ब्रह्मानंद ठाकुर

महापंडित राहुल सांकृत्यायन वैज्ञानिक समाजवादी विचारधारा के अनथक योद्धा साहित्यकार थे। उन्होंने अपने अगाध पांडित्य  को वर्ग शत्रु के खिलाफ आम जनता के जनवादि अधिकारों के लिए हथियार के रूप में प्रयोग किया। ये बातें  बी आर ए बिहार विश्व विद्यालय के पूर्व कुल पति डाक्टर रवीन्द्र कुमार  रवि ने  शुक्रवार 13 जुलाई को  मुजफ्फरपुर , मोतीझील स्थित  एआईडीएसओ कार्यालय सभागार  में कहीं। कला – संस्कृति मंच की ओर से ‘ समाजवादी क्रांति के अग्रदूत : राहुल सांकृत्यायन और वर्तमान परास्थिति ‘ विषय पर आयोजित परिचर्चा में उन्होंने मुख्य वक्ता के रूप में अपनी बातें रखीं। उन्होंने महापंडित राहुल सांकृत्यायन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका रचना कर्म व्यापक और विराट था। सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय रहते हुए भी बतौर रचनाकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी अलग जगह बनाई। उन्होंने आम जनता की आवश्यकताओं और  सही दिशा की ओर  गोलबंद होने के उद्देश्य से दायित्वबोध के तहत लिखा।
अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक, रंगकर्मी एवं शोधपरक दृष्टि सम्पन्न साहित्यकार डाक्टर वीरेन नन्दा ने  कहा कि राहुल सांकृत्यायन अपने समय के सर्वाधिक महान अन्वेषक थे। कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें उन्होंने खोज नहीं की। उनके द्वारा दक्षिण भारत के उन लेखकों की खोज करना एवं तिब्बत के सिद्धकालीन लेखकों की खोज  एक ऐसी महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसने हिन्दी का उद्गम अमीर खुसरो की जगह सिद्धों को माना है। डाक्टर कुमार विरल ने कहा कि राहुल जी भोजपुरी के प्रथम नाटककार हैं जिन्होंने  नारी समस्या पर आधारित  ‘मेहरारू  की दुर्दशा ‘ नाटक लिखा।
पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डाक्टर नन्दकिशोर नन्दन ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा वेदांत से शुरू होकर आर्यसमाज ,बौद्धधर्म होते हुए मार्क्सवाद पर जाकर समाप्त होती है। उनका ध्येय वैज्ञानिक समाजवाद की स्थापना था। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को भारतीय समाज की ठोस परिस्थिति में आकलन कर उसे लागू करने  की जरूरत बताई थी, जिसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर चिंता जाहिर की कि आज विश्वविद्यालयों में युवापीढी को  सुनियोजित साजिश के तहत राहुल सांकृत्यायन की विचारधारा से वंचित रखने की कोशिश की जा रही है। परिचर्चा मे नर्मदेश्वर सिंह, कुंदनकुमार, रामचंद्र सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
परिचर्चा का संचालन करते हुए स्वतंत्र पत्रकार, साहित्यकर्मी सह सेवानिवृत शिक्षक ब्रह्मानन्द ठाकुर ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन को मार्क्सवादी बनने की प्रेरणा उनके बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद मिली। वे 1930  में श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। वे महात्मा बुद्ध के अनीश्वरवाद से प्रभावित हुए। महात्मा बुद्ध का यह मानना था कि हर चीजें क्षण -क्षण बदल रही हैं।  स्थाई और शाश्वत जैसा कुछ भी नहीं है। जो चीजें बदलती नहीं, वह वास्तव में है ही नहीं। वह तो केवल कल्पना है। बुद्ध के इन्हीं विचारों ने उन्हे काफी गहराई तक प्रभावित किया। बाद में राहुल सांकृत्यायन इस निर्माण पर पहुंचे कि यह सब  होते हुए भी  बौद्ध दर्शन जो काम नहीं कर सका उसे मार्क्सक्सवाद ने कर दिखाया और सोवियत समाजवादी क्रांति सफल हुई,  जिससे सर्वहारा की राजसत्ता कायम हो सकी।
उन्होंने कहा कि राहुल सांकृत्यायन को साहित्य ,अध्यात्म ,ज्योतिष ,विज्ञान ,इतिहास ,समाजशास्त्र ,दर्शन, राजनीति ,भाषा ,और संस्कृति के टुकडों में बांट कर नहीं ,समग्रता में देखने – समझने की जरूरत है। उनका यह भी मानना था कि शोषणमुक्त वर्ग विहीन समाज की स्थापना मंचों पर भाषण देने और बड़े-बड़े लेख लिखने से नहीं, बल्कि देश के अंदर धर्म और जाति भेद की दीवारों को ध्वस्त कर ,  आपसी एकजुटता कायम करने से ही सम्भव है।  समारोह की अध्यक्षता करते हुए, जाने- माने शिक्षक नेता नागेश्वर प्रसाद सिंह  ने कहा कि राहुल सांकृत्यान जैसे व्यक्ति युगों बाद पैदा होते हैं। उनके जीवन के 68 वर्ष  नूतन समाज की स्थापना के लिए समर्पित रहे। अपनी खोजी प्रवृति के कारण वे जहां जहां गये ,वहां की भाषा सीखी और उसके विभिन्न ग्रंथों का विस्तार से अध्ययन किया। इसी प्रवृति ने उनको केदार पाणडेय से  दामोदर साधू और फिर राहुल सांकृत्यायन बना।  विषय प्रवेश एआईडीएसओ के  राज्य अध्यक्ष आशुतोष कुमार ने किया। समारोह में  एआईडीवाईओ के जिलाअध्यक्ष अरविन्द कुमार ,डीएसओ के विजय कुमार ,शिव कुमार ,शिवचंद्र ,उदय झा , शिक्षक प्रमोद कुमार ,रवीन्द्र पासवान , कुमोद कुमार , राजेश कुमार ,चंदन कुमार , आदि दर्जनों छात्र ,युवक उपस्थित थे।