डाॅ॰ संजय पंकज

बिहार के मशहूर चित्रकार राजेंद्र प्रसाद गुप्ता की कृति

प्रकृति और पुरुष का आकर्षण सृष्टि के प्रारंभ का एक विराट निदर्शन है। उस गोपन रहस्य में जाने की अब बहुत जरूरत नहीं कि पहले स्त्री आयी या पहले पुरुष आया। सृष्टि का आरंभ कहाँ से है इस पर वैश्विक ज्ञानधाराओं ने बार-बार अन्वेषण, चिंतन और मनन किया है। मानवीय विकास के क्रम में ज्ञान पिपासा और जिज्ञासा भी बलवती होती रही है। सम्पूर्ण संसार ने अपने-अपने ढंग से ब्रह्माण्ड के भेदों को जानने का और खोलने का प्रयास किया है। सफलता कितनी मिली है इसका कोई अंतिम निर्णायक नहीं है। प्रकृति का स्त्री-रूप परम आकर्षक होता है।

ज्ञानियों ने स्त्री को माया कहा। माया भरमाती है। वह बुद्धि को स्थिर नहीं रहने देती है। कथा है कि समुद्र-मंथन से जब अमृत निकला तो उसे पीने के लिए देव-दनुज आपस में लड़-भिड़ गये। भगवान विष्णु ने मोहिनी (स्त्री) का रूप धारण किया। दनुज दल रूप सम्मोहन में फंस गया। देवताओं को अमृतपान करा दिया गया। एक और कथा है कि भगवान भोलेनाथ ने भस्मासुर पर प्रसन्न होकर उसे किसी के सिर पर हांथ रखते ही भस्म कर देने का वरदान दे दिया। भस्मासुर आशुतोष शिव के सिर पर हाथ रखने की मंशा से यह सोचकर आगे बढ़ा कि ऐसा वरदान भोलेनाथ किसी और को नहीं दें। इसलिए इन्हें ही भस्म कर दिया जाए। शिव भागे। पीछे-पीछे भस्मासुर। फिर तो शिव की प्राण रक्षा स्त्री-शक्ति ने ही की।

सृष्टि के प्रारंभ में ही स्त्री की रहस्यमयता में पुरुष फंस गया। तबसे आज तक स्त्री को जानने की कोशिश चल रही है। स्त्री को अगर समग्रता में जान-समझ लिया गया होता तो फिर उसके पक्ष या विपक्ष में नित नयी-नयी बातें नहीं आतीं। अगर भर्तृहरि ने यह कहा ‘त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यम् दैवो न जानति कुतो मनुष्यम्’ तो इसका अर्थ स्त्री-आचरण से कम संभवतः इसकी अनंत प्रकृतिसत्ता से ज्यादा है। प्रकृति की तरह बाहर से ज्यादा आंतरिक रूप से सघन, गंभीर और अन्तर्गुंफित है स्त्री-शक्ति और सत्ता। स्त्री-संवेदना का विस्तार मापा नहीं जा सकता।

स्त्री हर काल में संघर्ष करती हुई अपनी विराट सत्ता को स्थापित करती रही है। पुरुष वर्चस्व ने उसकी अवमानना की, मगर उसे नकार नहीं सका। पुरुष के होने में स्त्री के खो जाने की शक्ति निहित है। स्त्री के विसर्जन में पुरुष-सृजन की दीप्ति अंतर्निहित होती है। विपरीत सत्ता में संघर्ष की प्रक्रिया निरंतर घटित होती रहती है। यह भले ही वर्चस्व का मामला हो लेकिन सृजनचक्र भी इसी कारण गतिशील रहता है। वैदिक काल की स्त्री ‘अपाली’ ने पुरुष के वर्चस्व को नकारा था। ‘माधवी’ ने उसके नियमों को धिक्कारा था। ‘स्व’ का बोध रूढ़िबद्ध-परम्परा के विरोध में खड़ा होने के लिए विवश कर देता है। स्त्री का विरोध सहज प्रकृतिगत विरोध होता है।

बिहार के मशहूर चित्रकार राजेंद्र प्रसाद गुप्ता की कृति

वैदिक-पौराणिक काल की स्त्री ‘माधवी’ ने भी पुरुषों के बनाये अमानवीय प्रावधान को नकार दिया था। ऋषि से विवाह कर देने के बाद ‘माधवी’ समर्पित होकर गार्हस्थ्य जीवन को जी रही थी। एक दिन ऋषि ने ‘माधवी’ को एक पर-पुरुष को दान में दे दिया। ‘माधवी’ दूसरे की पत्नी हो गयी। कुछ समय बाद वहाँ से भी वह किसी और को दान के रूप में उपलब्ध हो गयी। एक पुरुष के बाद दूसरे पुरुष तक वह बार-बार बंटती रही। उसका दान होता रहा। हर पुरुष ने उसे मन और आत्मा नहीं समझ कर, वस्तु समझा। इस प्रक्रिया में वह प्रौढ़ हो गयी। कई बच्चों की माँ बनी। हर बच्चा भी बाप के घर छूटता रहा। वह अकेली स्त्री बार-बार एक के बाद दूसरे किसी-किसी की पत्नी बनती रही। पत्नी क्या बनी, वासना की पूर्ति का संसाधन बनती रही।

बीस बार से अधिक ही वह एक पुरुष के बाद दूसरे पुरुष को दान और उपहार में मिलती रही। सही अर्थ में किसी ने उसका वरण नहीं किया, उसे प्राप्त नहीं किया। वह दान की इस अमानवीय प्रक्रिया से टूट चुकी थी। उसने अगले पुरुष के पास जाने से अस्वीकार कर दिया। वह चीख पड़ी थी-‘‘आखिर कब तक मैं इस तरह एक घर से दूसरे घर तक, एक पुरुष से दूसरे पुरुष तक नरक-दर-नरक बंटती और वितरित होती रहूँगी। सबने अपने भोग की चाहना का सम्मान किया। मेरे बारे में किसी ने नहीं सोचा। मुझे भी जीने का अधिकार है। अगर विकास की गति और संसार की स्थिरता तथा निरन्तरता में हमारा योगदान है तो सबकुछ पर हमारा भी स्वाभाविक हक बनता है।’’

माधवी के प्रतिवाद ने स्त्री के अधिकार के बारे में शायद पुरुष प्रधान समाज को तभी से सोचने के लिए विवश कर दिया होगा। स्त्री को भी जीने के लिए परिवार में सम्मान और सम्पत्ति में अधिकार चाहिए। इस तरह के अनेक विद्रोही स्त्री-चरित्र भरे हुए हैं। एक अकेली स्त्री ने जब भी पूरे मन से, दृढ़ता और संकल्प के साथ सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया है तो परिवर्तन हुआ ही है। ‘एक अकेली स्त्री/इतनी भी कमजोर नहीं होती/कि वह आग से/अपना रिश्ता तोड़ ले।’’

स्त्रियों को अपनी सत्ता, अपने मान, स्वाभिमान और अधिकार का स्वयं ही सम्मान करना पड़ेगा। समर्पण ठीक है, लेकिन जाग्रत सत्ता अगर रीढ़हीन हो जाए तो उसके अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो जाना तय है। स्त्री-अस्तित्व का संकट पुरुषवादी समाज और मानसिकता की देन है। मगर यह भी सच है कि इसके लिए स्त्री भी कम दोषी नहीं है। संघर्ष, स्वाभिमान और शौर्य से क्रांतिकारी परिवर्तन बार-बार हुए हैं। अब पूरे विश्व की स्त्रियाँ जाग्रत और सचेत हैं। शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि ने उनकी आँखें खोल दी हैं। मर्यादा, शील और संस्कृति में रहकर भी स्त्रियाँ घर, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना सकती हैं। बार-बार अनेक महिमामयी स्त्रियों ने अपने होने को व्यापक परिदृश्य पर साबित किया है, स्थापित किया है।

बिहार के मशहूर चित्रकार राजेंद्र प्रसाद गुप्ता की कृति

स्त्री ने सहजता के साथ जब कभी भी अपनी शक्ति का सदुपयोग किया है, तब इतिहास का निर्माण हुआ है। वैदिक काल से वर्तमान काल तक अकेली स्त्री-शक्ति के अनेक उदाहरण हैं। शैलपुत्री पार्वती ने जब मन को दृढ़ कर लिया और संकल्प ले लिया तो उसे कोई डिगा नहीं सका। देवाधिदेव महादेव को उसने स्वामी रूप में प्राप्त किया। सुख-सुविधाओं में रहने वाली उस स्त्री-शक्ति ने दिगम्बर और औघरेश्वर शिव के साथ संकटों के बीच रहना स्वीकार किया। उसकी प्रज्ञा ने शिव को पहचान लिया था। इसीलिए पार्वती शक्ति का पूर्णावतार हो गयी।

रामकथा की केन्द्रीय शक्ति सीता जगतजननी हो गयी। छाया की तरह राम के साथ वह उनके वन-प्रवास काल में भी लगी रही। विपत्तियों का पहाड़ उस पर टूटा। दुःख और पीड़ा से लगातार वह त्रस्त होती रही, लेकिन उसका दृढ़ मन तनिक भी विचलित नहीं हुआ। विपरीत स्थितियों में भी वह अटल भाव से डटी रही, मगर स्त्री-गरिमा पर आंच नहीं आने दी। राम के पुरुषवादी संकीर्ण मन ने जब संशय किया तो सीता ने निश्चय-निर्णय लेने में भी विलंब नहीं किया। धरती की सहनशीलता लेकर अवतरित हुई सीता अपनी मर्यादा और गरिमा की रक्षा के लिए पुनः धरती में समाहित हो गयी।

अहिल्या हो, द्रौपदी हो, कुन्ती हो या इस श्रृंखला में कई और नारियां हों, सबने अपनी शक्ति का व्यापक परिचय दिया है। राजकुमार सिद्धार्थ बुद्धत्व प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध बनकर अपनी परित्यागी हुई पत्नी यशोधरा के पास भिक्षाटन करते हुए पहुंचे थे। सामाजिक, नैतिक तथा कई प्रकार के दंश झेलती रही यशोधरा। वह टूटी नहीं। स्वयं पर अटूट विश्वास था उसका। भगवान बुद्ध को भिक्षा के रूप में अपने एकमात्र अवलम्ब पुत्र राहुल को दान में दे दिया। यशोधरा की यह अद्भुत जीत थी। वह कभी हारी नहीं थी।

आदिशंकराचार्य से पराजित हो गये पति मंडन मिश्र को उनकी पत्नी भारती मिश्र ने ही उन्हें पराजय का अपमान नहीं अनुभूत होने दिया था। वह आगे बढ़कर आयी थी। शंकराचार्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। स्त्री के गोपन-रहस्यों को ब्रह्मचारी शंकराचार्य नहीं जानते थे। वे वहाँ से समय लेकर निकल गये और जब परकाया-प्रवेश की साधना से स्त्री के रति-संदर्भों को जान लिया तो फिर भारती मिश्र से शास्त्रार्थ करने आये थे। भारती ने विनम्रता से हाथ जोड़कर यह कहते हुए उन्हें बिना शास्त्रार्थ के ही जीत का गौरव दे दिया कि अब आप ब्रह्मचारी नहीं रहे। भले ही देह से आप नहीं थे लेकिन चेतना और बुद्धि तो स्त्री के साथ आपकी ही थी। इस तरह से अनेक महिमामयी स्त्रियों ने अपनी चेतना, बुद्धिमत्ता, प्रज्ञा और मनीषा की अपनी अकेली सत्ता से पताका लहरायी है।

ऐतिहासिक काल में छत्रपति शिवाजी की माँ हो या झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, उचित समय पर उचित निर्णय लेते हुए अपनी शक्ति की स्थापना की। आज भी स्त्रियों के लिए आदर्श ये स्त्री-शक्तियाँ निरंतर प्रेरित करती हैं कि अकेली स्त्री भी कमजोर नहीं होती है। वह अपनी दृढ़ता और अपने संकल्प से इतिहास का रुख मोड़ सकती है। समय की छाती पर अपने पद्चिह्न अंकित कर सकती है। उसकी आवाज दूर-सुदूर अन्तरिक्ष तक गूंजती रहती है। उसका होना मानवीय विकास की निरंतरता को गतिशील बनाये रहता है।

अपने संस्कार, संस्कृति और प्रकृति रूप में जब भी स्त्री अन्तर्भुक्त होती है तो सहज ही मुक्ति का द्वार खोलती है। उसके साथ समय, परिवेश, सत्ता और शक्ति सब स्वतः लग जाते हैं। पुरुष का कमजोर और शंकालु मन बार-बार विचलित होता है, मगर एक बार विश्वास कर लेने के बाद दृढ़ स्त्री अपने पथ से विचलित नहीं होती; भले ही उसका भौतिक रूप रहे या न रहे। स्त्री का अन्तर्मन बहुत ही सबल होता है। उसकी दृढ़ता स्थिर होती है। वह निरंतर विसर्जन में ही सृजन का द्वार खोलती रहती है।

स्त्री का सम्मान प्रकृति और ईश्वर का सम्मान है। जीवन का आधार अगर पृथ्वी है तो विस्तार का मार्ग स्त्री। जैसे अकेली पृथ्वी, अकेली हवा, अकेली अग्नि कभी भी अकेली नहीं होती उसकी सघनता ऐसी संश्लिष्ट होती है कि उसमें सार्वभौमिक शक्ति स्वाभाविक रूप में निहित होती है। अकेली स्त्री भी कभी अकेली नहीं होती। वह सृजन की प्रक्रिया के साथ-साथ कोमल और उद्दातवृत्तियों के बरक्स ध्वंस तथा कठोर और अनुदात्त स्वरलहरियां भी पैदा करती हैं। लय और प्रलय दोनों को अपने केन्द्र में रखकर स्त्री ध्वंसनृत्य ताण्डव को शांत और संतुलित करती है तो पुनर्जीवन और सौन्दर्यानंद गढ़ने के लिए लास्य में भी प्रवीण होती है। अकेली स्त्री विराट प्रकृति की प्रतिनिधि होती है।


संजय पंकज। बदलाव के अप्रैल 2018 के अतिथि संपादक। जाने – माने साहित्यकार , कवि और लेखक।  स्नातकोत्तर हिन्दी, पीएचडी। मंजर-मंजर आग लगी है , मां है शब्दातीत , यवनिका उठने तक, यहां तो सब बंजारे, सोच सकते हो  प्रकाशित पुस्तकें। निराला निकेतन की पत्रिका बेला के सम्पादक हैं। प्रेमसागर, उजास , अखिल भारतीय साहित्य परिषद, नव संचेतन, संस्कृति मंच , साहित्यिक अंजुमन, हिन्दी-उर्दू भाषायी एकता मंच जैसी संस्थाओं, संगठनों से अभिन्न रूप से जुड़े रहे हैं। हिन्दी फिल्म ‘भूमि’,’खड़ी बोली का चाणक्य ‘ तथा टीवी धारावाहिक ‘सांझ के हम सफर’ में  बेजोड़ अभिनय। आपसे मोबाइल नंबर 09973977511  पर सम्पर्क कर सकते हैं। 

 

संबंधित समाचार