ब्रह्मानंद ठाकुर

आम, कटहल,नींबू और अमरुद की घनी छांव तले एक छोटा सा घर । जिसका नाम है चमेला कुटीर । प्रकृत की गोंद में बना चमेला कुटीर किसी ऋषि की कुटिया से कम नहीं। सादगी, सच्चाई और शालीनता के जीवंत प्रतीक समाजवादी चिंतक सच्चिदानन्द सिन्हा का घर है ये । कुछ ही दूरी पर है मृतप्राय बूढ़ी गंडक का मुशहरी मन जिसके स्वच्छ जल को स्पर्श करती हवा राहगीरों को कुछ क्षण के लिए गर्मी की उमस से निजात दिलाती है। चमेला सच्चिदा बाबू के दादा की नानी थी । वर्षों से इसी चमेला कुटीर में रहते हैं सच्चिदाबाबू। अविवाहित हैं। उनका पैतृक घर मुजफ्फरपुर के साहेबगंज ब्लाक के गुलाबपट्टी परसौनी गांव में है। पिता ब्रजनन्दन प्रसाद सिंह 1952 में विधायक रहे । 30 अगस्त 1928 को जन्में सच्चिदाबाबू को गांधी विरासत के रूप में वैसे ही मिले जैसे दादा जी मिले थे। 10-11 साल की उम्र में सच्चिदाबाबू ने चरखा चलाना शुरु किया था और खादी पहनना भी । जब गांधीजी कांग्रेस वर्किंग कमिटी में भाग लेने पटना आए तो उन्होंने अपनी काती हुई सूत की गुंडी उन्हें भेंटकी थी। उनके नानाजी रसायन शास्त्र में एमएससी थे और अनीश्वरवादी थे। उन्होंने भौतिक दृष्टि सें दुनिया को समझा और उसके विकास पर एक पुस्तक भी लिखी थी। सच्चिदाबाबू ने 10-11 साल की उम्र में उसे पढ़ा और पुरानी  धार्मिक आस्थाएं उन्हें बेकार लगने लगी सच्चिदाबाबू कहते हैं कि यही उनके कार्लमार्क्स के प्रति आकर्षण का कारण बना।

सच्चिदाबाबू कहते हैं-”मेरी नियमित पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई। पहली दफा परीक्षा देकर उसी स्कूल में नाम लिखाया जहां पिताजी शिक्षक थे। फिर पिताजी ने साल के अंदर ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए नौकरी छोड़ दी। तब स्कूल जाने के दौरान मेरी दिलचस्पी भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारी युवाओं की वीरता और उनके आत्म बलिदान में हुई। इसी क्रम में मन्मथनाथ गुप्त की पुस्तक ‘भारत मे सशस्त्र क्रांति चेष्टा का रोमांचक इतिहास ‘पढ़ा और  हिंसक क्रांति के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ा। गांधी जी के प्रति भक्ति तो थी ही। मुझे गांधी जी और क्रांतिकारियों के बीच कोई विरोधाभास नहीं नजर आया, लेकिन उम्र और रुचि के कारण सशस्त्र क्रांति के प्रति रुझान ज्यादा गहरा  रहा ।” मैट्रिट पास करने के बाद 1945 में साइंस कालेज, पटना में पढ़ने गये तो स्टुडेंट्स कांग्रेस से जुड़े। 1946 में सोशलिस्ट कांग्रेसमैन एसोसिएशन से जुड़े। किसी तरह सेकेन्ड डिवीजन से आईएससी पास की और बीएससी की पढ़ाई पार्टी में सक्रियता के कारण बाधित हुई । इरादा नौकरी से ज्यादा क्रांति करने का बना।

सच्चिदाबाबू बताते हैं कि उस समय बिहार में बसावनबाबू पार्टी के लेवर यूनियन के सचिव थे और उनसे उन्होंने जब अपना इरादा जाहिर किया तो 1948 के शुरू में उन्हें गाड़ी का किराया और एक चिठ्ठी देकर अरगड़ा (हजारीबाग) भेज दिया गया जहां नौ महीने तक साउथ कर्मपुरा कोल वर्कर्स यूनियन में काम किये। इसी अवधि में पार्टी के आदेश पर कुछ समय के लिए मूरी में अल्युमुनियम फैक्ट्री के मजदूरों और फिर बरकाकाना में रेल जंक्शन पर मजदूरों को संगठित करने का काम किया। तब जेपी रेलवे में यूनियन के अध्यक्ष थे। इसके बाद 1949 के मध्य में बम्बई गया। वहां मजदूर संगठन की ख्याति देख कर उससे जुडने की इच्छा थी लेकिन सोचा कि पत्रकारिता के माध्यम से समाजवादी विचारधारा को तेजी से फैलाया जा सकता है। उन दिनों मुम्बई से ब्लिट्ज पत्रिका निकलती थी और अशोक मेहता उसमें नियमित रूप से लिखते थे।

सच्चिदाबाबू ने मुम्बई मे Homyman College of Journalism संस्था में साल भर पढाई की । पत्रकारिता का डिप्लोमा लिया । इस दौरान उनका वह भ्रम भी खत्म हो गया कि पत्रकारिता विचारों का माध्यम हो सकती है। इसी बीच महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस के गोलवलकर जेल से छूट कर मुम्बई आ रहे थे।  शिवाजी पार्क में उनका भव्य स्वागत समारोह आरएसएस द्वारा आयोजित था। शिवाजी पार्क उनकी पार्टी की दादर ईकाई के तहत आता था। विरोध करने का फैसला लिया गया। तय हुआ कि कार्यकर्ता काला झंडा लेकर विरोध प्रदर्शन होगा । सच्चिदाबाबू कहते हैं कि ”हमलोग ढाई-तीन सौ कार्यकर्ता काले झंडे के साथ शिवाजी पार्क दो रास्तों से पहुंचे थे। आरएसएस के हजारों स्वयंसेवक जो पहले से ही तैयार थे, प्रदर्शनकारियों को घायल कर बुरी तरह पिटाई कर दी । इस घटना के बाद कपड़ा मजदूरों के समाजवादी नेतृत्व में चलने वाली मिल मजदूर सभा से जुड़ा और उसका पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गया। इसी अवधि में सवा दो लाख कपड़ा मजदूरों की 62 दिनों तक चली हड़ताल में  प्रिवेन्टिव डिटेन्न एक्ट में गिरफ्तार हुआ। हडताल खत्म होने पर दो माह बाद रिहाई हुई । सच्चिदाबाबू  कहते हैं कि- यह काल सोशलिस्ट पार्टी के गहरे वैचारिक विरोध का काल था। मुझे पार्टी का पूर्णकालिक कार्य छोड़ना पडा। एस आर राव  सेन्ट्रल रेलवे यूनियन में अधिकारी थे । उन्हीं के प्रयास से मुझे बडाला रेलवे वर्कशाप में खलासी का काम मिल गया । वहां डेढ़ साल तक मजदूरी की। काम था तेल की टैंकरों की देख भाल और मरम्मत करना

1952 के आम चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी और शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन की ओर से अशोक मेहता और डाक्टर अम्बेडकर लोकसभा चुनाव लड़े । तब  कुछ सीटों पर एक आम और एक आरक्षित कोटि के उम्मीदवार साथ-साथ चुनाव लड़ते थे। मतदाता को दो वोट डालना होता था। उस समय  सोशलिस्ट पार्टी और डाक्टर अम्बेडकर की शिड्युल्ड कास्ट फेडरेशन के बीच समझौता हुआ था और दोनों साथ-साथ लड़े थे। दोनों उम्मीदवार हार गये। मेरा कार्य क्षेत्र वरली लोअर परेल था। मुझे उस चुनाव में लोगों के बीच काम करने का जो मौका मिला इससे वहां के लोगों के प्रति मेरा आदर और सम्मान काफी बढ गया । इसके बाद किसान मजदूर प्रजा पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का विलय हो गया। मैंने इस विलय का विरोध किया था। सभी बड़े नेता इसके पक्ष में थे। काफी कम लोगों ने हमारा साथ दिया। जो बच गये उनमें कुछ लोगों ने पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से पार्टी को पुनर्गठित करने का अभियान जारी रखा। मुझे पटना से एक हिन्दी पाक्षिक ‘समतावादी ‘निकालने को कहा गया और मैं रेलवे की नौकरी छोड़ पटना आ गया । यह पत्रिका कुछ दिनों तक ही निकल पायी और मैं फिर मुम्बई चला गया। वहां कुछ दिन डाक में काम किया। यह सब करते हुए यह भ्रम भी दूर हो गया कि ट्रेड यूनियन को आधार बना कर क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन चलाया जा सकता है। बाद के दिनों में  सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विलय के बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी। गैर कांग्रेसवाद के नारे के तहत एक वैकल्पिक सरकार बनाने का सपना दिखाई देने लगा लेकिन समाजवाद का लक्ष्य अभी ओझल ही था। एक नयी तलाश शुरु हुई। 66-67 में आंदोलन भी हुए। पहली बार कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। समाजवादी लोग सत्ता के समीप तो आए लेकिन सत्ता पाने की जद्दोजहद में समाजवाद का लक्ष्य ही गुम हो गया।

डॉ. राममनोहर लोहिया इस गैर कांग्रेसवाद के साथ सत्ता के जिस लक्ष्य और सत्ता में रहने की जिन शर्तों को जरूरी मानते थे,  वो 1967 में लोहिया के निधन के साथ ही खत्म हो गया। लोहिया ने जिन शर्तों, मूल्यों और राजनीति  की बात की थी, आज उसकी चिंता किसी भी समाजवादी को नहीं है। सच्चिदाबाबू का मानना है कि एक अच्छा समाजवादी होने की शर्त है कि पहले एक अच्छा इन्सान बनो। यही तो नहीं हो रहा है। आज जहां कहीं भी तथाकथित समाजवादी विचारधारा के लोग सत्ता में हैं , उनके लिए समाज में परिवर्तन लाने का लक्ष्य बिल्कुल गौण है। पूंजीवाद ने आज उपभोक्तावाद की नयी संस्कृति पैदा की है। इसने समाजवादी समाज की स्थापना की जड़ पर ही कुठाराघात कर दिया । कार्ल मार्क्स समेत अनेक समाजवादियों की यह अवधाआरणा थी कि समाजवादी समाज में उत्पादन का स्तर इतना ऊंचा उठ जाएगा कि मनुष्य को उसकी आवश्यकता की चीजें उसी तरह उपलब्ध होंगी जैसे हवा और पानी। जरूरी सामानों के लिए होने वाली छीना झपटी बंद हो जाएगी और मनुष्य अपना समय मानवीय गुणों को विकसित करने,  कला, संस्कृति और दर्शन के विकास में लगाएगा। यही कारण है कि समाजवाद की राजनीति अन्य तरह की राजनीति से अलग होती है। यह सम्पूर्ण मनुष्य जाति को उस स्थिति से मुक्त करने वाली है जो मनुष्य के बहुमुखी विकास का अवरोधक है।।समाजवाद की परिकल्पना के पीछे असली भावना आदमी के जीवन को सम्पत्ति और उसके प्रतीकों से मुक्त करना है। इससे एक पूर्ण उन्मुक्त मानव की कल्पना जुड़ी हुई थी। आज उपभोक्तावाद असंख्य नयी कड़ियां जोड़ कर मनुष्य के सम्पत्ति की जकडन को मजबूत करने में लगा हुआ है। समाजवादी समाज की स्थापना के लिए पहले इस जकड़न से मुक्ति जरूरी है।

सच्चिदाबाबू ने समाजवाद का  यह पाठ किसी पाठशाला में नहीं ,जीवन के संघर्षों से सीखा है। सच्चिदाबाबू ने अबतक दो दर्जन से ज्यादा हिन्दी और अंग्रेजी में पुस्तकें लिखी हैं।  उनकी पुस्तकों में समाजवाद के बड़ेते चरण (1965), सोशलिज्म एन्ड पावर (1974) दि इन्टरनल कालोनी (1973), दि बिहार हार्वेस्ट,(1974) इमरजेन्सी इन पर्सपेक्टिव, दि परमानेन्ट क्राइसिस इन इण्डिया ,Chaos and creation(1980), Cast system,myth और, Reality and change एडवंचर्स आफ लिबर्टी, सादगी सभ्यता के हाशिए पर, कोएलेशन इन पालिटिक्स, दि अनार्म्ड प्रोफेट, भारतीय राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता, नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट, मानव सभ्यता और राष्ट्र राज्य, संस्कृति विमर्श, संस्कृति और समाजवाद, भू मंडलीकरण की चुनौतियां , मानव समाज की चुनौतियां, पूंजी का अंतिम अध्याय, उपभोक्तावादी संस्कृति का जाल, पूंजीवाद का पतझड़, सोशलिज्म ए  मनोफिस्टो फार सर्वाइवल प्रमाण है।


ब्रह्मानंद ठाकुर/ BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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