शिरीष खरे

कुछ बनने की जल्दी में हुआ दृष्टि-दोष, फिर एक दिन अचानक एक घटना से कि जाना निकट की चीजें दूर या दूर की चीजें निकट क्यों दिखाई दे रही हैं।

”जर्नलिस्ट बनने की इतनी जल्दी क्या है, यह उम्र मौज-मस्ती, पढ़ने-लिखने और दुनिया को जानने-समझने की है, किसने भेज दिया यहां…!”

जगह है भोपाल में प्रेस कॉम्लेक्स स्थित दैनिक-भास्कर ऑफिस के भीतर की और सलाह है फीचर डेस्क पर अच्छी पॉजीशन रखने वाले एक भले आदमी की। भले आदमी इसलिए कि सलाह देने वाले आदमी मुझे बाइज्जत कुर्सी पर बैठाकर चाय पिला रहे हैं, जबकि मैं पहली बार किसी प्रेस के ऑफिस आया हूं और सबसे बड़ी बात कि वे बात-बात पर ‘बेटा’ कह रहे हैं और इससे मुझे इतना सुकून मिल रहा हैं जिसे मैं नहीं बता सकता हूं। इनके बारे में इतना और बता सकता हूं कि ये कोई पैंतीस पार व्यक्ति हैं, जिनका चेहरा मुझे हमेशा याद रहेगा, लेकिन मुझे यह अंदाजा नहीं है कि बाद में याद करूं तो भी नाम याद नहीं आएगा, सरनेम है (शायद) सौमित्र। यह बात है वर्ष 2000 की, मेरी उम्र है बीस।

आईने में अपना अक्स-एक

इन दिनों जर्नलिस्ट बनने की जल्दी में हूं, यह जानते हुए भी कि इस शहर के कई उम्रदराज पत्रकारों की सैलरी ढाई-तीन हजार रुपए महीना है, लेकिन सवाल पैसों का नहीं, कुछ सीखने और बनने का है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुछ बैचमेट पढ़ाई के साथ प्रेस में नौकरी रहे हैं और जब उनकी बाइलाइन खबर देखता हूं तो लगता है कि मुझे भी कोशिश करनी चाहिए। यही सोचकर सीधे इतने बड़े अखबार के ऑफिस में दस्तक दी है, जहां (शायद) सौमित्र सर को देर से इस अपनेपन के साथ सुन रहा हूं कि वे मुझे नौकरी पर रख ही लेंगे। वे भी शायद मुझे हतोत्साहित नहीं करना चाहते हैं, तभी तो मेरी लंबी चुप्पी तोड़ते हुए उन्होंने पूछा है, ”फिल्मों पर लिखोगे?”

और फिर एक पेज का प्रिंट देकर आधे घंटे में अंग्रेजी से हिन्दी में फीचर बनाने का टास्क दिया, टास्क क्या टेस्ट है, इस हिदायत के साथ कि ‘ट्रांसक्रियेशन’ करना है, न कि ‘ट्रांसलेशन’। उन्हें क्या पता है कि ‘ट्रांसक्रियेशन’ शब्द ही मैंने पहली बार सुना है। मुझे अपनी अंग्रेजी पर पूरा भरोसा है, इसलिए हुआ भी वही जिसका डर था।उन्होंने  ‘टांसक्रियेशन’  देखा तो स्पष्ट कर दिया, ”तुम नौकरी लायक नहीं हो!” हालांकि, उन्होंने मुझे एक मौका और दिया। कहा, ”गांव से जुड़ी कोई अच्छी-हटकर फीचर या स्टोरी लिख सकते हो तो लाओ!” फीचर और स्टोरी में अंतर तो बहुत दूर की बात, मुझे तो तब समझ ही नहीं आया कि गांव की खबर क्या हो सकती है! यहां से निकला तो बाहर अंकित कुमार और दीवा रिज्वी मिले। दोपहर की आखिरी क्लास पूरी करके हम तीन दोस्त विश्‍वविद्यालय के 7 नंबर बस स्टॉप से मिनी बस पकड़कर प्रेस कॉम्पलेक्स आए, फिर ये दोनों अंग्रेजी के डेली न्यूजपेपर फ्री-प्रेस के ऑफिस चले गए, मुझे दैनिक भास्कर भेज दिया, ये कहते हुए कि मेरी हिन्दी अच्छी है।

इसके बाद कई बार दैनिक भास्कर जाना हुआ, लेकिन वहां (शायद) सौमित्र सर नहीं दिखे। फिर भी इन दिनों के जोश ने उनकी इस बात को दिल में तीर की तरह चुभा लिया कि ”गांव से जुड़ी कोई अच्छी-हटकर फीचर या स्टोरी लिख सकते हो तो लाओ!” इसलिए एक साल में दो सेमेस्टर परीक्षाओं के बीच दो दर्जन से अधिक बार अपने गांव मदनपुर घूम आया, जो भोपाल से नेशनल हाइवे-12 पर जबलपुर की ओर करीब 200 किलोमीटर दूर गोंड आदिवासी बहुल छोटा गांव है, जिसकी आबादी करीब एक हजार है। यहां से ढिलवार, खैरुआ, सर्रा, बंधी, जमुनिया, खमरिया, चीखली, करैया जैसे आस-पास के गांवों में कई चक्कर लगाए, लेकिन खाली हाथ ही रहा, मुझे अच्छी-हटकर कोई स्टोरी नहीं दिखी।

मैं सोचने लगा कि क्या में बिल्कुल ही नासमझ हूं, या फिर बचपन से गांवों की ही दुनिया देखी है और उसी में इतना घुलमिल गया हूं कि शहर की दुनिया और उसके टेस्ट का अंदाजा ही नहीं है! इसलिए मेरी ग्रामीण पृष्ठभूमि जानकर जो इसे मेरा मजबूत पक्ष मान रहे हैं, वही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है, जिसके बीच मुझे गांवों की खबरों को पहचानना और उनमें से अंतर खोजना बहुत मुश्किल हो रहा है।

खैर, ऐसी स्थिति से निपटने का मैंने तोड़ निकाल लिया। तोड़ यह कि पत्र-पत्रिकाओं की पुरानी रिपोर्टों की कतरनों को पढ़-पढ़कर मैंने उनमें गांवों की कहानियों को ढूंढ़ा, लिखने का तरीका और सलीका दोनों सीखा, तब कहीं जाना कि वे मामूली बातें जो हमारे लिए भले ही नई नहीं हों, दूसरे ‘लक्ष्य समूह’ के लिए नई हो सकती हैं, अन्य कहानियों के सूत्र भी इन्हीं में छिपे हैं। इस अभ्यास ने मुझे खबर और फीचर में अंतर करना तो सिखाया ही, विचारों का खजाना भी खोल दिया, कहानी को अलग-अलग कोणों से उठाना बता दिया, लिखने का ढांचा दे दिया, भाषा-कौशल की बारीकियां समझा दीं। इन सबके बावजूद मुझे नुकसान हुआ। नुकसान भी ऐसा जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो सकती। इस अभ्यास ने मुझसे मेरी दृष्टि छीन ली। मेरी आंखों पर एक नई दृष्टि चढ़ा दी। मैंने ग्रामीण होकर भी गांव को अपनी नजरों से देखना बंद कर दिया। हालांकि, लिखते-लिखते कई बार मुझे शक होता रहा कि मेरी आंखों पर किसी और की दृष्टि तो नहीं चढ़ी, जो शहरी-मध्यम/संभ्रात वर्ग या उनके अनुसरण करने वाले ‘रूरल कोरस्पोंडेंटों’ की तो नहीं, जिसने मेरा मेरे गांवों को देखने का नजरिया ही बदल दिया।

ये मेरी पत्रकारिता के शुरुआती दिन हैं, जब मुझे लग रहा है कि मेरी आंखों ने देखना और दिमाग ने मेरे हिसाब से सोचना करीब-करीब बंद कर दिया है। लग रहा है कि यह उन परिस्थितियों का नतीजा है जिसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले इस संवाददाता के भीतर की नई धारणाएं सालों-साल जगह बनाती चली गईं, जिन्होंने कई पुरानी धारणाओं के टूटने की खुशफहमियों के बीच अपनी जड़ें गहरी की हैं।

मुझे मेरी इन बातों पर यकीन तब हुआ जब एक घटना घटी। वर्ष 2002 में दिसंबर की कोई रात रही होगी। मैं भोपाल से निजामुद्दीन जाने वाली जिस भोपाल एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहा था, उसी में देर रात झांसी से सिर से कंधों तक सामान लादे मजदूर पति-पत्नी भी चढ़े, जिस पर महिला की गोद में एक मासूम बच्चा भी था। इस ट्रैन में सैकड़ों की तादाद में मजदूरों के झुंड के झुंड दिल्ली पलायन कर रहे थे। सुबह मैंने बातचीत की तो उन्होंने बताया कि उनके गांव में मजदूरी करने लायक काम नहीं है, इसलिए वे शहर जाने को मजबूर हैं।

 ”ससुर को देवर के जिम्मे छोड़ा है,” पूछने पर महिला यह तो बताने को तैयार है, लेकिन और ज्यादा पूछने पर लगा कि वह नहीं चाहती उनकी भूख और ससुर की रोटियों के इंतजाम जैसी बातों पर आगे और बातें हों। उन्होंने उनके परिवार की गरीबी को जहां-तहां से ढकने की कोशिश की, फिर भी उनकी गरीबी इस संवाददाता की आंखों से बच नहीं सकी। बाद में मैंने उनकी गरीबी पर विस्तार से लिखकर उनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया। यदि उसके कुछ दिनों बाद मुझे अपनी गलती का अहसास नहीं होता तो पता ही नहीं चलता कि मैंने उनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया।

लंबे अरसे बाद मुझे मेरी आंखों से मेरे गांव दिखाई दिए। फिर ‘गरीब’ और ‘गरीबी’ इन दो शब्दों के परिदृश्य में मैंने मेरी दृष्टि तलाशनी शुरू की। मैंने रिपोर्टिंग के दौरान असंख्य लोगों से इस बारे में पूछताछ की। मैंने पाया कि गरीब से गरीब आदमी मानता है कि गरीबी अभिशाप है और चाहता है कि गरीबी पर लिखा जाए, लेकिन उसकी भावना यही है कि उसका नाम लेकर उसके हिस्से की गरीबी इस तरह न बयां हो कि उसके आत्मसम्मान का ही गला घोंट दें।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले मैंने गरीबी पर इस तरह स्टोरी लिखते हुए किसी से बात नहीं की थी, लेकिन गरीबी और पलायन के दौरान दिल्ली जा रहे उस मजदूर परिवार की स्टोरी को इत्तेफाक से एक दिन पढ़ते हुए मैं अहसासों की गलियों से अचानक अपने गांव के उन दिनों में पहुंच गया, जहां मुझे मेरी गलती का अहसास कराया। दुबेजी मास्साब ने गांव की स्कूल की पांचवी कक्षा में सारे बच्चों के सामने काफी देर से खड़ा किया हुआ है, मौका है- ‘गरीबी की समस्या’ पर लिखे मेरे निबंध पर शाबाशी देने का, फिर भी मैं हूं कि जल्द दौड़कर अपनी जगह की फट्टी पर बैठकर सिर छिपाना चाहता हूं, क्योंकि मेरी शर्ट की बांई बांह फटी हुई है और लगातार दो-तीन रोज से पहनते-पहनते मुझे भी पता है कि सबको पता चल गया है यह (शर्ट) बहुत मैली हो गई है। फिर भी सबके सामने से दौड़कर मैं फट्टी पर इसलिए बैठ जाना चाहता हूं कि एक साथ और अलग-अलग देख रहीं कई छोटी-छोटी नजरों से एक झटके में नजर बचा सकूं, बस!

”मुंह क्यों लटकाया है? अच्छा लिखा है, कुछ बोलो भी!” दुबेजी मास्साब की इस प्यार भरी डांट ने मेरी मुश्किल और बढ़ा दी है, क्या बोलूं अब? नजर तो शर्म से जमीन में ही धंस जाने को है! लेकिन, अगले ही क्षण मास्साब ने ही मानो मेरी मुश्किल आसान कर दी हो- ”जो अच्छा लिखे, जरुरी नहीं कि अच्छा बोले ही।” और आज भी मेरे करीबी दोस्तों को यही लगता है कि मैं लिखता ठीक हूं, पर वैसा बोल नहीं पाता। मुझे भी यही सच लगता है। न जाने कैसी झिझक और अविश्‍वास है मन में कि आज भी मंच पर खड़ा कर दो तो सांसें फूलने लगती हैं! और यह भी कोई नई बात नहीं है कि मैं अक्सर नजरें बचाता हूं। असल में तो बचपन से ही दौड़-दौड़कर नजरें बचाता आ रहा हूं। बावजूद इसके, यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मदनपुर के स्कूल से सालों बाद तक कई नजरें मेरा पीछा कर रही हैं और मैं हूं कि बस दौड़े जा रहा हूं…

और मुझे लग रहा है कि तब से गरीबी की जो भी रेखा और परिधि हो, सरकार ने गरीबी की कितनी भी परिभाषाएं बदली हों, एक बात अपनी जगह पर स्थिर है और वह यह है कि मेरे साथ मिडिल क्लास के कुछ साथी और वरिष्ठजन भी दौड़ रहे हैं। हालांकि, इसके पहले तमाम असुविधाओं के बावजूद वे अपने-अपने हिस्से की गरीबी पर पर्दा डाल रहे होते हैं। भले ही असुविधाओं की इनकी सूचियां एक-दूसरे से थोड़ी छोटी और बड़ी हों, फिर भी शायद ही कोई संवाददाता हो जो दुनिया के सामने ‘बेचारा’ दिखने की ‘बेचारगी’ झेलना चाहे। लेकिन, यह कितनी अजीब हालत है कि अपनी सच्ची कहानी के लिए उसे कोई-न-कोई एक ‘बेचारा’ चाहिए।

इन बातों ने मेरे जहन में ऐसा असर छोड़ा है कि मुझे आगे कदम बढ़ाते हुए खुद को बार-बार रोकना पड़ रहा है, क्योंकि एक ही तरह के कई सवाल उलट-उलटकर और रह-रहकर मेरे कानों से टकरा रहे हैं-

”तुम्हारा कोई हमदर्द यदि तुम्हें गरीब कहे तो? तुम्हारी सुविधाओं और हकों के पक्ष में आवाज उठाने के बावजूद यदि वह तुम्हारी गरीबी के उन अनछुए जख्मों पर नमक छिड़क दे जिन पर अंगुली रखने से तुम खुद अब तक बचते आए हो तो?…वह तुम्हारी जिंदगी के उन अनदेखे दृश्यों को दुनिया के सामने इस तरह से रखे, जिन्हें देख तुम शर्मिन्दा हो जाओ तो?…यह सच है कि अभावों से तंग आकर तुम भले ही चाहते हो कि तुम्हारी शिकायत सही व्यक्तियों और जमाने तक पहुंचे, लेकिन तुम्हारी कहानी कहने वाला तुम्हारे लाख न चाहते हुए भी यदि तुम्हारी भूख और लाचारगी को जगजाहिर कर दे तो?…और उस पर हालत यह कि तुम्हारी चुप्पी में छिपे संकोच को वह समझ ही नहीं पाया हो तो? वह तुम्हारी चुप्पी को मौन-स्वीकृति मान बैठा हो तो? जिस पर वह संतुष्ट है कि उसने तुम्हारे साथ न्याय किया हो तो?”

ये सारे सवाल मैं खुद से पूछ रहा हूं, लेकिन खुद की भूमिका से बाहर निकलकर और खुद को पीड़ित की जगह पर रखकर, क्योंकि मैं बहुत भीतर से अपनेआप को यह अहसास कराना चाहता हूं कि जब कोई संवाददाता पीड़ित की पैरवी कर रहा होता है तो असल में वह उसके साथ कितना अन्याय कर रहा होता है! उसकी कहानी कहने का अंदाज और शब्दों का इस्तेमाल कई बार अनजाने में ही सही, पीड़ित को कितना अधिक पीड़ा देने वाला होता है! और जैसे ही मुझे इस पीड़ा का अहसास होता है वैसे ही उस प्रकाशित रिपोर्ट सहित ऐसी कई सारी रिपोर्टों को फाड़ता नहीं, जला देता हूं। जैसे मैंने कभी ये ब्यौरे लिखे ही नहीं। तय किया है कि आगे जब कभी गरीबी पर लिखा भी तो आदमी के आत्म-सम्मान और उसके स्वाभिमान का ख्याल रखने की पूरी कोशिश करुंगा और बहुत जरूरी न हुआ तो उनके नाम और उनकी पहचान छिपा लूंगा।

यदि मेरी कहानियों को मुझे फिर से लिखने का मौका मिले तो यही कोशिश रहेगी कि कुछ शब्दों का प्रयोग किए बगैर भी मामले को संवेदनशील तरीके से कैसे बयां किया जा सकता है, इसको साध सकूं। उन पति-पत्नी से यह जरूर पूछना चाहूंगा कि उनके बारे में उन्हें किस तरह के संबोधन पसंद नहीं हैं। इस बात का भी ध्यान रखूंगा कि रियायतों की उम्मीदें कहीं उनकी निजता को तो चोट नहीं पहुंचा रही हैं। यदि वही मजदूर परिवार मुझे किसी जगह दोबारा मिले तो पूछना चाहूंगा कि उनके बारे में जो लिखा गया है उसे लेकर वे असहज तो नहीं! और यदि हैं तो इस संवाददाता को बेझिझक झिड़क दें। मैं उन्हें बताना चाहूंगा कि बात सिर्फ इतनी नहीं है कि समय-अभाव और अन्य कारणों से मेरे लिए इन अहम बातों का पालन करना मुश्किल था, असल बात तो यह है कि चेतना के स्तर पर मैं जाग ही नहीं रहा था।

विज्ञान की किताबों में निकट दृष्टि-दोष और दूर दृष्टि-दोष के बारे में पढ़ा था। लेकिन, दोनों में अंतर कभी नहीं कर पाया। हमेशा ही भम्र की स्थिति बनी रहती हैं। कहने में कोई संकोच नहीं कि पत्रकारिता में भी मेरा यही हाल है। मुझे लगता है कि यदि पत्रकारिता के पूर्व बचपन का अहसास कहीं-न-कहीं काम नहीं कर रहा होता तो बहुत बाद तक और शायद आखिर तक इन दोनों दृष्टि-दोषों के बारे में नहीं जान पाता। पत्रकारिता में गांवों को देखने के शुरुआती अभ्यास के आधार पर संदेह है कि इन दृष्टि-दोषों से पूरी तरह से निजात पाना आगे आसान होगा!

”…यह उम्र मौज-मस्ती, पढ़ने-लिखने और दुनिया को जानने-समझने की है,” तो क्या जर्नलिस्ट बनने की जल्दी ने मुझे दृष्टि-दोष का शिकार बनाया? इतना तो है ही कि पहले ही पड़ाव में मुझे दृष्टि-दोषों के बारे में आभास हुआ। लेकिन, यह पता नहीं है कि मैं निकट दृष्टि-दोष का शिकार हूं या दूर दृष्टि-दोष का। मतलब यह कि मुझे नहीं पता कि रिपोर्टिंग में मुझे दूर की चीजें निकट से दिखाई देंगी या निकट की चीजें दूर से दिखाई देंगी। अब मुझे सहारा है तो बचपन के अहसासों का। इन्हीं अहसासों के बूते यात्रा पर चला हूं, नहीं जानता आगे तूफान होंगे या आंधियां आएंगी।


shirish khareशिरीष खरे। स्वभाव में सामाजिक बदलाव की चेतना लिए शिरीष लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक भास्कर , राजस्थान पत्रिका और तहलका जैसे बैनरों के तले कई शानदार रिपोर्ट के लिए आपको सम्मानित भी किया जा चुका है। संप्रति पुणे में शोध कार्य में जुटे हैं। उनसे shirish2410@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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