राकेश कायस्थ

शहर के कैरेक्टर को समझने के लिए सिर्फ इंसान की नज़र काफी नहीं होती। जीव-जंतुओं का व्यवहार भी बहुत कुछ कहता है। मुंबई में रिहाइश और रोजगार संघर्ष बाकी जीवों के लिए भी उतना ही है, जितना इंसानों के लिए। इस शहर के कबूतरों की इंसानों से ज़बरदस्त लड़ाई है। कबूतर कहीं दूर नहीं बस सकते। उन्हें ऐसी जगह चाहिए जहां से काम पर जाने के लिए उन्हे ज्यादा ट्रैवल ना करना पड़े। बॉलकोनी और छज्जे पर कब्जे के लिए उनका संघर्ष हमेशा चलता रहता है। मेरी हाउसिंग सोसाइटी ने बहुत पैसे खर्च करके बिल्डिंग की हरेक लॉबी में जाली से बंद की, लेकिन मुंबई के कबूतर अजीब किस्म के ढीठ और आक्रामक हैं।

किसी और शहर में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कबूतर जाली काटेंगे। मैंने कबूतरों के पूरे गिरोह को अंदर आने का रास्ता बनाने के लिए मशक्कत करते देखा है। आखिर उन्हें कामयाबी मिल ही गई। नतीजा ये है कि मेरे लिविंग रूम में हफ्ते में एकाध कबूतर जरूर घुस आता है और हमें उसे डिपोर्ट करना पड़ता है। सीमा पर लगी फेसिंग को पार करके गैर-कानूनी  तरीके से अंदर आने वालों से निपटने का जिम्मा अब मैंने अपने बड़े साहबजादे को सुपुर्द किया है।

मुंबई के कौव्वों का व्यवहार भी बहुत अलग है। कबूतरों के उलट वे बिल्कुल शांत हैं। कौव्वे इंसान के जितना करीब मुंबई में आते हैं, उतना मैंने किसी और शहर में नहीं देखा। हमारा पुराना दफ्तर महालक्ष्मी रेसकोर्स के सामने था। वहां कैफेटेरिया में लंच के वक्त कौव्वे खिड़की से अंदर ही नहीं आते थे बल्कि हमारे टेबल तक पहुंच जाते थे। कौव्वों से अपना वास्ता बचपन से रहा है। मेरा बचपन रांची के जिस आलीशान घर में गुजरा है, वहां दर्जनों पेड़ थे। जगह इतनी हुआ करती थी कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसी कोई मजबूरी ना तो हमारे लिए थी ना कौव्वों के लिए। मनोरजंन को ज्यादा साधन थे नहीं, लिहाजा कौव्वों को पत्थर मारना एक खेल था। कौव्वे भी बला के होशियार थे। अगर अापने ज़रा भी हाथ हिलाया तो वे खतरा भांपकर उड़ जाते थे।

बरसात प्रजनन का मौसम होता था। उस दौरान हमारा आंगन में निकलना मुश्किल हो जाता था। फाइटर प्लेन की तरह उड़ते काक दंपत्ति सिर पर निर्ममता से चोंच और पंजे मारते थे। मैं और मेरे भाई बहन बहुत पिटे हैं। दिल्ली के कौव्वों में मैंने एक अलग तरह का स्वैग देखा। चौथे फ्लोर की खिड़की पर कहीं दूर से उड़कर एक कौव्वा आता है। दो बार कांव-कांव करता है, खिड़की पर चोच मारता है और फिर उड़ जाता है। लगता है जैसे कह रहा हो– ओय जानता नहीं मैं कौन हूं? दिल्ली के कौव्वे मुझे वहां के बाइकर्स की तरह लगते थे, जो टशन दिखाने के लिए गाड़ी यहां से यहां वहां घुमाते हैं, रुकते कहीं नहीं हैं। लेकिन मुंबई के कौव्वे यहां के इंसानों की तरह फोकस्ड हैं। बस अपने काम से काम फालतू की कोई पंगेबाजी नहीं।

बिल्लियों की तादाद भी इस शहर में जितनी है, उतनी मैंने कहीं और नहीं देखी। बिल्लियों के रास्ता काटते ही मुंबईकर लखनवी हो जाते हैं। बिल्ली ने रास्ता काटा नहीं कि पहले आप, पहले आप शुरू हो जाता है। तंग सड़कों पर तो लोग गाड़ियां तक रोक देते हैं। मैं ऐसा कोई दावा नहीं करता कि अंधविश्वासी नहीं हूं। फिर भी ये मानता हूं कि अंधविश्वास के खिलाफ भी एक इम्युन सिस्टम काम करता है। मेरा रास्ता रोजाना कम से कम एक ना एक बार बिल्ली ज़रूर काटती है, चाहे घर से निकलते वक्त काटे या फिर ऑफिस में दाखिल होते वक्त। इसलिए इम्युनिटी अब इतनी बढ़ चुकी है कि कोई असर नहीं होता।

जब मैं मुंबई नया आया था तो मछली बाज़ार में लाइन लगाकर बैठे बगुलों को देखकर हैरान हो गया था। इंसान तो इंसान यहां परिंदे भी क्यू में खड़े होते हैं? बचपन में पढ़ा संस्कृत का एक श्लोक याद आता है, जिसका अर्थ यह है कि आदर्श विद्यार्थी की नींद कुत्ते की तरह, चेष्टा कौव्वे की तरह और ध्यान बगुले जैसा होना चाहिए। शहर के कुत्तों पर फिर कभी लिखूंगा। कौव्वों को ज्यादा चेष्टा नहीं करनी पड़ती। गंदगी के अंबार से उनका काम चल जाता है। बगुलों का काम भी मछली बेचने वालों से चल जाता है, लेकिन वे बैठते हैं, उसी तरह ध्यान लगाकर जिस तरह श्लोक में बताया गया था।
मैं मुंबई के जिन जीव-जंतुओं से सबसे ज्यादा रिलेट कर पाता हूं, वे मॉल के भीतर रहने वाली गौरेया हैं। अक्सर आपने फूड कोर्ट के अंदर टेबल पर फुदकती गौरेयो के झुंड देखे होंगे। उनकी ना जाने कितनी नस्ले वहीं पैदा हो चुकी हैं। धूप, हवा और विटामिन डी से महरूम बिल्कुल हमारी तरह।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।