं को विकास कार्यक्रमों से अलग रखने को मुख्य कारण माना। इसने नौकरशाही की भूमिका का विश्लेषण करते हुए पंचायती राज संस्थाओं पर इसके प्रभाव का भी उल्लेख किया।
फिर वर्ष 1985 में जीवीके राव समिति गठित हुई। इसने जिला परिषदों को मजबूत बनाने की सिफारिश की और कहा कि स्थानीय निकायों के नियमित चुनाव होने चाहिए। इसके बाद वर्ष 1986 में एलएम सिंघवी समिति बनी। इसने स्थानीय स्वायत्त शासन को संवैधानिक मान्यता देने की सिफारिश की। साथ ही कहा कि राजनीतिक दलों के व्यक्तियों की भागादारिता को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। दो वर्ष बाद 1988 को सरकारिया आयोग ने स्थानीय निकायों को वित्त और कार्य की दृष्टि से मजबूत बनाने की सिफारिश की। अगले वर्ष 1989 में गाडगिल समिति ने एक तीन-स्तरीय पंचायती व्यवस्था की सिफारिश करते हुए निर्वाचित सदस्यों के लिए पांच वर्ष की अवधि और आरक्षण आधारित व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की।

तस्वीर- आशीष सागर दीक्षित के फेसबुक वॉल से साभार

इस तरह वर्ष 1992 को संविधान में 73वां संशोधन किया गया। इसके बाद ग्राम-सभा स्थापित हुई, गांव से जिला स्तर तक तीन-स्तरीय व्यवस्था लागू हुई, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित हुआ, हर पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष सुनिश्चित हुआ, वित्त आयोग बना और विकास संबंधी गतिविधियों को पंचायतों में शामिल किया गया।
इस संशोधन के बाद दो लाख 28 हजार ग्राम-पंचायतों, छह हजार जनपद पंचायतों और 474 जिला पंचायतों का गठन हुआ। तीन स्तरों पर 34 लाख लोग निर्वाचित हुए। इससे पंचायतों की संरचना, उनके अधिकार और कार्यों के बारे में एकरूपता के लिए मदद मिली।
वर्ष 1996 में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम में आदिवासियों को प्राकृतिक संसाधनों पर अपने पारंपरिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए प्रावधान रखे गए।
दूसरी तरफ, कई अध्ययनों से पता चलता है कि पंचायतों की भूमिका राज्य सरकारों के लिए एजेंसी तक सीमित हो गई। इनका काम विकास के विभिन्न कार्यक्रमों और योजनाओं को केवल लागू कराना रह गया।
इन सबके बावजूद पंचायती राज व्यवस्था से गांव स्तर पर बदलाव की प्रक्रिया जारी है। हालांकि, यह कहना भी जरुरी है कि ‘ग्राम-स्वराज’ का सपना अभी दूर है।

shirish khare

शिरीष खरे। स्वभाव में सामाजिक बदलाव की चेतना लिए शिरीष लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक भास्कर , राजस्थान पत्रिका और तहलका जैसे बैनरों के तले कई शानदार रिपोर्ट के लिए आपको सम्मानित भी किया जा चुका है। संप्रति पुणे में शोध कार्य में जुटे हैं। उनसे shirish2410@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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