ब्रह्मानंद ठाकुर

विजय पत सिंघानिया

टूटते-बिखरते रिश्ते, दरकता विश्वास । इस महीने के शुरू में हमारे देश में अलग-अलग जगहों पर जिन तीन घटनाओं ने हमारे अंतर्मन को झकझोर दिया। शायद हर संवेदनशील इंसान के लिए ये घटनाएं सबक देने वाली हैं। बिहार के बक्सर जिले के युवा कलक्टर ने आत्महत्या कर ली। वहीं मुम्बई के वेलकास्ट टावर की 10वीं मंजिल पर एक कमरे से 63 वर्षीया आशा साहनी का कंकाल पाया गया। यही नहीं अरबपति और रेमंड कंपनी के मालिक विजयपत सिंघानिया को उसके ही बेटे ने घर से बेघर कर दिया।

विजयपत सिंघानिया ने खुद के दम पर सम्पन्नता का शिखर चूमा। कहते हैं कि 1993 में एक दिन वे लंदन से अकेले प्लेन उड़ा कर भारत आये थे और देश के बड़े रोमांचकारी अमीरों में अपना नाम शुमार कराया था। मुकेश अम्बानी के भवन एंटीलिया से भी ऊंचा मकान बनवाया। वे प्रसिद्ध शूटिंग-शर्टिंग कम्पनी रेमंड के मालिक रहे। आज से करीब ढाई साल पहले फरवरी 2015 में उन्होने रेमंड कम्पनी के तमाम शेयर (मूल्य करीब एक हजार करोड़ रूपये ) अपने बेटे के नाम कर दिया। आरोप है कि आज उसी बेटे ने उन्हें बेसहारा बना सड़क पर ला खड़ा कर दिया।

दूसरी घटना मुम्बई के आशा साहनी की है। आशा साहनी का इकलौता पुत्र रितुराज सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। 1997 से वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अमरीका में रहता है। आशा साहनी के पति केदार साहनी की मृत्यु चार साल पहले हो चुकी थी। मुम्बई के वेलस्काट टावर में आशा साहनी के दो फ्लैट हैं जिसकी वर्तमान कीमत 5-6 करोड़ रूपये है। इसी एक फ्लैट की दसवीं मंजिल पर  63 साल की आशा साहनी नितांत एकाकी जीवन जी रही थीं। बेटे-बहू से कभी कभार ही फोन पर बात हो पाती थी। अंतिम बार पिछले साल अप्रैल में बात हुई थी।

आखिरी बार जब बेटे से मां की बात हुई थी तो मां ने साफ कह दिया था कि अब वो अकेले नहीं रह सकती। शायद बेटे ने मां की पीड़ा नहीं समझी और ना ही पिछले एक साल में मां से कोई संपर्क किया । यही नहीं शायद किसी पड़ोसी से भी मां के बारे में नहीं पूछा । अगर पूछा होता तो उसे घर में मां का कंकाल देखने की नौबत ना आती । शायद मां जिंदा रहती । आशा ने खुदकुशी की या फिर भूख प्यास से उनकी मौत हो गई ये जांच के बाद ही पता चल पाएगा।

बक्सर के डीएम की खुदकुशी, बेहद चौंकाने वाली घटना।

तीसरी घटना एक युवा आइएएस मुकेश पांडेय की आत्महत्या की है। मुकेश की बिहार के बक्सर जिले में बतौर जिलाधिकारी पहली बार पोस्टिंग हुई थी। वे इससे पहले कटिहार में उपविकास आयुक्त  थे। वहां के उनके सहकर्मी मुकेश के मृदुल व्यवहार के कारण उनके मुरीद बन चुके थे। ऐसे युवा, कर्मठ और मिलनसार अधिकारी की आत्महत्या ने हर किसी को हिलाकर रख दिया। मुकेश पाण्डेय ने अपने सुसाइड नोट में जो कारण बताया है, वह टूटते पारिवारिक रिश्ते और दरकते विश्वास की तरफ इशारा करते हैं। आइएएस के परिवार में वह सब कुछ था जो आधुनिक सम्पन्नता की निशानी मानी जाती है। मुकेश को अपनी पत्नी, मां- बाप, भाई (जो विदेश सेवा का अधिकारी है ) से भरपूर स्नेह रहा, लेकिन वह सूत्र ही काफी कमजोर था जो किसी भी परिवार की दो पीढियों को आदर और स्नेह के बंधन मे बांधे रखने के लिए जरूरी है। मुकेश के मुताबिक उनकी पत्नी का व्यवहार उसकी मां के साथ  सही नहीं था। मुकेश अपनी पत्नी और मां के बीच सम्बंधों की खटास से विचलित थे। शायद वे मां और पत्नी से बेइंतहा मुहब्बत करते थे इसीलिए उनको कुछ कहने से अच्छा खुदकुशी का रास्ता चुन लिया। लेकिन इन घटनाओं ने अपने पीछे आधुनिक समाज के सामने कई यक्ष प्रश्न छोड़े हैं।

आखिर क्यों पैदा हो रहीं हैं हमारे समाज में ऐसी विकृतियां? क्यों तार-तार हो रहे हैं हमारे पारिवारिक और सामाजिक संबंध। क्या आज पैसा संबंधों से इतना बड़ा हो चला है कि लोग अपने मां-बाप तक को मरने के लिए छोड़ने में संकोच नहीं कर रहे। आखिर क्यों हमसे हमारी इंसानियत छिन रही है। जीवन का उद्देश्य आखिर क्यों अर्थपार्जन मात्र बन कर रह गया है। ऐसे अनेक सवाल हैं जिनको इन बढ़ती असंख्य अमानवीय घटनाओं से जोड़ कर देखने की जरूरत है। सभ्यता, संस्कृति, नीति, नैतिकता, परम्परा, आदर्श और मानवीय मूल्यबोध कुछ भी निरपेक्ष नहीं हैं। यहां तक कि कोई भी सत्य त्रिकालिक और शाश्वत सत्य नहीं होता। सब कुछ सापेक्ष है।

किसी भी समाज में आर्थिक व्यवस्था उसका आधार होती है और दर्शन, साहित्य, नीति, नैतिकता, शिक्षा संस्कृति, मूल्यबोध इस आर्थिक आधार का ऊपरी ढांचा होती है। स्वाभाविक है कि जब आधार (अर्थव्यवस्था ) बदलती है तो उसका यह ऊपरी ढांचा प्रभावित होता है।। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारी अर्थ व्यवस्था पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है, एक ऐसी मृतप्राय पूंजीवादी व्यवस्था जो अपने ही सिद्धांतों- समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का गला घोंट चुकी है। सामंतवाद के बाद पूंजीवाद का आगमन अपने समय की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसने सामंतवादी शोषण उत्पीड़न की जगह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांत के आधार पर विकास का नया अध्याय लिखा। विकास के उच्चतम शिखर पर पहुंच कर पूंजीवाद अपना प्रगतिशील चरित्र खो कर प्रतिक्रिया वादी बन जाता है। अपने ही सिद्धांतों की हत्या करने लगता है। हमारे देश मे सामंतवाद की जगह पूंजीवाद तब आया जब इसने अपना प्रगतिशील चरित्र खो दिया था। आज यह पूंजीवाद मरनासन्न स्थिति में है।

आज जीवन का उद्देश्य केवल पैसा कमाना भर रह गया है। यह ठीक है कि जीने के लिए पैसा जरूरी है लेकिन क्या केवल पैसा कमाना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए ? और इसी पैसा कमाने के उद्देश्य से पढ़ाई-लिखाई जरूरी है ? अक्सर लोग कहते सुने जाते हैं कि छोड़िए नीति-नैतिकता और आदर्श की बातें, पापी पेट का सवाल है। यह पेट नीति नैतिकता और आदर्श से तो भरा नहीं जा सकता। पेट का ख्याल तो रखना ही होगा। मतलब साफ है कि जिस किसी भी हालत में हो, खुद को बेच कर भी, नीति नैतिकता और आदर्श को ताक पर रख कर अर्थोपार्जन आज जीवन का उद्देश्य बन गया है।

यही कारण है कि आज के युवा दंपति अपने बच्चे को जन्म लेते ही पहले उसे पालने के लिए आया के पास छोड़ देते हैं और फिर बोर्डिंग हाउस में भेज कर अर्थोपार्जन में लग जाते हैं। बच्चों के प्रति जो आत्मिक लगाव होना चाहिए, नहीं हो पाता। फिर कुछ समय बाद परिणाम इस रूप मे मिलता है, जिसकी तब वे कल्पना भी नहीं कर सके थे। आज संकट है  जीवन के मूल्यबोध का। क्या यह  धन दौलत से या ऊंची डिग्रियों से, या सोशल स्टेटस से निर्धारित हो सकती है ? इन सवालों का उत्तर तलाशना जरूरी है।  आज हम एक अजीबोगरीब स्थिति मे पहुंच गये हैं। खुदगर्ज हो गये हैं। आज का मूल मंत्र है – खुद बचो तो जग बचे। यही है आधुनिक चरित्र निर्माण का दृष्टिकोण। यह वर्तमान पूंजीवादी शासकों के वर्गहित में है।

मतलब साफ है मरनासन्न पूंजीवादी व्यवस्था ने ही आज खुदगर्जी और अर्थोपार्जन की अंधी दौड़ की यह स्थिति पैदा की है। इसके कारण हमारे रिश्ते लहूलुहान हो रहे हैं। इसी का परिणाम है वृद्धा आशा साहनी के फ्लैट से उसका कंकाल मिला। विजयपत सिंघानिया की दुर्दशा हो रही है और युवा आइएएस मुकेश पाण्डे आत्महत्या को मजबूर हो गए। अगर हमें इन अमानवीय स्थितियों से समाज को मुक्त कराना है तो पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति के लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाना ही होगा।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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