शिरीष खरे

स्वतंत्रता के बाद भारत जैसे विशाल और विविधता सम्पन्न देश में असंतुलन तथा अंतर्विरोधी समाधान के लिए योजना को एक सकारात्मक साधन माना गया। ग्रामीण भारत में योजना के प्रारंभिक वर्ष 1950 से 1955 के दौर में सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवाएं शुरु करके विकास का मार्ग प्रशस्त किया गया। इनका उद्देश्य ग्रामीणों लोगों की आय में बढ़ोतरी और आर्थिक असमानताओं को पाटना था। 1955 से 1960 के दौर में मुख्यत: उद्योगों पर जोर दिया गया। विचार था कि इससे गांवों की अधिशेष आबादी को राहत मिलेगी। साथ ही योजनाकारों ने ‘भूमि सुधार और कृषि पुनर्संरचना’ शीर्षक अध्याय को भी जोड़ा । सहकारी कृषि प्रथा पर ध्यान देकर कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद जताई।

ग्रामशाला पार्ट-11

1960 से 1965 प्राथमिकता के स्तर पर कृषि को पहले स्थान पर रखा गया । इसके पीछे कारण था कि 1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ, 1965 से 1967 के बीच सूखा रहा, जिसके कारण देश में खाद्यान्न की कमी पड़ गई और योजनाकारों ने खाद्यान्न के मामले में आत्म-निर्भर होने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद हरित क्रांति आई और जब यह गुजर गई तो यह आभास हुआ कि लाभों का न्यायपूर्ण वितरण एक सपना है। हरित क्रांति का लाभ बड़े किसानों को मिला और छोटे और भूमिहीन किसान बदहाल ही रहे तो लोक प्रचलित ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ गरीबी उन्मूलन पर बल दिया गया। 1970 का दशक काफी महत्वपूर्ण रहा जब इस दौर में न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, एकीकृत ग्राम विकास कार्यक्रम, ग्रामीण रोजगार और कुछ क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम शुरु किए गए। 1980 से 1985 के दौर में गरीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन, गारंटी कार्यक्रम, स्व-रोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण कार्यक्रम, ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल विकास कार्यक्रम, एकीकृत ग्राम विकास कार्यक्रम की बाढ़ आ गई।

1985 से 1990 के दौर में रोजगार के अवसरों में वृद्धि, मानव संसाधन संरचना विकास, असमानता उन्मूलन, खाद्यान्न सुरक्षा की विस्तृत प्रणाली, विकास में जनभागीदारिता तथा ग्राम विकास प्रशासन के क्षेत्र में सुधार को प्राथमिकता की सूची में रखा गया। इसके बाद के दौर में उदारीकरण प्रणाली के अधीन आयात बहुत अधिक हुआ। इससे भारत के भुगतान संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । रोजगार-सृजन क्षमता में गिरावट आई। इस दौर में उद्देश्यों के विपरीत क्षेत्र-उत्पादन को बढ़ावा और ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य गतिविधियों का विकास नहीं हो पाया। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम छलावा साबित हुआ । गरीबी-रेखा के नीचे लोगों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली समुचित विकास और सुधार नहीं हो सका।

योजनाबद्ध आर्थिक विकास होते हुए भी भारत में क्षेत्रीय असंतुलन और असमान आय बढ़ी है। इसके कारण देश के राजनीतिक ढांचे पर भारी दबाव पड़ता दिख रहा है। एक तरफ, कारपारेट हितों ने आर्थिक तो भूमि सुधार में धीमी प्रगति तथा रुढ़िवादी पंरपराओं ने सामाजिक विकास को रोक-सा दिया है। कहने को भूमिहीन और सीमांत किसानों की समस्या मुख्यत: पांच दशकों से भारतीय योजना की कार्यसूची का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से विस्थापन, बहु-विस्थापन और पलायन का संकट बताता है कि व्यवहारिक तौर पर विकास की उल्टी गंगा बह रही है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक-सामाजिक सेवाएं असंतोषजनक हैं। विशेष तौर पर महिलाओं, दलित, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्गों का विकास आज भी चिंता का विषय बना हुआ है।

shirish khare

शिरीष खरे। स्वभाव में सामाजिक बदलाव की चेतना लिए शिरीष लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक भास्कर , राजस्थान पत्रिका और तहलका जैसे बैनरों के तले कई शानदार रिपोर्ट के लिए आपको सम्मानित भी किया जा चुका है। संप्रति पुणे में शोध कार्य में जुटे हैं। उनसे shirish2410@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।