शिरीष खरे

गुजरात चुनाव के नतीजों के बाद आंकड़ों के आईने से अलग-अलग विश्लेषक अपनी-अपनी तरह से तस्वीरें दिखा रहे हैं। हर बार की तरह इस बार फिर राज्य के चुनावी नतीजों को ‘मोदी बनाम राहुल’ की ही टक्कर के चश्मे से देखा जा रहा है। लेकिन, इस पूरे खेल में स्थानीय उम्मीदवारों की पारियां और समीकरण ओझल हो गए। यह अनदेखी होती रही कि यदि राहुल गांधी में गुजरात के लोगों ने नई संभावना देखी तो कांग्रेस के ही सारे बड़े लीडर ढेर क्यों हो गए और यदि मोदी की लहर बरकरार है तो क्यों राज्य के सात मंत्री चुनाव में हार गए और कैसे मोदी उनके गृहनगर से भी पार्टी को नहीं जिता सके।
दूसरी तरफ, इस कड़े मुकाबले में बड़े दलों के प्रत्याशियों से अलग छोटे दल और निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी और पांच सीटें अपने नाम करा लीं। लेकिन, इन सभी नतीजों को महज छोटे दलों की भूमिका तक सीमित करके देखा गया और सीट दर सीट स्थानीय खिलाड़ियों और उनके समीकरणों को नजरअंदाज कर दिया गया। कहा गया कि यदि मायावती की बीएसपी और शरद पवार की एनसीपी मैदान में नहीं उतरती तो यह चुनाव कांग्रेस के लिए जश्न का सबब बन जाता। क्या वाकई ऐसा होता?
क्या बसपा और एनसीपी चुनाव नहीं लड़ते तो कांग्रेस 90 सीट पार कर जाती? जिन सीटों पर कम अंतर से हार-जीत की स्थिति बनी वहां उस पार्टी के स्थानीय उम्मीदवार की मेहनत का श्रेय निकालकर क्या सारे वोट सिर्फ और सिर्फ छोट दल के नाम पर मिले मान लिए जाएं? इन प्रश्नों को पहले व्यापक और फिर उसके बाद कुछ महत्वपूर्ण सीटों के आधार पर समझने की कोशिश करते हैं। जो नतीजे सामने हैं उसके मुताबिक भाजपा ने करीब 50 प्रतिशत वोट हासिल करते हुए 99 सीटें जीतीं। कांग्रेस ने 44 प्रतिशत वोट हासिल करके 77 सीटें जीतीं। एनसीपी ने 0.6 प्रतिशत तो बीएसपी ने 0.7 प्रतिशत वोट हासिल किए। जाहिर है कि कांग्रेस भाजपा से 8 प्रतिशत वोटों के अंतर से बहुत पीछे है।
मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जहां इन दोनों दलों की ही सीधी टक्कर होती है वहां एक, डेढ़ या दो प्रतिशत के वोटों के अंतर से सरकार बनती और बिगड़ती रही है। इस लिहाज से गुजरात में 8 प्रतिशत का अंतर बहुत बड़ा और निर्णायक है कि बीएसपी और एनसीपी जिनका खुद का वोट बैंक एक प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है, तारणहार की भूमिका नहीं निभा सकती थीं। फिर कांग्रेस और भाजपा के बीच 22 सीटों का बड़ा फासला भी है।
इसके बावजूद एक टॉपटेन लिस्ट के जरिए विश्लेषकों ने यह बताया गया कि कांग्रेस यदि यूपीए बनकर लड़ती तो तस्वीर उलट नजर आती। इस थ्योरी के समर्थन में एक ट्रेंड चल पड़ा। इसके लिए कम अंतर से हारी सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार की हार के कुल वोट के मुकाबले बसपा और एनसीपी के उम्मीदवारों के कुल वोट को जोड़कर एक संख्या निकाली गई और बताया गया कि यह वोट यदि कांग्रेस की झोली में चले जाते तो ऐसी सीटों पर कांग्रेस जीतकर बाजी पलट देती।
लेकिन, इस उधेड़बुन में यह कैसे अंतिम मान लिया गया कि दोनों पार्टियों के चुनाव न लड़ने की स्थिति में ये वोट कांग्रेस को जाते ही जाते? स्थानीय उम्मीदवार और समीकरणों को अनदेखा करते हुए यह नहीं सोचा गया कि क्या इनके उम्मीदवार किन्हीं दूसरी छोटी पार्टी से चुनाव नहीं लड़ सकते थे? क्या वे दूसरे छोटे दल से लड़कर न के बराबर वोट लाते? या फिर वे चुनाव ही नहीं लड़ते? इनके चुनाव न लड़ने की स्थिति में भी ये वोट कांग्रेस को ही जाते और किसलिए जाते, इसका सटीक अंदाजा टीवी विश्लेषक तो क्या कोई नहीं लगा सकता।
यह कहते हुए कभी यह सोचा गया कि यहां से लड़ने वाले ये दो उम्मीदवार किसी और पार्टियों के टिकट पर चुनाव क्यों नहीं लड़ते? क्या ये इसलिए चुनाव नहीं लड़े होंगे कि इनका भी इनके इलाके में मामूली प्रभाव रहा होगा। दरअसल, पूरे विश्लेषण में स्थानीय उम्मीदवारों व समीकरणों की पूरी तरह से अनदेखी करके जोड़ लगाना और एक ठोस नतीजे पर पहुंचना जटिल परिस्थितियों के सरलीकरण कर देने की आसान कवायद के अलावा कुछ नहीं है।
अब उदाहरण के लिए सौराष्ट्र की बोटाद सीट को ही लें। यहां कांग्रेस 906 मतों से हारी। विश्लेषकों ने फटाफट बसपा और एनसीपी के मतों को जोड़े और बताया कि यदि ये दो पार्टियां न होतीं तो भाजपा करीब 900 मतों से हार जाती। कैसे? इसी सीट पर कुल 17 निर्द​लियों ने भी अपनी किस्मत अजमाई और कुल 13 हजार वोट हासिल किए। अब कैसे बसपा और एनसीपी के वोट कांग्रेस को जाते ही जाते और सभी निर्दलियों के वोट भाजपा को नहीं ही जाते या कांग्रेस को नहीं ही जाते तो इसका हिसाब लगाना मुश्किल ही है।
गोधरा और ढोलका दो अन्य सीटें हैं जिन पर कांग्रेस हजार मतों से कम के अंतर से हारी है। इसके अलावा पांच सीटें और हैं जिन पर कांग्रेस हजार से दो हजार के बीच के मतों से हारी। हालांकि, हजार मतों के अंतर से लीड विधानसभा चुनाव में महत्व रखती है, फिर भी दो हजार मतों के अंतर तक की इन सातों सीटों को भी कांग्रेस के साथ जोड़ दिया जाए तो हद से हद वह  बढ़कर 84 तक पहुंचेगी। मतलब अपनी दम पर बहुमत से आठ सीटें और पीछे। हां, अब इसमें तीन हजार मतों तक के अंतर से जीती भाजपा की सीटें जोड़ने बैठ जाएं तो कांग्रेस बामुश्किल 92 सीटों के बहुमत का आंकड़ा छू भी सकती है। लेकिन, यह पैमाना तो फिर कांग्रेस पर भी लागू होता है।
कपराडा की सीट पर कांग्रेस ने भाजपा को महज 170 वोटों से हराया। इसी तरह, डांग सीट पर भी कांग्रेस ने भाजपा को 768 मतों से हराया। भाजपा के कुछ प्रत्याशी दो हजार तो कुछ प्रत्याशी तीन हजार तक के अंतर से हारे। वहीं, गुजरात में दो सीट ऐसी भी हैं जहां कांग्रेस ने निर्दलियों की बजाय भाजपा को जिता दिया। इन सबकी चर्चा बहुत कम हुई।मोटे तौर पर बात यह है कि करीब 50 प्रतिशत का वोट-बैंक बनाने के बावजूद भाजपा 99 से आगे क्यों नहीं बढ़ सकी। यह इतना बड़ा वोट-बैंक था कि भाजपा 100 सीटों से तो आगे जानी ही थी। जाहिर है कि ज्यादातर सीटों पर वह बहुत भारी अंतर से जीती है। वहीं, 42 प्रतिशत वोट बैंक (भाजपा से 8 प्रतिशत कम) के बावजूद कांग्रेस अपनी सीटें भी बढ़ा सकी तो इसलिए कि कुछ सीटों पर वह भी मामूली अंतर से जीती है।
कुल मिलाकर, सोचा यह जा रहा है कि किस दल ने कितने वोट से कांग्रेस को हरा दिया, जबकि यह क्यों नहीं सोचा जाता कि उस उम्मीदवार के नाम पर भी वोट मिले होंगे जो बसपा की बजाय जदयू की टिकट से भी लड़ता तो भी पांच सौ, हजार या दो हजार तक वोट ला सकता था? दूसरी तरफ, एनसीपी 125 सीटों पर तो चुनाव लड़ी ही नहीं। फिर भी ऐसी न के बराबर कुछ सीटों पर किन्हीं 5-5, 4-4, 2-2 या 1-1 निर्दलीय उम्मीदवार ने कांग्रेस को हरा दिया  है, वह भी मामूली अंतर से। कहीं-कहीं भाजपा को हरा दिया, वह भी मामूली अंतर से।


shirish khareशिरीष खरे। स्वभाव में सामाजिक बदलाव की चेतना लिए शिरीष लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक भास्कर , राजस्थान पत्रिका और तहलका जैसे बैनरों के तले कई शानदार रिपोर्ट के लिए आपको सम्मानित भी किया जा चुका है। संप्रति पुणे में शोध कार्य में जुटे हैं। उनसे shirish2410@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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