सच्चिदानंद जोशी के फेसबुक वॉल से साभार

हमारे रंगकर्म के गुरु प्रभात दा गांगुली जब मूड में होते थे तो वो अपने विदेश में हुए प्रदर्शनों के किस्से सुनाते थे। विश्व के कई प्रमुख शहरों में उनके बैले के प्रदर्शन हो चुके थे। उसी दैरान वो बताते कि शो के आखिर में 10 -12 मिनट तक तालियां बजती थीं, स्टैंडिंग ओवेशन होता था, तीन-तीन बार कर्टेन कॉल करना पड़ता था, इतनी प्रशंसा और प्रेम मिलता था दर्शकों का। 
हम प्रभात दा से जिस दौर में मिले वो उनके उतार का दौर था। रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप भी एक कठिन दौर से गुजर रहा था। इसलिए हमें लगता कि दादा कुछ ज्यादा ही फेंक रहे हैं। ऐसा भी कभी होता है भला। यहाँ तो घंटे दो घंटे स्टेज पर पसीना बहाने के बाद कोई एक बार ढंग से तालियाँ बजा दे तो बहुत था। स्टैंडिंग ओवेशन तो छोड़ो शो के बाद कोई कर्टेन कॉल के लिए रुक जाए तो बहुत था। अब दादा को ये सब तो नहीं कह सकते थे बस इतना कह कर रुक जाते कि “दादा वो जमाना गया। “

हमारे इस कथन पर रंगमंच का वो बेताज बादशाह एक फीकी हँसी हँस कर रह जाता। कुछ दिन पहले विएना जाना हुआ। इसे कला संस्कृति की नगरी कहा जाता है। मोत्ज़र्ट से लेकर न जाने कितने कलाकारों ने यहाँ नाम कमाया है। पूरा शहर ही देखने लायक है। लेकिन जब आप शहर के मध्य भाग में घूम रहे होते हैं तो ओपेरा हाउस की भव्य वस्तु आपकी नजर अपने ऊपर से हटने नहीं देती। मुझे विएना घूमाने की जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड आर्ट्स की प्रोफेसर तान्या ने अपने ऊपर ले ली थी।तान्या ने बहुत रुचि लेकर मुझे विएना घुमाया। बीच बीच में उनके व्यंग और कटाक्ष भी बड़े मजेदार होते। इधर उधर घूमते सामने ओपेरा हॉउस देखकर मैं लगभग बच्चों से मचल गया ओपरा देखने के लिए। तान्या ने खुलासा किया कि वो मुझे सरप्राइज देने वाली थी लेकिन कल नेट पर चेक किया तो आज के टिकट उपलब्ध नहीं थे। मन में कसक थी कि विएना आकर ओपरा हॉउस में शो नही देख पाएंगे। मेरा चेहरा और मेरी ललक देख कर तान्या को लगा एक बार और भाग्य आजमा लेना चाहिए। वो सीधे ओपेरा हाउस के बुकिंग आफिस पहुँच गयी। भाग्य से सेकंड टियर के बॉक्स में दो टिकट थे बैले Le Corsaire के। ये एक प्रसिद्ध रूसी बैले है जो लगभग 150 वर्षो से खेला जा रहा है। मैं सौजन्य वश टिकट के पैसे देने लगा तो तान्या ने डपट दिया “तुम मेरे अतिथि हो। अपना पर्स अंदर रखो। मेरी संस्था इसका खर्च उठाएगी। ” बाद में जब टिकट के दाम देखे तो सोचा आतिथ्य ही ठीक है। एक टिकट का दाम 97 यूरो था। हम दोनों के हुए 184 यूरो यानी 15000 रुपये। पता नहीं तान्या को उसकी संस्था ने ये राशि दी या नहीं लेकिन उससे पूछने की हिम्मत नहीं है। 

टिकट लेने के बाद तान्या के चेहरे पर जो प्रसन्नता का भाव था आधे पैसे तो उसी में वसूल हो गए। बोली “मेरी बहूत इच्छा थी कि तुम ये बैले देखो। अच्छा है कि ईश्वर ने मेरी सुन ली। ” लेकिन तुरंत ही चिन्ता का भाव लेकर बोली ” लेकिन अब मुझे घर जाकर कपड़े बदलकर आना होगा। ” वो ट्राउजर शर्ट में थी। उसी पोशाक में वो कॉन्फ्रेंस के एक सत्र में भी जाने वाली थी। “क्यो ठीक ठाक ड्रेस है, घर जाना आना क्यो करोगी। ”  “ओपरा जाना है तो जरा तमीज़ से जाना चाहिए। वैसे ये जो टूरिस्ट आते है आजकल वो तो शॉर्ट्स में भी चले जाते हैं। लेकिन हम तो ऐसे नहीं जा सकते। “
मैं वैसे ब्लेज़र पहने था फिर भो पूछ लिया ” तो क्या मुझे भी चेंज करने होंगे ।”
“तुम ठीक ठाक हो फिर भी चाहो तो बदल लो, अच्छा रहेगा। ” तान्या इन दो दिनों में समझ गयी थी कि बंदे को पहनने ओढ़ने का शौक है। 
शाम सात बजे का शो था। पौने सात बजे हम ओपरा हाउस के लिए उपयुक्त काली पोशाकों में सजे अंदर जाने को सज्ज थे। तान्या जिस तरह तैयार होकर आयी थी उससे उस अवसर का महत्व समझ में आ रहा था। और तान्या ही क्यों जो भी आ रहा था बेहद अच्छी सजीली पोशाक में था। अंदर जाने में एक नफासत बोलने बैठने में नफासत। सभी कुछ कलात्मक अभिजात्य से सराबोर। तान्या ने कहा जरूर लेकिन मुझे कोई शॉर्ट्स या स्कर्ट में , जीन्स में नहीं दिखा। अंदर जाने से पहले मैंने इसका ब्रोशर लिया, 5 यूरो में। उसमें इस बैले का पूरा इतिहास और कलाकारों का परिचय था। 
हम जिस बॉक्स में थे वो दूसरी पायदान पर था और उसमें सात कुर्सियां थीं। भाग्य से हमारी सामने वाली थी। “अच्छा है हमें ये सीट मिली। अब तुम पूरा ओपेरा हाउस अच्छी तरह देख पाओगे। “तान्या बोली। 

वो एक अनोखी दुनिया थी। 600 लोगों के बैठने की जगह थी। सभी कुर्सियां भरी हुई। खड़े रह कर देखने की भी जगह थी। उस पर भी नंबर थे। “उधर सबसे ऊपर जो जगह है वहाँ सीढियां हैं। वहाँ स्टूडेंट्स कम दरों पर टिकट लेकर देख सकते हैं। बैले शुरू होने के पहले हमने ढेर सारे चित्र खींचे। तान्या ने मुझे लगभग एक मॉडल की तरह इधर उधर बैठा कर चित्र खींचे। इतने कि मुझे संकोच होने लगा। बोली ” क्यो संकोच करते हो ओपेरा हॉउस कोई रोज़ आता है क्या। हम भी सालों साल बाद आ पाते है। ” मैंने भी तान्या के कुछ चित्र खींचे तो बोली “अच्छा है अब इसे मैं बेटी को भेजूंगी। उसे लगता है उसकी माँ कभी ढंग से तैयार होती ही नहीं। ” तान्या की बेटी प्राग में है और किसी मल्टीनेशनल में नौकरी कर रही है। 
ऑरकेस्ट्रा बैले शुरू होने के पहले धुन बजा रहा था। फिर उसके कंडक्टर आये। उनका जोरदार तालियों से स्वागत हुआ। उस ऑर्केस्ट्रा में कम से कम साठ लोग होंगे। उसके बाद पर्दा उठा और शुरू हुआ वो अलौकिक अनुभव । 

बाद के ढाई घंटे हम एक दूसरे ही विश्व में थे। कहानी परिकथा सी ही थी। सारे कलाकार जाने माने थे। हर कलाकार की एंट्री पर उसका स्वागत जोरदार तालियों से होता। बैले में दो इंटरवल थे जिसमें लोग बाहर जाकर चर्चा करते। वाइन और अन्य पेय तथा खाद्य पदार्थ उपलब्ध थे। 
एक इंटरवल के दौरान हमने उस वास्तु का अंदर से मुआयना किया।किसी महल से कम नही थी यहाँ की सजावट। विश्वप्रसिद्ध संगीतकारों के भव्य पोट्रेट लगे थे। नामी गिरामी डायरेक्टर्स के चित्र और कथन लगे थे। “विश्व युद्ध के दौरान यहां कुछ भी नही होता था। इस ओपेरा हाउस ने वो त्रासदी भी झेली है। एक बार ये पूरी इमारत जल गई। इसे दोबारा बनाया गया उसी रूप में। “तान्या ने एक प्रदर्शनी दिखाते हुए बताया।

उन ढाई घंटो में न जिसने कितनी बार कलाकारों के लिए तालियां बजी होंगी , कितनी बार संगीतकारों के लिए तालियां बजी होंगी कहा नहीं जा सकता।  लेकिन बैले के समापन का दृश्य सबसे अद्भुत था। जब बैले समाप्त हुआ मेरी घड़ी में 21.30 बज रहा था। और तालियों की गड़गड़ाहट खत्म हुई तब बजा था 21.44 यानी पूरे चौदह मिनट । इस बीच कलाकारों को पांच बार आकर दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करना पड़ा।  वो दृश्य देखकर मेरी आँखें भीग गयी थी । रंगमंच का कलाकार तालियों का ही भूखा रहता है।तालियां सुनकर उसका मन भर आता है फिर चाहे वो तालियां किसी और के लिए हो। मैंने भीगी आंखों से तान्या की ओर देखा। उसकी आँखों में भी आँसू थे। ” I am happy we could see it finally. “
तालियों की गड़गड़ाहट में भी मुझे तान्या के स्वर साफ सुनाई दे रहे थे। मैंने सजल आंखों से ऊपर देखा ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए। वहीं सबसे ऊपर वाली गैलेरी में, वहाँ सीढ़ियों पर स्टूडेंट्स के बीच बैठे प्रभात दा अपनी चिरपरिचित नटखट मुस्कान लिए मेरी ओर देख रहे थे।

सच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।