सच्चिदानंद जोशी

नवरात्रि की शुभकामनाओं के बीच एक किस्सा कुछ अलग सा। हम जानते हैं कि नवरात्रि के पहले अमावस्या आती है। सर्वपितृमोक्ष अमावस्या। इसका बहुत महत्व है। इस दिन हममें से कई कोई दान पुण्य करते हैं। मुझे भी कहा गया कि किसी गरीब को खाना खिला देना। दिनभर की भागा-दौड़ी में बात ध्यान से उतार गयी। सोचा रात को लौटते समय खिला दूंगा। खाना खिलाना जरा कठिन काम था। क्योंकि इसके लिए सारा इंतजाम करना पड़ता। सोचा ऑफिस से लौटते समय किसी भिखारी को कुछ पैसे दे दूँगा।

कई बार काम से देर रात लौटते हुए देखता हूँ कि एक जगह कई लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजार रहे होते हैं। उनमें से कुछ भिखारी और कुछ मेहनतकश मजदूर होते हैं, जो अपने दिनभर के श्रम के बाद अपनी थकान मिटा रहे होते हैं। पास ही रैन बसेरा भी है लेकिन वहाँ भी जगह कम पड़ जाती होगी। गाड़ी में पिछली सीट पर बैठ अंधेरे में मैंने पर्स टटोला। उसमे कुछ नोट थे सौ के पचास के और बीस के। सोचा बीस रुपये तो देना बनता है। अब समस्या फुटपाथ पर सोई या बैठी उस भीड़ में से भिखारी ढूंढने की थी। गलती से किसी ऐसे को पैसा देना जो अपना श्रम करके सुस्ता रहा है, उसका और उसके श्रम का अपमान होगा ऐसा विचार भी मन में था।

उसी भीड़ में कोने में बिल्कुल अंधेरे में एक आदमी बैठा दिखा जो बैठे बैठे ऊंघ रहा था। उसके बदन पर एक ही कपड़ा था और बाल बेतरतीब बढ़े हुए थे। वह भिखारी होगा सोच कर उससे कुछ दूर गाड़ी रूकवाई और उतर कर उसके पास गया। पर्स में से अंधेरे में पैसे निकले और उसे देते हुए कहा ” लो भाई खाना खा लेना”। वह चौंका और उसने वह नोट हाथ में लेकर देखा। एक बार दो बार तीन बार। फिर मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में भाव था “क्या सचमुच तुम ये मुझे दे रहे हो”। मैंने अपनी समझ से उसे बीस रुपये ही दिए थे, लेकिन उसके चेहरे का भाव बता रहा था कि मैंने उसकी अपेक्षा से ज्यादा रुपये दिए हैं। “कहीं गलती से मैंने पचास या सौ रुपए का नोट तो नहीं दे दिया”। मेरे मन में शंका हुई।अब तक उसने वो नोट अपनी थैली में रख लिया था। उससे पूछना भी ठीक नहीं था। अंधेरे में जब अपनी पर्स देखी तब नोट गिने नहीं थे कि सौ के कितने पचास के कितने और बीस के कितने।

अब मेरे सामने दो प्रश्न थे और उन्हीं से उलझते हुए मैं गाड़ी में बैठ गया पहला- क्या मैंने उसे बीस की बजाय पचास या सौ का नोट दे दिया। दूसरा यदि मैंने उसे बीस का ही नोट दिया तो उसे इतना आश्चर्य क्यों हुआ। एक वक्त के खाने के लिए क्या बीस रुपये उसकी अपेक्षा से कहीं ज्यादा थे। पहले प्रश्न का उत्तर तो मुझसे ही जुड़ा है लेकिन दूसरे का उत्तर हम सभी से जुड़ा है। एक और विचार मन में आया दान देना और दाता होना इसमें बड़ा फ़र्क़ है। रहीम साहब जैसा भाव हममें कब और कैसे आएगा-
देनहार कोहू और है
भेजत है दिन रैन
लोग भरम हम पर करें
ताते नीचे नैन।


सच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।

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