सच्चिदानंद जोशी के फेसबुक वॉल से साभार

बाजार से सामान लाने की कार्यवाही पूरी होने को ही थी कि श्रीमती जी ने बीच बाजार में जोर से झिड़का ” मास्क तो ठीक से पहना करो । कितनी बार ठीक करूंगी मैं। ” श्रीमती जी इतना कह कर रुकी नही , उन्होंने मास्क जोर से खींच कर नाक पर टांग दिया। उनका टांगना इतना जोरदार था कि अगर हथौड़ा कील होती उनके हाथ मे तो ठोक ही देती मास्क मेरी नाक पर।
सरे बाजार अपनी इस तरह बेइज्जती होते देखने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नही था, क्योंकि मेरे दोनो हाथों में समान की थैलियां थी और पसीने के कारण मास्क खिसक कर नीचे आ गया था । श्रीमती जी का मास्क पुराण वहीं खत्म हो जाता तब भी ठीक था। लेकिन उनकी रनिंग कमेंट्री जारी थी “पता नही मास्क ठीक से क्यों नही पहनना आता तुम्हे। तीन बार ठीक कर चुकी हूँ। ऐसे मास्क पहनने से क्या फायदा कि नाक , मुँह सब खुला रहे। ये तो वही बात हुई कि अंडरवियर पहनी है लेकिन..””अब बस भी करो यार। समझ लिया है न। बाजार है कुछ तो लिहाज करो। ” मैंने हिम्मत जुटा कर थोड़ी जोर से कह दिया और गनीमत है कि वह संवाद वहीं समाप्त हो गया।

लॉकडाउन के दौरान देश की सभी शैक्षणिक संस्थाएं भले ही बंद हो लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने बड़े जोरो से काम किया था। इससे सभी के ज्ञान और भाषा कौशल में बेतहाशा वृद्धि हो रही थी। साथ ही हॉट स्टार और नेटफ्लिक्स जैसे चैनल भी थे जो अलंकारिक भाषा को तराशने में सहायता प्रदान कर रहे थे । अभिधा, लक्षणा और व्यंजना सभी मे सब लोग पारंगत हो रहे थे । उस व्हाट्सएप विश्वविद्यालय से थोड़ी शिक्षा हमने भी ले ली थी इसलिए मालूम था कि श्रीमती जी आगे क्या कहने वाली हैं लिहाज़ा उन्हें समय पर रोकना बहुत जरूरी हो गया था। वैसे जब मास्क पहनना अनिवार्य किया गया तो पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया तो यही थी “नया नया शौक है। कुछ दिन बाद उतर जाएगा हेलमेट की तरह। ” लेकिन शायद कोरोना का डर ,सिर फूटने के डर से ज्यादा बड़ा था ,इसलिए मास्क का हश्र हेलमेट जैसा नही हुआ और लोग स्वयंस्फूर्त मास्क पहनने लगे। मास्क के लिए कोई विज्ञापन “मर्जी है आपकी , आखिर सर है आपका ” की तर्ज़ पर नही बना क्योकि मास्क पहनने और न पहनने के बीच कोई विकल्प नही था।

मास्क पहनने की अनिवार्यता ने कुछ दूसरे लतीफे जरूर बनाये। एक जगह पढ़ा “कान बेचारा क्या क्या करे। सुनने का काम, चश्मे की डंडी सम्हालने का काम , हेड फ़ोन के स्पीकर को सम्हालने का काम। ये क्या कम थे जो अब मास्क की इलास्टिक सम्हालने का काम भी दे दिया।”
सबको कान की पड़ी थी , नाक पर किसी ने ध्यान नही दिया। बचपन मे सबको मेरी नाक पसंद थी। सब कहते थे मेरी धारदार नाक है। नाक की ये बनावट ननिहाल से विरासत में मिली थी। वहां सबकी नाक धारदार थी। छोटा था तो किसी ने कहा शिवाजी जैसी धारदार नाक है। तब से हसरत थी कि कभी नाटक में शिवाजी की भूमिका करूँगा। लेकिन सिर्फ नाक वैसी होने से क्या होता है , बाकी डील डोल भी तो वैसा ही होना चाहिए न। शिवाजी के नाटक में रोल तो मिला लेकिन शिवाजी का नही अफ़ज़ल खान का। बस इसी बात से मेरी त्रासदी समझी जा सकती है।
अब उसी धारदार नाक के कारण मास्क नाक से खिसक कर नीचे आ जाता है तो मैं क्या करूँ । जब मास्क अनिवार्य हो गए और पता चला कि कपड़े के भी मास्क इस्तेमाल हो सकते है तो श्रीमती जी ने अपनी सहेली के बुटीक से कुछ सुंदर हैंडलूम के कपड़े के मास्क बनवाये। रंग बिरंगे मास्क जिन्हें आप अपने कपड़ों के साथ मैचिंग करके पहन सकते हैं। जब मास्क बन कर आये तो गिनीपिग की तरह पहली ट्रायल हमारे ऊपर ही हुई। तीन चार मास्क ट्राय किये सब टाइट। मुँह और नाक अच्छी तरह ढको तो कान मुड़ जाए। और कान पर ठीक से रखो तो नाक खुली रह जाये। हार कर कहा “ये मास्क अच्छे नही है , इनमें मैनुफेक्चरिंग डिफेक्ट है। ” अपनी विशेषज्ञ सलाह देते समय भूल गया कि मास्क श्रीमती जी की सहेली के बुटीक के हैं। “क्या खाक डिफेक्ट है। अच्छे तो हैं । तुम्हारी नाक में ही है डिफेक्ट।एक तो बेचारी ने खास तौर पर हमारे लिए अपना बुटीक खुलवा के बनवाये है । उस पर से ये जनाब उसमे नुस्ख निकले जा रहे हैं। ” श्रीमती जी ने कहा और मास्क की गुणवत्ता पर टिप्पणी का अध्याय वही समाप्त हो गया।

वैसे अपने शरीर के मैनुफेक्चरिंग डिफेक्ट की कथा पुरानी है। जब युवा थे तब दर्जी दादा से कपड़े सिलवाने की बजाय रेडीमेड कपङे का प्रचलन नया नया शुरू ही हुआ था। बड़ी हसरत होती थी शो रूम के डिस्प्ले में लगे रेडीमेड कपड़े पहनने की। लेकिन छूटते ही दुकानदार कह देता था ” आपके साइज में नही है। “साइज भी क्या था मानो सिलेंडर ही था। कमर के साइज से पैंट लो तो वो जांघ से ऊपर ही नही जा पाती थी। जांघ के साइज से लो तो कमर में नही अटकती थी। वही हाल शर्ट का था। चेस्ट के साइज से पेट पर टाइट होता था और पेट के साइज से लो तो कंधों पर झूलता था। एक बार तो एक दुकानदार ने कहा ही दिया “माफ करना साहब , कोई डिफेक्ट है आपके अपने साइज में। ” वो बात इतनी लग गयी कि उसके बाद कई दिनों तक रेडी मेड कपडो की दुकान की सीढ़ियां नही चढ़ी। पहले मेहनत और कसरत कर अपने आपको रेडी मेड कपड़ों के साइज में फिट किया तब जाकर कपड़े खरीदना शुरू किए। क्या पता था कि उम्र के इस दौर में आकर एक बार फिर मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट का दंश झेलना पड़ेगा वो भी उस अंग के बारे में जो अब तक शान का हिस्सा था।

सिर्फ नाक के कारण अपन को ज़िल्लत उठानी पड़ी हो ऐसा नही है। मेरा फेस क्रीम खत्म हो गया था। लिहाजा महीने के सामान में वो भी जोड़ दिया। लिस्ट में क्रीम का नाम देख कर श्रीमती जी चोंकी और बोली “क्रीम अब क्यो चाहिए तुम्हे। आधा चेहरा दाढ़ी से ढका है , बचा खुचा मास्क से ढंक जाएगा। अब क्रीम कहाँ लगाओगे। ऐसा करो मेरा पुराना क्रीम का डिब्बा रखा है , उसमे होगी अभी थोड़ी क्रीम , ये महीना तो चल ही जायेगा उसमे। “
कुछ साल पहले ऐसा ही हादसा शैम्पू के साथ भी हो चुका है। जब डिपार्टमेंटल स्टोर में अपने लिए शैम्पू खरीदने के लिए हाथ बढ़ाया तो श्रीमती जी ने मेरी घटती केश राशी की ओर देख कर कहा था “अब तुम्हे अलग से शैम्पू क्यो चाहिए। तुम तो मेरे वाले में से ही एक दो बूंद ले लिया करना । वो भी शायद बहुत हो जाएगा तुम्हारे लिए। ” अब तो बाल इतने कम हो गए हैं कि शैम्पू शब्द के उल्लेख मात्र से बाल धुल जाते हैं।

इस मास्क के मारे अभी पता नही और क्या क्या झेलना पड़ेगा। फिलहाल तो इस बात पर शोध जारी है कि मास्क लगाने के बाद चश्मे में हवा कहाँ से जाती है और चश्मे के कांच पर जमने वाली भाप को कैसे रोका जाए। साथ ही इस बात पर भी शोध कर रहा हूँ कि जब चश्मा पहने हुए मास्क पहनते है तो चश्मा नही अड़ता , लेकिन जब ऐसी ही प्रक्रिया से उतारा जाता है तो मास्क चश्मे की डंडी में कैसे अटक जाता है। शोध जारी है , लेकिन किसी से कह नही सकता। क्या पता कल को श्रीमती जी कहने लगे “तुम्हारी आंख में भी मैनुफेक्चरिंग डिफेक्ट
है। “
सच्चिदानंद जोशी
28 जून 2020

सच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।