विक्रांत बंसल

आज हम भारत के किसी भी कोने में क्यों न रह रहे हों पानी की समस्या मुंह बाएं हमारे सामने खड़ी है। गर्मियों में तो ये समस्या कई बार बहुत सी जिंदगी भी लील लेती है। आए दिन खबरें आती हैं कि देश के इस कोने में सूखा पड़ गया तो कभी देश के उस कोने में सूखा पड़ गया। इस समस्या का सबसे पहले शिकार होते हैं हमारे किसान। भारत की ज्यादातर आबादी आज भी गांवों में बसती है और खेती पर आश्रित है। हम सोचते है गर्मी है तो पानी का संकट तो होगा ही लेकिन अब क्या सर्दी और क्या गर्मी। पूरे देश के हर कोने में लोगों को पानी के लिए जूझना पड़ रहा है।  हाल ही में नीति आयोग ने एक इंडेक्स निकाला है, जिसे कंपोसिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स कहते है। जिसे देखने के बाद हमें अपने कल के लिए चिंता जरूर करनी चाहिए ।

क्या कहती है नीति आयोग की रिपोर्ट

नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि देशभर में 75% घरों में पीने के पानी का संकट मंडरा रहा है और 2030 तक तो देश की 40 फीसदी आबादी के पास पीने का पानी तक नहीं होगा। इसमें राजधानी दिल्ली भी शामिल है। दिल्ली समेत देश के 21 बड़े शहरों में 2020 तक भूजल लगभग नहीं बचेगा।  रिपोर्ट कहती है कि इतिहास में पानी की ऐसी कमी पहले कभी नहीं देखी गई। तो सवाल ये है कि सरकारें क्या कर रही हैं, क्योंकि 84 फीसदी ग्रामीण घरों में पाइप से पानी आता नहीं, देश का 70% पानी आर्सेनिक और फ्लोराइड से दूषित है। पानी की गुणवत्ता के मामले में 122 देशों में भारत का स्थान 120वां है। तमिलनाडु में करीब 374 इलाके ऐसे है जहां ग्राउंड वॉटर की स्थिति चिंताजनक है। देश के 91 बड़े जलाशयों में क्षमता के मुकाबले आधा पानी भी नहीं है। ग्रामीण भारत के 6 करोड़ 30 लाख लोगों की पहुंच साफ पानी तक नहीं है। दुनिया भर के करीब 10 फीसदी प्यासे लोग भारत के ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।

खत्म हो रहा है पानी

देश में पानी के स्रोत्र लगातार खत्म हो रहे हैं। देश हर दिन पानी की कमी की ओर बढ़ रहा है। ध्यान रहे कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा-यमुना जैसी नदियों को जीवित व्यक्ति का वैधानिक दर्जा दिया हुआ है। कोर्ट ने कहा कि ना सिर्फ गंगा, यमुना बल्कि इनकी सहायक नदियों और इनसे निकलने वाली नदियों को भी जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया जाए, लेकिन क्या कोर्ट के कह देने भर से ज़मीनी स्तर पर सब कुछ ठीक हो जाएगा ।  क्या सरकारें कोर्ट के आदेश का क्रियान्वयन करवा पा रही हैं, क्या लोग पानी की बर्बादी को लेकर संजीदा है।

दूषित पानी पीने को मजबूर लोग 

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पूरी दुनिया में 180 करोड़ लोग दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हैं। नदियां प्रदूषण का शिकार है । यमुना और गंगा जैसी महान और पावन नदियां भी प्रदूषण की वजह से तम तोड़ती जा रही हैं । लिहाजा हमें इसके समस्या और समाधान पर गंभीरता से विचार करना होगा ।

समस्या 1–  पानी की किल्लत की सबसे ज्यादा मार गरीब किसान पर पड़ती है। सूखे के कारण किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आये दिन सुनने को मिलती हैं ।

समस्या 2- भारत में तकरीबन 40% भूमिगत जल का इस्तेमाल किया जाता है। खास बात ये है कि अमेरिका और चीन मिलकर जितना भूमिगत जल का उपयोग करते हैं उतना तो अकेला भारत ही कर लेता है। जिस तरह धीरे-धीरे भूमिगत जल कम होता जा रहा है,  क्या हमने कभी सोचा है कि अगर ये भूमिगत जल खत्म हो गया तो हम क्या करेंगे।

समस्या 3-  2016-17 पूरी दुनिया के लिए सबसे गर्म साल रहा। गर्मी बढ़ने से पानी का भाप में बदलना स्वभाविक है जिससे नदियां तालाब सूखने लगते है और बायो डाइवर्सिटी के ऊपर नकारात्मक प्रभाव होता है।  धीरे-धीरे हम ग्लोबल वॉर्मिंग में जकड़ते जा रहे हैं।

कितना जरुरी है पानी

इंसानी जिंदगी की हर जरुरत के लिए पानी चाहिए।  वैज्ञानिक कहते हैं इंसान ज्यादा से ज्यादा 4 दिन बिना पानी जिंदा रह सकता है। पानी के बिना हमारे आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब मर जाएंगे। कुछ लोग कह सकते हैं कि धरती का 71 फीसदी हिस्सा तो पानी में डूबा हुआ है फिर हमें पानी के लिए इतनी चिंता क्यों हो रही है । तो आपको ये बात याद रखना चाहिए कि ये पानी हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ना काफी है।  इस पानी में पीने लायक पानी 3% से भी कम है और इस 3 फीसदी पानी का भी एक बड़ा हिस्सा हमारी पहुंच से बाहर है।

पीने लायक पानी का 30 फीसदी हिस्सा भूमिगत जल है, जिसे हम अंधाधुंध निकालते जा रहे हैं और अपनी हालिया जरुरतें पूरी करते जा रहे हैं। दुखद बात तो ये है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकरण के चक्कर में हमने पानी के रीस्टोर या रिचार्ज के सभी रास्ते बंद कर दिए है।  इसीलिए ये कोहराम मचा है और पूरी दुनिया संकट में है। यही हाल रहा तो साल 2030 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी पीने के पानी से तो महरूम हो जाएगी।  यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट बताती है कि 2050 के मध्य तक भारत के मौजूदा पानी में और 40 फीसदी की कमी आ जाएगी।

समाधान 

देखा जाए तो प्राकृतिक तौर पर देश में पानी की कमी नहीं है, लेकिन पानी की बर्बादी से ये मुसीबत पैदा हो गई है। पानी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए  कुछ कदम उठाने जरुरी हैं जैसे- नीतियों पर दोबारा विचार करने की जरुरत है। इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना होगा लेकिन पानी की बर्बादी न हो इसका ध्यान रखकर। जन जागरुकता कार्यक्रमों को प्रसारित करने की जरुरत है। इतना ही नहीं बोरवेल और सबमर्सिबल लगावाने के बढ़ते चलन को रोकना भी जरुरी है। जरुरी नहीं है कि अगर किसी ने जमीन का एक टुकड़ा खरीद लिया तो उसके नीचे के पानी पर उसका अधिकार हो गया और जो जब चाहे सबमर्सिबल या बोरवेल निकाल अपनी जरुरत को पूरा कर ले। इसे राष्ट्रहित का ध्यान रखते हुए बंद करने की जरुरत है। जैसे बिजली के लिए मीटर जरुरी है वैसे ही पानी के लिए भी मीटर जरुरी है ताकि लोग अपनी जरुरत का ध्यान रखें और उसके मुताबिक ही इस्तेमाल करें। फ्री वॉटर देश को कल के आने वाले बड़े संकट में डाल सकता है।

बारिश का पानी

हर बार बरसात में हम बारिश के पानी का करीब 8 फीसदी हिस्सा ही बचा पाते हैं और तकरीबन 92 फीसदी पानी बेकार हो जाता है। हमारे पास इतना बड़ा रिसोर्स है, फिर भी हम इसके बारे में गंभीरता से विचार करना नहीं चाहते । हम सभी अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हैं लेकिन कर्तव्यविमूढ़ हैं। मतलब ये कि अधिकार और कर्तव्य के बीच हम अधिकारों को तो महत्व देतें हैं लेकिन कर्तव्य भूल जाते हैं ।

जनता की सेवा करना सिर्फ सरकारों की ही नहीं बतौर नागरिक हमारा भी उतना ही दायित्व हैं। जितना हमारे आज और कल के लिए निकम्मी सरकारें दोषी हैं उतना ही हम भी हैं। सिर्फ सवाल उठाने से बात नहीं बनेगी समस्या सुलझाने के लिए खुद एक समाज के तौर पर हमें भी कदम उठाने होंगे। ये बदलाव हर घर से होगा तभी दूर तलक जाएगा ।


विक्रांत बंसल /टीवी पत्रकार, लंबे वक्त से मीडिया में सक्रिय ।

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