सच्चिदानन्द सिन्हा प्रख्यात समाजवादी चिंतक हैं। इस वर्ष वे  अपनी जिंदगी के 90 वां वर्ष पूरा कर 91 वां वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं।  गांधी शांति प्रतिष्ठान व्याख्यान ( हिन्दी ) के वर्ष 2011  के वक्ता के रूप में 2 अक्टूबर 2011 में उन्होंने जो व्याख्यान दिया था उसे गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया था।  पुस्तिका का नाम है —गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद। यह पुस्तक  मात्र 16 पृष्ठों की है।   उस व्याख्यान को यहां क्रमिक रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है। आज  प्रस्तुत है   श्रृंखला  की पहली कड़ी

गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद भाग-1

 महात्मा गांधी का नाम अराजकवाद से जोड़ना  कुछ अटपटा- सा लग सकता है। लेकिन यहां अराजकवाद का प्रयोग इसके दार्शनिक-राजनीतिक अर्थ में किया गया है। इस सिद्धांत को प्रतिपादित करने वालों की भिन्नताओं के बाबजूद उनमें इस बात पर सहमति थी कि राज्य-व्यवस्था स्वयं शोषण का औजार है और अंतत: समाज को इससे मुक्ति दिलाना आवश्यक है। इस अर्थ में जब महात्मा गांधी  ‘ हिन्द स्वराज’ में अदालतों, अस्पतालों, संसद और यहां तक कि रेल यातायात तक को अवांछित बताते हैं तो अराजक स्थिति की भावना के अत्यधिक करीब लगते हैं। यह बात दीगर है कि उनके देश भारत में ‘हिन्द स्वराज’  के आदर्शों को पूरी तरह नजर अंदाज कर दिया गया। शायद गांधी जी भी इन आदर्शों को तत्काल लागू करना   सम्भव नहीं मानते थे। उनके देशवासियों या राजनेताओं ने शताब्दी समारोह में श्रद्धांजलि देकर उनकी मूल भावनाओं से मुक्ति पा ली। लेकिन पश्चिमी दुनिया में, जहां लोग इस सभ्यता के दंश को सीधा झेर रहे हैं, अराजकवादी रुझान  पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

पिछली शताब्दी के साठ के दशक में यूरोप और अमरीका के छात्र आंदोलनों में पूरी व्यवस्था को नकारने का एक रुझान आया था। इस काल में पनपी हिप्पी संस्कृति में इसे साफ तौर पर देखा जा सकता है। पश्चिमी देशों के इस तात्कालिक वैचारिक उभार के संदर्भ में, गांधी जी के नाम को घसीटने की कोई प्रासंगिकता है क्या ?  थोड़ा विचार करने पर लगता है कि एक गहरे अर्थ में इसकी प्रासंगिकता है। दरअसल इसका सम्बंध राजनीतिक-आर्थिक ढांचे में बदलाव से आगे बढ़ उस पूरी चेतना को बदलने से है जो आदमी को उसके प्राकृतिक परिवेश से बेगाना करती गई है। आधुनिक औद्योगिक मनुष्य का पूरा जीवन चक्र एक आटोमेटिक मशीन जैसा बनता जा रहा है। इसमें आदमी महज एक पुर्जा है —- एक समयबद्ध विशाल नागरीय घड़ी का।इसकी अनुगूंज ‘लंदन  द टाइम केप्ट सिटी’ में स्पष्ट है। लंदन की जगह मुंबई , दिल्ली या बेंगलुरू  कुछ भी हो सकता है। घड़ी की सूई की जगह आदमी इस चक्र से बंधा है। आधुनिक सभ्यता और इसकी विविध संस्थाएं जितना ही अधिक यांत्रिक और उपभोक्तावादी जरूरतों को पूरा करने  में सक्षम होती गई हैं, उतना ही भावनात्मक स्तर पर एक नि: सारता का भाव भी पैदा हुआ है। दिनकर की इस पंक्ति में, ‘ज्ञानघूर्णी पर चढ़ा  मनुज को मार रहा मरुथल है ‘ ऐसी ही निराशा का भाव व्यक्त होता है। पर इसके पहले आधुनिक औद्योगिक क्रांति का अगुआ ब्रिटेन के एक कवि टी एस इलियट ने आज से लगभग एक शताब्दी पहले, जब प्रथम विश्वयुद्ध के घोर नरसंहार के बाबजूद, संसार में इस औद्योगिक सभ्यता का यशोगान हो रहा था, अपने विख्यात काव्य’ वेसँट लैंड’ में समाज के सारे क्रियाकलापों को बंजर के रूप में पेश किया था। पश्चिमी दुनिया में नई औद्योगिक सभ्यता  से पैदा अंतर्विरोधों और संघर्षों के बीच अराजकवादी आंदोलन में कहीं न कहीं व्यवस्थागत परिवर्तन से परे कुछ अलग तरह के उनमुक्त जीवन की तलाश थी। यही वह बिन्दु है जहां यह गांधी की चिन्ताओं के करीब आता है।

   वर्तमान औद्योगिक समाज के साथ राज्यव्यवस्था का भी एकखास तरह का ढाचा विकसित होता है, जिसकी यांत्रिकता के लिए मानवीय संवेदना एक बाधक  तत्व के रूप में सामने आती है, जिसे निरस्त करने की जरूरत होती है। विख्यात समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने आधुनिक औद्योगिक समाज  से जुड़े राजनीतिक नौकरशाही को अति सक्षम  ‘लीगल  रैशनल सिस्टम’  (तर्कसंगत कानून व्यवस्था ) के रूप में परिभाषित किया था। लेकिन इस सक्षमता की कीमत भावशून्यता  के रूप में चुकानी होती है। अराजकवादियों को राज्य के इस चरित्र के कारण, इससे किसी तरह का तारतम्य स्थापित करना असम्भव लगता था। आर्थिक बदलाव से जुड़े इस भावनात्मक दबाव का असर भी लोगों को विशेष कर, मजदूर वर्ग को राहत पहुंचाने के प्रयास में देखा जा सकता है। साभार- गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद

ब्रह्मानंद ठाकुर।बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।