pedon kee chhanv tale-2

अवधेश कुमार सिंह

28 अगस्त 2016, रविवार को गाजियाबाद के वैशाली के सेक्टर-4 के सेंट्रल पार्क में एक और साहित्यिक गोष्ठी। ‘पेड़ों की छांव तले रचना पाठ’ की तेइसवीं गोष्ठी हरे भरे मनोरम सेंट्रल पार्क में सम्पन्न हुई। इस बार की गोष्ठी का विषय राधा कृष्ण का आलौकिक प्रेम था। घने गुलाचीन के पेड़ों और हरियाली के शीतल मनोरम सानिध्य में पार्क की हरी भरी दूब पर आयोजित इस गोष्ठी में बाहर से पधारे नव गीतकारों और गजलकारों ने श्रोताओं को आनंदित किया।

“पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” तेइसवीं साहित्यिक गोष्ठी

pedon kee chhanv tale-3गोष्ठी के प्रमुख अतिथि के रूप में साहित्य अकादमी के पूर्व उप सचिव और वरिष्ठ आलोचक साहित्यकार बृजेन्द्र त्रिपाठी की मौजूदगी इस बार की उपलब्धि कही जा सकती है। उन्होंने अपनी चर्चित कविता  “ शब्द महज शब्द नहीं हैं मेरे लिए / एक जीवंत दुनिया / एक रंगीन संसार … शब्द का कविता में बदलना / महज कागज काला होना नहीं / वरन फूल की तरह खिल जाना है / हल्की नीली रोशनी से भर उठना है/ अनंत सागर हो जाना है” का भावपूर्ण पाठ किया।

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक व कवि डॉ वरुण कुमार तिवारी ने जन्मोत्सव शीर्षक कविता “ वक्त के कैनवास पर यथार्थ के अक्स / चाहे कितने भी धुंधले हो गए हों / आग का सच अपने आकार में आकर / फैला देती है इतनी रोशनी / कि घुप्प अंधेरे में भी दिखाई देने लगता है / सब कुछ साफ साफ” पढ़ी ।

गोष्ठी के संयोजक व कवि अवधेश सिंह ने राधा के प्रेम अनुभूति की कविता “ प्रेम में कहना क्या / चुप रहना क्या / आँखों में कैद हैं / कई सावन / मन ने पाले / पीड़ा क्रंदन / दूरियां नजदीकियां के / नए बंधन / दूर क्षितिज तक / बिखरे दर्द / अनुभूति कहे / अब सहना क्या । का पाठ किया । वरिष्ठ कवि डॉ ईश्वर सिंह तेवतिया ने कृष्ण के द्वारिकाधीश होने पर राधा की प्रश्न पूंछती व्यथा को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया “ ये ऐसी अनकही व्यथा है ज्यों आँखों का सूखा पानी , रोम रोम में बसी है मेरे/ घोर उपेक्षित एक कहानी ।

pedon kee chhanv tale-1गीत कारों में ओजस्वी भूमिका के साथ गीत पढ़ते हुए कवि रामेश्वर दयाल शास्त्री ने कहा “ गरिमा विशाल है इसी से उच्च भाल है / कृष्ण गुण गान की अद्भुत मिसाल है / इसी से उच्च भाल है – इसी से उच्च भाल है।” गीतकार कवि मनोज द्विवेदी ने पाठ किया- “ दिल्ली का दिल आज हलकान हो गया/ भावना रहित यहाँ इंसान हो गया ”।

गजलकार संजय शुक्ल ने गजल के साथ अपने सामयिक गीत “ मेरे सूबे में होने हैं / अगले बरस चुनाव / लोकतन्त्र के दूतों का भी होने लगा जमाव / सेवक उतर रहे जनता के उड़ान खटोलों से / सड़कों में गड्ढे हैं लगता डर हिचकोलों से / पेट भरे पहले अपना या पथ का करें भराव ” का पाठ किया। वरिष्ठ कवि कन्हैयालाल खरे ने कृष्ण संदर्भ में गीत “ नील नभ पार तक पवन उड़ा/ तृप्ति के पूर्व साधना यहीं है प्रिये/ इस धरा पर भरा प्यार ही प्यार है/ साधना तुम प्रिये साध हम हैं प्रिये “ का भावपूर्ण पाठ किया । गीतकार अवधेश निर्झर ने गीत पढे “सच का सूरज कैद वहाँ है / बाहर आने से डरता है / भूख का कोई मोल नहीं है / तमगे सजे बाज़ारों में” । कवि मेहरबान सिंह नेगी व नवोदित कवि अतुल कुमार पाण्डेय ने भी काव्य पाठ किया।

इस अवसर पर ठाकुर प्रसाद चौबे , कपिल देव नागर, दयाल चंद्र , अश्विनी शुक्ल, छेदी लाल गौतम , धीरेन्द्र नाथ तिवारी , अविनाश कुमार गुप्त, बृजेन्द्र सिंह कुशवाहा ,पंकज कुमार, शत्रुघन प्रसाद, महेश चन्द्र, रति राम सागर, भीष्म दत्त शर्मा, नारायण सिंह आदि प्रबुध श्रोताओं ने रचनाकारों के उत्साह को बढ़ाया।  हिन्दी साहित्य से संबन्धित अभिनव प्रयोग की यह श्रंखला प्रत्येक माह के अंतिम रविवार की शाम को आयोजित होती है।


awadheshji profileअवधेश कुमार सिंह। साहित्य सेवी, रंगकर्म में अभिरुचि। इन दिनों बीएसएनएल में कार्यरत। कानपुर के मूल निवासी। इन दिनों गाजियाबाद में रहना हो रहा है।

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