संगम पांडेय

कथक नृत्यांगना प्रतिभा सिंह निर्देशित प्रस्तुति ‘राम की शक्तिपूजा’ में सबसे ज्यादा जो चीज दिखती है वो है मनोयोग। उनके नाट्यग्रुप ‘कलामंडली’ में शास्त्र-निपुण कलाकारों से लेकर दिल्ली की कठपुतली कालोनी के उजाड़ दिए गए परिवारों के प्रशिक्षु युवा तक शामिल हैं। करीब 45 कलाकारों की इस प्रस्तुति में कई बड़े पैमाने की दृश्य योजनाएँ शामिल थीं। शक्तिरूपा देवी दुर्गा यहाँ एक विशाल पुतुल आकृति के तौर पर मौजूद हैं। देवी के वाहन को दर्शाने के लिए एक व्यक्ति एक लाठी के मुहाने पर बँधे शेर के सिर को लिए आगे-आगे चलता है। इसी तरह राम, रावण और हनुमान बने पात्रों का वैभव अपने मेकअप में देखने लायक है। वानर सेना या कोरस के तौर पर माइम वेशधारी समूह है, जिसमें अपना मुखौटा पकड़े जामवंत भी शामिल हैं। इसके अलावा बीच-बीच में कुछेक स्थितियों को कथक के टुकड़ों में भी भावाभिव्यक्त किया गया है। 

प्रस्तुति में निराला की दुरूह कविता के लाइव वाचन जैसे मुश्किल काम को भी अंजाम दिया गया है, जिसके डिजाइन में चंद तात्कालिक त्रुटियों के बावजूद भाव वैविध्य का अच्छा लालित्य है। इसके लिए सुमन कुमार, विजय सिंह और योगेश पांडेय के तीन स्वर मंच के दायें छोर पर मौजूद थे। पर मुख्य भूमिका में सुमन कुमार अपनी साहित्यिक अभिरुचि में कविता के गठन और भाव-श्रृंखला को अच्छे से आत्मसात किए हुए दिखते हैं। कई बार कविता उठान की ओर जाती है, फिर शांत स्वरों की और लौटती है। 

निर्देशिका ने प्रस्तुति को लोकानुरूप बनाने की चेष्टा भी की है। देवी की आराधना के लिए पुष्पों की आवश्यकता है। प्रस्तुति के शुरू में दर्शकों को प्रस्तुत किए गए नीले रंग के फूल इस मौके पर एकत्र किए जाते हैं। इस तरह मेघदूत के खुले मंच पर दर्शक भी प्रस्तुति में शरीक होते हैं। कुल मिलाकर यह काफी भरा-पूरा मंच था। मंच के दोनों सिरों पर काफी बड़ा संगीत पक्ष, पात्रों की विशाल संख्या, कई तरह की प्रॉपर्टी, दृश्यों का बहुविध संयोजन। ऐसे विन्यास को निर्देशिका ने एक एमेच्योर टीम के जरिए अंजाम दिया है।

इसमें हुआ यह है कि, उदाहरण के लिए, शक्तिस्वरूप देवी वाले दृश्य में, आकृति एक स्थिति-चमत्कार पैदा तो करती है, पर अंततः यह एक ऐसा श्रमसाध्य और भदेस दृश्य था जिसकी कवायद उसकी निष्पत्ति से ज्यादा दिखाई देने लगती है। इसी तरह जब पात्र कविता के चल रहे वाचन में संवादों पर होंठ चलाते हैं तो एक बड़ा ही मासूम दृश्य उपस्थित होता है। इस बीच पात्रों की सही एंट्री और एग्जिट को लेकर चिंतित निर्देशिका भी एक कोने में खड़ी दिख रही हैं। प्रस्तुति के औपचारिक फ्रेम से बाहर के मंजर की ऐसी छोटी-मोटी चीजें भी उसके कुल अनगढ़पन में आत्मीयता से शामिल हो गई हैं।

एक मौके पर किसी गफलत में एक सिचुएशन छूट जाने पर सुमन कुमार नाटक को ‘रिवर्स मोड’ में भी ले गए।
संक्षेप में कहें तो यह प्रस्तुति एक पारंपरिक किस्म के चाक्षुष को एक शास्त्रीय किस्म की प्रस्तुति योजना में बगैर किसी शॉर्टकट के संभव करने की चेष्टा करती है। इस महत्त्वाकांक्षी विन्यास में तालमेल गड़बड़ाने से जो व्यवधान पेश आते हैं वे भी प्रस्तुति के वृहत्तर दृश्य में मासूमियत के साथ दिखाई देते हैं। इसका कारण वह मनोयोग ही है जो दूर बैठे दर्शक को हर समय बिल्कुल साफ-साफ दिखाई देता है।


संगम पांडेय। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। जनसत्ता, एबीपी समेत कई बड़े संस्थानों में पत्रकारीय और संपादकीय भूमिकाओं का निर्वहन किया। कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। नाट्य प्रस्तुतियों के सुधी समीक्षक। हाल ही में आपकी नाट्य समीक्षाओं की पुस्तक ‘नाटक के भीतर’ प्रकाशित।

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