गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद भाग-2

औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप में मजदूर वर्ग की स्थिति को सुधारने के  जो प्रारम्भिक प्रयास हुए उसका मूल उद्देश्य विकास की इस धारा से निकल समाज को नये आधार पर खड़ा करना था। इसमें करीब करीब राजसत्ता को नजरअंदाज किया गया था। उस समय यूरोप में  राजसत्ता की इस औद्योगिक सत्ता के विकास में गहरी संलिप्तता थी। दरअसल  चुंगी के छोटे-छोटे स्थानीय दायरे को समाप्त कर समेकित राष्ट्र-राज्य का निर्माण और संसार भर के संसाधनों  के नियंत्रण के लिए युद्धों का विस्तार करना इन राष्ट्र -राज्यों का मूल स्वरूप बन रहा था। इसी रुझान को युद्ध विद्या के प्रसिद्ध अध्येता क्लास्वित्स ने यह कह कर परिभाषित किया था कि ‘वार इज द कन्टिन्युशन आफ पोलिटिक्स बाई अदर मिन्स’ यानि युद्ध राजनीति को दूसरे माध्यमों से जारी रखना भर है। इस संलिप्तता की छाया पूरी बीसवीं शताब्दी तक बनी रही। द्वितीय विश्वयुद्ध के पीछे हिटलर की ‘ लेबेन्स राउम’ ( जीवन के लिए ठौर ) का सिद्धांत नयी औद्योगिक व्यवस्था के लिए संसाधनों की इसी आक्रामक तलाश की अभिव्यक्ति थी। ‘ स्थाई युद्ध की अर्थव्यवस्था ‘  की व्यापकता जो द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति और हिटलर जैसे किसी बहाना के न होने के बाबजूद वर्तमान औद्योगिक व्यवस्था का अंग बन गया है, इस व्यापक रुझान को बतलाता है। हालाकि नये राष्ट्र-राज्य की समग्रता उस काल में स्थापित नहीं हुई थी, फिर भी इसका आभास मजदूरों के दमन और शोषण में साफ मिलता है।

अत: यूटोपियाई समाजवादी राजसत्ता को दरकिनार कर अलग मूल्यों के आधार पर अलग तरह की व्यवस्थाएं निर्मित करने में लगे थे। इसके विपरीत, ‘कार्लमार्क्स और उनके समकालीन अराजकवादी दोनों ही राज्य को नजरअंदाज कर समाज में किसी बदलाव को असम्भव मानते थे। दोनों का उद्देश्य था  राज्यव्यवस्था का विघटन। लेकिन कैसे ? इस बिंदु पर दोनों में गहरा मतभेद था। मार्क्स का मानना था कि मजदूर आंदोलन को राजसत्ता का इस्तेमाल पूंजीवादी व्यवस्था को नष्ट करने के लिए करना पड़ेगा। उनका तर्क था कि चूंकि राज्य शोषक वर्ग के वर्चस्व को कायम रखने का एक हथियार है , जब पूंजीवादी व्यवस्था नष्ट हो  जाएगी तो उसके साथ ही राज्यव्यवस्था के विघटन का सिलसिला जारी हो जाएगा। लेकिन अराजकवादी, जो राज्य-व्यवस्था को ही शोषण का हथियार मानते थे, शुरू से ही इसे नष्ट करने का विचार रखते थे। दोनों ही आंदोलनों के प्रयास अलग-अलग कारणों से असफल हुए प्रूधां, जो अराजकवादी आंदोलन का प्रथम प्रभावशाली नेता था, किसी तरह के हिंसक आंदोलन और राजसत्ता दोनों का विरोधी था। इन दोनों को दरकिनार कर शोषणविहीन  व्यवस्था कायम करने के लिए वह एक खास तरह का विनिमय बैंक स्थापित करने का हिमायती था। उसने स्वयं ऐसा बैंक स्थापित करने का प्रयास भी किया जो असफल रहा। सर्वाधिक प्रभावशाली अराजकवादी नेता बाकुनिन जो मार्क्स का समकालीन था और मजदूर संगठनों के प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय  में कुछ समय तक उसका सहभागी भी था, हिंसक क्रांति  से पूंजीवाद और राज्यव्यवस्था दोनों को खत्म करना चाहता था। वह 19 वीं सदी के मध्य में हुई  यूरोपीय क्रांतिकारी उभारों में बढ़ कर हिस्सा लेते रहे। लेकिन सत्ता के प्रति अपने निषेध भाव के कारण हर बार अंत में बहिष्कृत हो गये। दूसरी ओर मार्क्सवादी प्राय: सत्ता में आए और अंतत: नयी औद्योगिक व्यवस्था के मूल्य और ढांचे को ही मजबूत करने में ही सफल रहे। रूस और चीन में जहां उनको महत्वपूर्ण सफलता मिली, औद्योगीकरण तो चरम पर पहुंचा लेकिन साम्यवाद,समता और स्वाधीनता के सारे सपने विलीन हो गये।

 इसके विपरीत, अराजकवादी वैसे साम्यवादी सिद्धांत की जमीन तलाशते रहे जो शोषण और दमन से मुक्ति दिला सके। इस दिशा में क्रोपोट्किन अराजकवादियों के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतकार हुए। वे जीव  जगत  और समाज दोनों के गहन अध्येता थे। अपनी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक म्युचुअल एड में उन्होंने यह दिखाया कि पशु जगत से लेकर मनुष्य के विकास तक के सभी स्तर पर मानव संस्थाएं अपना अस्तित्व पारस्परिक सहयोग से ही बचाए रख सकी। इस सिद्धांत का प्रतिपादन  डार्विन के सिद्धांतों की उस पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध में किया गया था जिसके मुतिबिक, जो सबसे  अधिक सक्षम है उन्हें ही जीवित रहने का अधिकार है। ( सर्वाइवल आफ दि फिटेस्ट )

 आधुनिक अराजकवादी, जिनमें कुछ अपने को ग्रीन अनार्किस्ट कहते हैं तो कुछ अनार्किस्ट प्रिमिटिविस्ट, बौद्धिक रूप से बहुत प्रखर हैं, लेकिन इनकी शक्ति व्यवहार में बहुत  ही कम है। ये पारस्परिकता के  सिद्धांत को केन्द्रीय मानते हैं और वर्तमान सभ्यता को, जो पूरी तरह प्रतिस्पर्धा पर आधारित है, सिरे से खारिज करते हैं। इन लोगों ने आर्कियोलाजी एवं एन्थ्रोपोलाजी का गहन अध्ययन कर यह स्थापित करने की कोशिश की है कि कि चालू अवधारणा कि’ आदि मानव का जीवन पोषक तत्वों की दृष्टि से दीनता का था’ पूरी तरह भ्रामक है। उनकी मान्यता है कि आदि मानव जो आखेट और फल-फूल पर आश्रित थे, औसतन महज चार-पांच घंटे के प्रयास से आज की अपेक्षा अधिक पौष्टिक आहार प्राप्त कर लेते थे। वे हाब्स की इस धारणा को, कि प्राचीन मानव का जीवन,  अभाव और आपसी द्वंद्व से पाशविक और अल्पकालिक था ‘ पूरी तरह भ्रामक मानते हैं। वे अद्यतन अध्ययनों का सहारा लेकर यह भी प्रतिपादित करते हैं कि मानव के पतन की शुरुआत आज से लगभग 10 हजार वर्ष पहले हुई  , जब लोगों ने कृषि और पशुपालन शुरू किया। तभी से कुपोषण और अनेक तरह के जीवाणुओं से पैदा संक्रामक रोगों की शुरुआत हुई और इनके दर्दनाक नतीजे सामने आने लगे। अपने इस प्रतिपादन के समर्थन में उन्होंने अकाट्य प्रमाण पेश करने का दावा  किया है। इन तथ्यों के आधार पर वे वर्तमान सभ्यता को ही समस्या का मूल मानते हैं और इससे निजात पाना चाहते हैं।

   जान जेरजन,जिन्हें बहुत लोग वर्तमान समय का महत्वपूर्ण अराजकवादी चिंतक मानते हैं, एक लेख ‘पोस्ट स्क्रिप्ट टू फ्युचर प्रिमिटिव रि:  द ट्रांजिशन’ में जो उनकी पुस्तक’ रनिंग औन एम्पटीनेस’ में संकलित है,वर्तमान सभ्यता के कुछ पहलुओं पर वैसी ही बातें करते हैं जैसी बातें गांधी के हिन्द स्वराज में है।

 शृंखला की अगली कड़ी में पढिए  जान रेजन और महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज मे सभ्यता सम्बंधी विचारों की समानता। साभार- गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद

ब्रह्मानंद ठाकुर।बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।