तेजस्वी का पुराना सरकारी बंगला, अब सुशील मोदी बढ़ा रहे हैं शोभा

ब्रह्मानंद ठाकुर

पिछले दिन अखबार में एक खबर पढ़ने को मिली । खबर थी बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जी, जिनके जिम्मे भवन निर्माण विभाग भी था, ने अपने सरकारी बंगले की सजावट (मकराना के संगमरमर, इटालियन टाइल्स, स्वचालित आरामदायक सोफे, बाथरूम में आधुनिक झरने, कीमती फर्निचर आदि ) में करोड़ों रूपये खर्च किये। हालांकि अब यह बंगला उनसे वापस ले लिया गया है। हालांकि तेजस्वी यादव सिर्फ एक उदाहरण भर है आज जो भी सत्ता में आता है कमोवेश उन सबकी यही दशा है । ऐसा तब हो रहा है जब भारत में कथित रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है। कहते हैं कि लोकतंत्र में नेता या मंत्री जनता के प्रतिनिधि होते हैं। नेता के खुद का जीवन सादा और विचार उन्नत होना ही उसका खास गुण होने की बात भी कही-सुनी जाती रही है। अतीत में इसके अनेक उदाहरण भी हुए हैं।

अतीत के झरोखे से वर्तमान का अवलोकन  पार्ट- 1

गांधी को ही देख लीजिए। ऐसे और भी अनेक महापुरुष हमें मिल जाएंगे जिन्होंने रहन-सहन की सादगी को अपना व्रत मान लिया था। बिहार के ही समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर इसके उदाहरण रहे हैं । जिन्होंने दो-दो बार मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपना एक मकान तक ढंग का नहीं बनवा सके। जबकि आज के प्रधानमंत्री के कपड़ों पर इतने खर्च हो जाते हैं जिनसे ना जाने कितने गरीब परिवार का आशीयाना बन सकता है ।ऐसे में ये सवाल जरूर उठता है कि क्या गांधीजी और अंबेडकर ने जिस लोकतंत्र की नींव रखी क्या आज वो लोकतंत्र जिंदा है । जवाब तो यही होना चाहिए कि नहीं । ये तो सामंतवाद के गर्भ से पैदा हुए पूंजीवादी लोकतंत्र का जमाना है। इसको समझने के लिए हमे पहले सामंतवादी सोच और व्यवस्था को समझना होगा । चलिए थोड़ा पीछे लौटते हैं। जब दुनिया के कुछ देशों में सामंती समाज व्यवस्था को ध्वस्त कर समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांत पर पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी, तब भारत में सामंती व्यवस्था मौजूद थी। आजादी मिलने तक यहां सामंती व्यवस्था कायम थी । स्वतंत्रता से पूर्व भारत में 565 छोटे-बड़े देशी राजे-रजवाडे थे । सबों की अपनी-अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप अलग-अलग शान शौकत थी।

अभी दो दिन पहले मैंने डोमिनीक लापिएर लैरी कालिंस की किताब फ्रिडम ऐट मिड नाईट का हिन्दी अनुवाद मंगाया है। 496 पन्नों की इस किताब में प्राक्कथन और उपसंहार समेत 21 अध्याय हैं। इस पुस्तक का एक अध्याय है ‘राजा-महाराजाओं के शाही चोंचले। ‘आज इस अध्याय को पढ़ते हुए नेताओं और मंत्रियों के शाही खर्च के साथ देशी रियासतों के राजा-महाराजाओं की शान शौकत में थोड़ी समानता दिखाई पड़ गई। उन रियासतों के राजा-महाराजाओं के शान शौकत पर ‘आजादी आधी रात को’ किताब में काफी कुछ लिखा गया है। वैसे तो यह राजशाही युग की बीती बातें हैं लेकिन आज जब अपने चतुर्दिक दृष्टि डालता हूं तो मुझे उसमें कुछ मौलिक बदलाव नहीं दिखाई देता है। आज इस पहली कड़ी में प्रस्तुत है कुछ ऐसी फिजुलखर्जी की कहानियां ।
जूनागढ़ रियासत का नवाब कुत्तों का अजीब तमाशबीन था। उनके प्रिय कुत्ते जिन घरों में रखे जाते थे, उनमें टेलिफोन और बिजली की सुविधा के साथ-साथ कुछ घरेलू नौकर भी रहते थे ऐसे घरों की बनावट और सुख-सुविधा उनकी प्रजा में से इने-गिने लोगों को ही सुलभ होती होगी। जब कोई कुत्ता मर जाता था तो उसका शव कुत्तों के कब्रिस्तान में ले जाया जाता था, शव यात्रा के साथ शोपां के शोक-संगीत की धुन बजाई जाती थी और उसकी कब्र पर संगमरमर का मकबरा बनवा दिया जाता था।उन्होंने बाकी नामक एक लैब्राडोर कुत्ते के साथ अपनी लाडली कुतिया रोशना की शादी इतनी धूमधाम से रचायी थी कि उसमें भारत के सभी राजे-महराजाओं और बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित किया गया था। विशिष्ठ अतिथितियों में वायसराय का नाम भी शामिल था और वह इस बात से बहुत खीझ गये थे कि वायसराय ने आने से मना कर दिया था। फिर भी उस बारात में ड़ेढ़ लाख अतिथि आए थे। आगे-आगे नवाब साहब के बाडीगार्डों का रिसाला और उनके सजे-धजे हाथी चल रहे थे। शादी के जुलूस के बाद नवाब साहब ने वर-वधू के सम्मान में बहुत शानदार प्रीतिभोज का आयोजन किया था, जिसके बाद नव-वावाहित जोड़े को उनके बहुत ही सुंदर नये घर में पहुंचा दिया गया था। इस पूरे समारोह में नवाब साहब ने नौ लाख रूपये खर्च किए थे, जिससे उनकी 6,20,000 की प्रजा में से 12000 लोगों की वर्ष-भर की सम्पूर्ण बुनियादी जरूरतें पूरी की जा सकती थीं।
अगली कडी में महाराजा मैसूर के आलीशान भवन की चर्चा।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।