अरुण प्रकाश

आए दिन देश में धरना-प्रदर्शन हो हंगामा होता रहता है, लेकिन क्या हमने कभी समान शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए संघर्ष किया। अगर किया होता तो आज हमारी ज़िंदगी का स्तर ही कुछ और होता। ये विचार हैं दिल्ली में करोलबाग के एसडीएम प्रशांत कुमार के। प्रशांत कुमार स्वभाव से बेहद सरल और शालीन और बतौर प्रशासक बेहद अनुशासन प्रिय और संवेदनशील हैं। पिछले दिनों करोलबाग एसडीएम ऑफिस में उनसे मुलाकात हुई।

 

मैं दोपहर करीब 12.30 बजे करोलबाग एसडीएम दफ्तर पहुंचा तो पता चला कि प्रशांत जी ऑफिस के काम से अभी बाहर हैं थोड़ी देर में आ जाएंगे। खैर मैं इंतजार करने लगा, करीब 10 मिनट बाद प्रशांत जी ऑफिस आए और सीधे अपनी सीट पर बैठ गये। बाहर कुछ फरियादी उनका इंतजार कर रहे थे, लिहाजा दो मिनट मुझसे हालचाल लेने के बाद वो अपने काम में मशगूल हो गए। एक-एक कर फरियादियों को अंदर बुलाया गया। जिस वक्त लोग अपनी समस्याएं सुना रहे थे तो मैं वहां बैठा एसडीएम प्रशांत कुमार के हाव-भाव और समस्या को सुलझाने के कौशल की बारीकी को देख रहा था।

प्रशांत कुमार मूलत बिजनौर के रहने वाले हैं। उन्होंने मूर्ति देवी सरस्वती इंटर कॉलेज से आरंभिक शिक्षा हासिल की। इसके बाद आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैंपस में खुद को निखारा। शिक्षा के लिहाज से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के दिनों को वो काफी अहम मानते हैं। उनकी माने तो जेएनयू से उन्हें समाज और उसकी समस्याओं को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने का मौका मिला। 

समस्याएं छोटी हों या फिर बड़ी प्रशांत जी फरियादी की बात पूरी तल्लीनता से सुनते और सामने वाले को अपनी बात रखने का पूरा वक्त भी देते। यही नहीं फरियादी की समस्या को टालने की बजाय, वो आगे की कार्यवाही फौरन शुरू कर देते।  यही नहीं अगर फरियादी के लिए कोई लेटर तैयार करना है तो वो खुद एक पेपर पर लिखकर उसे अपने सहयोगी स्टाफ के सुपर्द कर रहे थे। इस हिदायत के साथ कि सामने वाले को दोबारा ऑफिस आने की जरूरत ना पड़े।काफी देर तक ये सिलसिला यूं चलता रहा। जब बाहर कोई फरियादी नहीं बचा तो हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। डैनिक्स कैडर के अधिकारी प्रशांत कुमार इससे पहले दादर और नागर हवेली में तैनात रह चुके हैं। लिहाजा मेरा पहला सवाल उनसे यही रहा कि दादर नागर हवेली के मुकाबले दिल्ली में आपके सामने क्या चुनौतियां हैं?

मेरे इस सवाल ने प्रशांत जी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान बिखेर दी, लेकिन अगले ही पल चेहरे के भाव बदल गये। शायद ये फर्क दादर और नागर हवेली की तुलना दिल्ली के हालात से करने को लेकर था। मैंने पूछा कि आखिर दिल्ली में बतौर एसडीएम आपके सामने मुश्किल क्या है? उनका जवाब था सच कहूं तो दिल्ली का प्रशासन जनता के लिए एक पहेली की तरह है। दिल्ली में ज्यादातर लोगों को ठीक से मालूम ही नहीं है कि उनकी समस्या का समाधान किसके पास है? मसलन बारिश का मौसम है और किसी इलाके में नाला जाम होने से जलभराव होता है तो पब्लिक शिकायत एमसीडी से करे या डीडीए से या फिर पीडब्ल्यूडी से उसे पता नहीं होता?

एसडीएम प्रशांत कुमार ने एक उदाहरण के जरिए अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि एक बार उनके पास करोलबाग के एक इलाके से जलभराव की शिकायत आई। जब वो मौके पर पहुंचे तो सीधे एमसीडी दफ्तर फोन लगाकर नाला साफ करने का निर्देश दिया। उधर से जवाब आया कि ये नाला एमसीडी के नहीं बल्कि पीडब्ल्यूडी के अधीन है। जब PWD से संपर्क किया गया तो जवाब मिला कि ये नाला डीडीए के अंतर्गत आता है। डीडीए ने एमसीडी पर ठीकरा फोड़ा। कुल मिलकार के एक काम के लिए तीन विभागों में बात करनी पड़ी। प्रशांत जी ने बताया कि उन्होंने तीनों विभाग के संबंधित अधिकारी को मौके पर बुलाया तो एमसीडी ने ये मान लिया कि ये नाला उसके दायरे में है। वो कहते हैं- “अब आप खुद अंदाजा लगाइये कि बतौर एसडीएम अगर मुझे इतनी मुश्किल झेलनी पड़ी तो दिल्ली की जनता को हर दिन ऐसी समस्याओं से कितनी बार दो-चार होना पड़ता होगा।”

प्रशांत जी से बातचीत के दौरान कुछ और शिकायतकर्ता आ गए। प्रॉपर्टी विवाद को लेकर दो पक्ष एसडीएम के दरबार में गुहार लगाने आए थे। दोनों पक्ष एक साथ अपनी-अपनी बात रखने लगे। तभी प्रशांतजी ने पहले दोनों को शांत होकर बैठने के लिए बोला और खुद प्रॉपर्टी के पेपर देखने लगे। साथ ही एक-एक कर सवाल पूछते रहे। एक पक्ष बार-बार दलील दे रहा था कि सर मामला हाईकोर्ट में है, फिर भी सामने वाला वहां तोड़फोड़ कर रहा है। दूसरे पक्ष की दलील थी कि विरोधी पक्ष उनके घर में तोड़फोड़ कर रहा है। करीब 10 मिनट तक दोनों पक्ष की शिकायत सुनने के बाद प्रशांत जी ने मौके के निरीक्षण का फैसला किया और कुछ नोट्स भी बना लिए। अपनी टीम को अगले दिन मुआयना करने का आदेश दिया।

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए जब मैंने पूछा कि आखिर आपको सबसे ज्यादा सुकून कब मिलता है तो उनका जवाब था– ”जब मैं सही व्यक्ति को सही चीज डिलीवर कर देता हूं तो मेरे लिए वो सबसे ज्यादा सुकून भरा होता है। मेरे काम से जरूरतमंद को फायदा मिलता है तो मुझे सुकून मिलता है।’’ साहित्य में गहरी अभिरुचि की वजह से वो अपनी बातों को एक किस्से या उदाहरण के साथ पुष्ट करते चले जाते हैं।

प्रशांतजी ने बताया,  कुछ दिन पहले की बात है, ख़बर आई कि एक पिता ने अपने बच्चों को घर में कैद कर रखा है और बच्चों की दिमागी हालत ठीक नहीं है। जब वो मौके पर मुआयना करने पहुंचे तो शिकायत के उलट स्थिति देखने को मिली। बच्चे सामान्य हालात में नज़र आए और बच्चों ने पिता के खिलाफ कोई शिकायत भी नहीं की। एक बेटी उन दिनों अस्पताल में भर्ती थी। सोचा एक दिन अस्पताल जाकर उस लड़की से भी मिलूंगा, लेकिन काम की व्यस्तता की वजह से कई दिन गुजर गए। पता चला कि उस लड़की की मौत हो गई। ये ख़बर सुनकर मुझे बड़ी आत्म-ग्लानि हुई और मैंने फैसला किया कि एक बार फिर उसकी बहनों का सही-सही हाल जानने की कोशिश करूंगा। लिहाजा इस बार मैंने कुछ संस्थाओं की मदद ली और स्थानीय लोगों से बात की। स्थानीय लोग बच्चों की दुर्दशा के बारे में तो बताते लेकिन जब हमारी टीम जाती तो माहौल बदला-बदला रहता। खैर कई दिन तक निगरानी के बाद आखिर एक दिन एक एनजीओ की मदद से सच का पता चला और उन बच्चों को वहां से निकालकर एक चाइल्ड होम में सुरक्षित रखा गया।

इसके बाद मैंने दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहे काम-काज को लेकर सवाल किया। उन्होंने कहा कि इस वक्त देश में जरूरत है समान शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की। यही वो चीज है, जिससे समाज में समानता लाई जा सकती है। इसके लिये मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए और समाज के लोगों की सोच में बदलाव आना चाहिए। प्रशांत कुमार ने कहा कि जिन अग्रेजों की बनाई शिक्षा और स्वास्थ्य नीतियों पर आज हम चल रहे हैं, उसी ब्रिटेन में आज इस तरह की व्यवस्था नहीं है। हमें गंभीरता से विचार करना होगा कि आखिर हमारी नीतियों में शिक्षा और स्वास्थ्य को कितनी अहमियत दी जा रही है। प्रशांत कुमार की माने तो बेहतर शिक्षा का मतलब ये नहीं है कि सिर्फ क्लास रूम में एसी, कूलर, फैन लगा हो बल्कि शिक्षा का मकसद सर्वांगीण विकास होना चाहिए।arun profile1


अरुण प्रकाश। उत्तरप्रदेश के जौनपुर के निवासी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।

 

संबंधित समाचार