ब्रह्मानंद ठाकुर

पिछले दिनों देश ने गणतंत्र दिवस का जश्न बड़े धूम-धाम से मनाया । देश की हर गली मोहल्ले में हर साल की तरह जमकर रश्म अदायगी भी हुई । राजपथ पर परेड हो या फिर बीटिंग रिट्रीट की भव्यता  दिल्ली से दूर रहने वाले हम जैसे लोग टीवी पर देखकर देश के गर्व को महसूस करते हैं । हालांकि ये मलाल जरूर रहता है कि काश कभी हम भी राजपथ पर बैठकर इस दिव्य नजारे का आनंद उठाएं, लेकिन कभी ये दिन नसीब नहीं हुआ । हालांकि दिल्ली में बैठे एक नौजवान साथी से इसबारे में काफी बात हुई और उन्होंने जो कुछ बताया वो काफी हैरान करने वाला था ।

वो पिछले 13 साल से दिल्ली में रह रहे हैं लेकिन कभी परेड या फिर बीटिंग रिट्रीट देखने राजपथ पर नहीं गए थे, लेकिन इस साल 29 जनवरी को गणतंत्र दिवस का समापन समारोह देखने के लिए उन्होंने सपरिवार बीटिंग रिट्रीट देखने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि इस दौरान सबसे बड़ी चुनौती  इस समारोह में शिरकत को लेकर थी। उन्होंने इस बारे में अपने कुछ साथियों से बात की तो पता चला कि इसके लिए टिकट या फिर पास लगता है । खैर उन्होंने किसी तरह एक वीआईपी पास का इंतजाम किया। (सुना है मोदी जी ने वीआईपी कल्चर खत्म कर दिया है)  जो राजपथ पर होने वाली बीटिंग रिट्रीट में शरीक होने के लिए रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी किया गया था ।  पास पर लिखा था सीट पहले आओ पहले पाओ के आधार पर मिलेगी । समय सीमा शाम के 4 बजे की थी। हालांकि वो तीन बजे ही चेकिंग प्वाइंट पर पहुंच गए, लेकिन चेकिंग की लंबी प्रक्रिया से गुजरते हुए आधे घंटे में समारोह के ठीक बगल वाले गेट के पास पहुंचे लेकिन साढ़े तीन बजे ही गेट बंद कर दिया गया और बताया गया कि अब एंट्री नहीं होगी, क्योंकि सीट फुट हो चुकी है ।

मेरे नौवजवान साथी पत्नी और 8 महीने की बेटी और 7 साल के बेटे के साथ सुरक्षाकर्मियों से गुजारिश करते रहे, गणतंत्र की भी दुहाई देते रहे लेकिन उनकी किसी ने न सुनी । भीड़ ज्यादा थी छोटी बच्ची को लेकर खड़े रहना मुश्किल हो रहा था, तभी किसी सुरक्षाकर्मी की नजर उनकी मासूम बेटी पर पड़ी और किसी तरह पत्नी और बेटी को अंदर जाने दिया गया, लेकिन हमारे नौजवान साथी और उनका बेटा बाहर ही रह गए । यानी गणतंत्र दिवस समारोह में तंत्र ने ‘गण’ को अलग कर दिया और उन्हें बाहर से टीवी पर ही बीटिंग रिट्रीट का आनंद उठाना पड़ा । इस घटना को सुनने के बाद मेरी जेहन में एक सवाल कौंधने लगा कि आखिर हम गणतंत्र दिवस मनाने के लिए इतना भारी भरकम पैसा किसके लिए खर्च करते हैं, जब देश का आम नागरिक इस समारोह में आसानी से शिरकत तक नहीं कर सकता । जब इस समारोह का हिस्सा बनने के लिए किसी पास या टिकट के लिए मोहताज होना पड़ता है तो फिर किस बात का गणतंत्र या फिर यूं कहें कि किसके लिए गणतंत्र के नाम पर इतना पैसा फूंका जाता है ।
अगर इतना तामझाम करना है तो फिर क्या हम देश की आम जनता के लिए इतना इंतजाम नहीं कर सकते कि वो बेरोक-टोक (कम से कम जो वहां पहुंच रहे हों ) इस समारोह का आनंद उठा सकें । आप चेकिंग बेशक कीजिए, सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए, लेकिन पास की व्यवस्था क्यों, क्या हम जैसे आम नागरिक को अपने ही गणतंत्र का समारोह देखने के लिए किसी और के पास का मोहताज होना पड़ेगा । ये सारी घटना सुनने के बाद बरबस ही मुझे नागार्जुन की एक कविता याद आ गई लिखी तो बहुत पहले गई थी, लेकिन आज भी सटीक बैठती है-

बीटिंग रिट्रीट की फाइल फोटो

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गलाकाटू है
गालियां भी सुनता है, बड़ा थूक चाटू है

चोर है, डाकू है, झूठा मक्कार है
कातिल है, छलिया है, झूठा मक्कार है

जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला शासन के घोड़े पर वहां भी सवार है

उसी का जनवरी छब्बीस उसी का पन्द्रह अगस्त है।

बांकी सब दुखी है, बांकी सब पस्त है
कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है?

कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है?
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा

मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है

उसी का है जनवरी, उसी का अगस्त है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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