रंजीत कुमार

बिल्कुल ठीक-ठीक याद तो नहीं जब पहली बार तुम मिले थे, चैनल लांचिंग से पहले ट्रेनिंग का दौर था जब पहली बार नोटिस किया था मैंने। एक पतला-दुबला सा लड़का…अक्सर सवाल करता है। सिर्फ कुछ साल पहले मैं भी तो ऐसा ही था अपने कॉलेज के दिनों में। उत्सुक, उद्वेलित और कई बार उन्मादी भी….एक कनेक्ट सा बन गया। जब भी मिलते थे तुम लगता कई साल पीछे लौट गया हूं मैं।

कई बार मौका आया, लोगों ने कहा क्यों बर्दाश्त कर रहे हैं इसको ? मैं इन सवालों को अनसुना कर देता…. क्या कहता किसी से। कई बार किसी को समझाने से ज्यादा सुविधाजनक होता है चुप रह जाना। चुपचाप सुनता रहा मैं। एक उम्मीद भी थी कि सुबह के भूले के लिए कोई तो शाम होगी। तुम दिन के उजाले में खो जाओगे कहां मालूम था।

विकल्प की यादें

प्रोफेशनल लाइफ में बहुत कम लोग होते हैं जो औपचारिकता के खोल को तोड़ कर आपके करीब आ पाते हैं, तुम सहज ही ऐसा कर जाते थे। हमारे आस-पास काम करने वाले ज्यादातर लोगों में से तुम ज्यादा प्रतिभावान थे, तुम्हारे सपने अलग थे, और तुम्हारा एप्रोच भी। तुम वाकई बहुत दूर तक जा सकते थे…पर नियति ने तुम्हें इतनी दूर भेज दिया कि हम चाहकर भी तुम्हें वापस नहीं ला सकते।

किसी ने कहा कि वो हर चीज में जरूरत से ज्यादा था…यही चीज उसे ले डूबी। पता नहीं…। एक अजीब सा अपराधबोध है। ऐसे दो मौके आए जब लगा कि फैसला कर लूं… ये कि तुम्हें नौकरी नहीं इलाज की जरूरत है। तुम्हारे पिताजी का फोन नंबर भी मंगवा लिया था। पहली बार तुमने मोहलत मांग ली… दूसरी बार तुम्हारे चाहने वाले ने… और वक्त ने तीसरी मोहलत दी नहीं।

किसी ने मुझसे कहा था हर फैसले की एक कीमत होती है… मुझे नहीं मालूम था कि फैसला नहीं कर पाने की कीमत तुम्हें खोकर चुकाउंगा… आज तुम नहीं हो… पर कितनी बातें है…


रंजीत कुमार। नेशनल वायस के ग्रुप एडिटर और सीईओ। न्यूज स्टेट के पूर्व सीईओ। न्यूज नेशन के पूर्व आउटपुट एडिटर। आजतक, स्टार और बीएजी फिल्म्स में विभिन्न संपादकीय भूमिकाओं का निर्वहन।

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