ब्रह्मानंद ठाकुर

एक नन्हा -सा टुअर बालक जिसकी मात्र 4 साल की उम्र में मां मर गयी और जब वह 9 वर्ष का था तो पिता भी साथ छोड़ गए। यह अनाथ बालक था रामबृक्ष। ऐसे कठिन समय में यदि मामा द्वारिका प्रसाद सिंह की स्नेहिल छांव नहीं मिली होती तो उसकी दशा क्या होती ? खुद बेनीपुरी के शब्दों में- “यदि पिता जीवित होते तो मुझे न ननिहाल जाना पड़ता, न मेरे जीवन में परिवर्तन होता, न मैं वह सब कुछ हो पाता, जो आज हूं। आज मैं एक छोटा-सा अनपढ किसान होता, खेती-बारी करता, बच्चों के साथ खेत-खलिहान में मरता-खपता होता, जैसी कि मेरे चचेरे भाइयों की हालत है। ”

पिता की मृत्यु ने बालक रामबृक्ष के जीवन की दिशा ही बदल दी। सच है घनघोर विपदा में भी बेहतर भविष्य के उम्मीद की किरण छिपी होती है। मातृ-पितृ हीन बालक रामबृक्ष के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके पिता के श्राद्धकर्म में वंशीपचडा गांव के उनके मामा बाबू द्वारिका प्रसाद सिंह आए हुए थे। श्राद्ध समाप्त होते ही वे रामबृक्ष के दादा से अनुमति लेकर उन्हें अपने साथ वंशीपचडा ले गये। वहां वे 15 सालों तक रहे। यहां उनकी पढाई -लिखाई गांव की झोपड़ी में स्थित लोअर प्राइमरी स्कूल से शुरू हुई। उस जगह पर आज विद्यालय की आलीशान इमारत है और वह स्कूल मिड्ल तक अपग्रेड हो चुका है। यहीं उन्होंने उर्दू-फारसी भी पढी। स्वाध्याय की लत लगी और तुलसी कृत रामचरितमानस , विनय पत्रिका , सुखसागर , प्रेमसागर , बैताल पचीसी , सिंहासन बत्तीसी, पद्माकर का जगत विनोद आदि पुस्तकें पढने का अवसर अपने मामा के स्नेहिल सानिध्य में पाया। इस तरह बंशीपचडा की माटी और आब-ओ-हवा ने नन्हे टुअर बालक रामबृक्ष को संस्कारित कर उसे महान लेखक, स्वतंत्रता सेनानी और समाजवाद का पुरोधा बना दिया।

बेनीपुरी की 50वीं पुण्यतिथि 7 सितम्बर पर विशेष

बंशीपचडा का सामुदायिक भवन, जिसमें बेनीपुरी पुस्तकालय की स्थापना की गई

अपने पिता को खो कर रामबृक्ष ने मामा के रूप में एक नया पिता पाया। उनको केवल बेटियां थीं , बेटे हुए लेकिन जीवित नहीं रहे। लिहाजा द्वारिका बाबू ने इन्हें पुत्रवत स्नेह दिया और पुत्र के समान ही इनका पालन पोषण भी किया। मामा उनकी हर ख्वाहिश पूरी करते, सब तरह से प्रसन्न और सुखी रखते थे।

1970 के दशक में मुजफ्फरपुर को विभाजित कर वैशाली, सीतामढी और फिर बाद में शिवहर जिला बना। वंशीपचडा गांव इसी शिवहर जिले के तरियानी प्रखंड का एक गांव है। मुजफ्फरपुर -मीनापुर-शिवहर रोड पर। मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 40किमी दूर। इस गांव के आबाद होने का अपना एक इतिहास है, जो करीब ढाई सौ साल पुराना है। गांव के अम्बिका सिंह ( 85वर्ष) ने बताया कि आज से करीब 8 पीढी पहले इनके परदादा सहजराम सिंह ने ये गांव आबाद किया था। बात 1762 ई0की है। तब तुर्की जिला हुआ करता था। लार्ड क्लाइब यहां के गवर्नर थे और सहजराम सिंह उनके विश्वस्त सिपाही। सहजराम सिंह यूपी के गाजीपुर जिले के जमुनिया परगना अन्तर्गत रेवतीपुर के निवासी थे। लार्ड क्लाइब के नेतृत्व मे जब मैसूर पर आक्रमण हुआ तब उस लड़ाई में वहां के निजाम हैदर अली की हत्या सहजराम सिंह ने कर दी थी। लार्ड क्लाइब ने उन्हें इस इलाके की 80 बीघा जमीन बतौर पुरस्कार दे दी। इसके बाद वे अपने परिजनों के साथ यहां आ कर बस गये। सहजराम सिंह के यहां आने के कुछ साल बाद उनके गांव से अन्य जाति के कुछ लोग भी यहां आ गये। इन सबों को 376 रुपये तहसील कायम कर 22-22 बीघा जमीन मुफ्त में दे दी गई। इस तरह यह गांव आबाद हुआ।

यहां के निवासियों ने मिलजुल कर अपनी लगन और मेहनत से इस जंगली इलाके को खेती योग्य और हरा-भरा बना दिया। इसका उल्लेख खुद बेनीपुरी जी ने किया -” बेनीपुर की बाढ को अपनी नसों मे लेकर मै बंशीपचडा पहुंचा था , किंतु यहां के प्राकृतिक दृश्यों ने मुझे अभिभूत करना शुरू कर दिया। बेनीपुर में सिर्फ दो फसलें, धान या खेसारी, कभी कभी जौ या गेहूं भी होती थी। बंशीपचडा एक सदा बहार यह गांव। जिधर निकलिए , उधर ही बाग-बगीचे। आम के पेड़ तो बेनीपुर मे भी थे, लेकिन लीची के सौन्दर्य ने मुझे यहीं मोहित किया।अमरुद , आंवला , बेल , कटहल , जामुन , नीबू , बेर कहां तक गिनती की जाए ! वसंत और बरसात में बंशीपचडा दुल्हिन -सा लगता, हर खेत उसका आंचल , हर आंचल रंगीन, सरस ,सफल ,सुन्दर।” जाहिर है सम्पूर्ण बेनीपुरी साहित्य में जो प्राकृतिक सौन्दर्य है , उसमें अधिकांश बंशीपचडा का ही प्राकृतिक सौन्दर्य प्रतिबिम्बित है।

इसी तालाब के उत्तरी छोर में एक झोपड़ी में चलता था लोअर प्राइमरी स्कूल, जिसमें बेनीपुरी की शुरुआती पढाई हुई।

बेनीपुरी जी जब यहां आए तो गांव में एक तालाब के किनारे फूस की झोपड़ी में संचालित लोअर प्राइमरी स्कूल से अपनी पढाई शुरू की थी। यहीं की माटी में पलकर बालक रामबृक्ष किशोर बेनीपुरी हुए। रचनात्मकता का विकास भी इसी परिवेश में हुआ और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की भावना भी यहीं पैदा हुई। वो दसवीं के छात्र थे तो गांधी के आहवान पर पढाई छोड़ आंदोलन में शामिल हो गये। बड़े -बुजुर्गों ने मना किया, उनके अपने शिक्षकों ने नसीहत दी , दोस्तों ने समझाया लेकिन कहां मानी किसी की बात। पढाई छोड कूद परे आजादी आंदोलन में। जेल की यातनाएं सहीं। संघर्षों , कठिनाइयों की आंच में तप कर  वे और निखर उठे।  पत्रकारिता , साहित्य सृजन और समाजवाद की राजनीति में उन्होंने जो कीर्तिमान बनाया , जो लकीर खींची , आज तक उस क्षेत्र में उससे बड़ी लकीर कोई नहीं खींच पाया। रामबृक्ष को बेनीपुरी के रूप में गढने और फिर उसे देश और साहित्य की सेवा में अर्पित कर देने के लिए बंशीपचडा की माटी को शत शत नमन।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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