जाने – माने साहित्यकार , कवि और लेखक डाक्टर संजय पंकज होंगे बदलाव के अप्रैल के अतिथि सम्पादक। मुजफ्फरपुर जिले के कटरा प्रखंड के ऐतिहासिक गांव वीरभूमि बेरई मे 5  दिसम्बर 1961  को पैदा हुए संजय पंकज  स्नातकोत्तर हिन्दी, पीएचडी योग्यता धारी हैं। मंजर-मंजर आग लगी है , मां है शब्दातीत , यवनिका उठने तक, यहां तो सब बंजारे, सोच सकते हो  आप की प्रकाशित पुस्तकें हैं। आपको दर्जनाधिक साहित्यिक – सामाजिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है। संजय पंकज  को कई साहित्यिक पत्रिकाओं का सम्पादन  करने का गौरव प्राप्त है। फिलहाल वे निराला निकेतन पत्रिका बेला के सम्पादक हैं। इसके अलावा वे प्रेमसागर, उजास , अखिल भारतीय साहित्य परिषद, नव संचेतन, संस्कृति मंच , साहित्यिक अंजुमन, हिन्दी-उर्दू भाषायी एकता मंच जैसी संस्थाओं, संगठनों से अभिन्न रूप से जुड़े रहे हैं। ये हिन्दी फिल्म ‘भूमि’,’खड़ी बोली का चाणक्य ‘ तथा टीवी धारावाहिक ‘सांझ के हम सफर’ में  बेजोड़अभिनय के लिए जाना जाता है। आप इनसे मोबाइल नंबर 09973977511  पर सम्पर्क कर सकते हैं। आपसे पत्राचार का पता है-  शुभानंदी , नीतीश्वर मार्ग, आमगोला, मुजफ्फरपुर –84002।

ब्रह्मानंद ठाकुर के बाद संजय पंकज बदलाव के दूसरे अतिथि संपादक है। खुशी की बात है कि अतिथि संपादन का रिले बैटन खुद ब्रह्मानंदजी ने ही संजय पंकज को थमाया है।


संजय पंकज की दो कविताएं

नदी का सतत प्रवाह

 कलकल छलछल करती
उछलती मचलती लहरें
जिसे चूमने उतरती हैं
सूरज की बेटियाँ
बहनों के संग आ जाती हैं
नृत्य करती हवाएं
सर्दी के दिनों में
नदी की कोख में
जा समाती है आग
और इन सबको
अपनी छाती में संभाले पृथ्वी
कभी इतराती नहीं
और अपनी नित्य सखी
प्रकृति से गलबहियाँ करती
पर्वत से सागर तक
नदी को बहने देती है अनवरत
पृथ्वी जानती है
कि प्रकृति पुरुष में
तो वह आकाश में अंतर्लीन है
ठीक वैसे ही सागर में
मिल जाती है नदी
दिन मास में, मास महीने में
मास वर्ष में और वर्ष सदी में
युगों से विलीन हो रहे हैं
यह एक निरंतर और शाश्वत यात्रा
शून्य के वृत्त में महाकाल का
अनीह नृत्य है
जो आत्मा परमात्मा के अटूट ,
अछोर और असीम संबंध को
लय -प्रलय में आनंदबद्ध करता है ।

लो फिर तना कुहरा घना !

हादसों का
फिर सिलसिला
किससे करें
शिकवा गिला
गूफ्तगू में
राजा यहाँ
फिर प्रजा पर
पहरा बना ।
डूबते को
डूब जाना
उस पर मना
कुनमुनाना
तिमिर से क्यों
रौशनी का
खौफ इतना
गहरा छना।
यह समय का
चक्र ऐसा
राज रथ है
बक्र कैसा
केसरी तन
सिमटा हुआ
मेमनों सा
दुहरा बना ।

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