पुरु शर्मा

सुबह घूमना मुझे हमेशा से ही सुहाता रहा है। प्रकाश के आभाव में जब अंधकार का साम्राज्य बढ़ता है तब उम्मीद की रौशनी लेकर निकलता है सूरज। सूर्य का लाल चादर ओढ़ आसमान से निकल रात के अंधकार को चीरते हुए धीरे-धीरे अपनी रक्तिम आभा को धरती पर बिखेरते देखना एक अलग ही अहसास करता है।  यह वह समय होता है जब हवा में अजीब सी खुशनुमा ठंडक होती है। और गाँव की सुबह के तो कहने ही क्या। नदी, जंगल, शुद्ध वातावरण सुबह को और मनमोहक बना देते हैं। हमारे गाँव से भी एक कैथन नदी निकलती है। नदी के दोनों ओर के विशाल किनारों पर वृक्षों की कतारबद्ध श्रृंखला किसी को भी अपनी ओर सहसा ही आकर्षित करती हैं। सुबह नदी चलने का ख्याल जब दोस्तों से साझा किया तो सब झट तैयार हो गए। सूरज की पहली किरण को निहारने के लिए नदी किनारे वक्त बिताने की योजना शाम को ही पक्की हो गई। सुबह के इंतजार में रात जैसे काफी बड़ी लगने लगी । खैर सुबह करीब साढ़े छह बजे हमारी टोली आनंद के सागर में गोते लगाने निकल पड़ी ।कच्चे ढलवां लहरदार रास्ते के दोनों ओर आराम करते मवेशी, खेतों और सीताफल के बगीचों, भेड़-बकरियों के झुण्ड को पीछे छोड़ते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे।

हम जैसे ही नदी के तट के करीब पहुंचे पक्षियो की एक टोली ने हमारी सुबह को खुशनुमा बना दिया और हम लोग अपलक नयनों से उन्हें निहारने लगे ।वे कभी अपने पंखो को साफ करते, कभी पानी से मछलियों को पकड़ते। एक-दूसरे को आवाज लगाते इन पक्षियों को निहारते वक्त तभी संगमरमर सी चट्टानों पर बैठी चिड़ियों के एक झुंड की उड़ान से आसमान खिल उठा। एक तरफ सूरज की अरुणायी किरणें धरती पर पड़े रही थीं तो दूसरी ओर नदी की कलकल धारा पर चिड़ियो के झुंड की जो छाया पड़ रही थी वो हम सभी का मन मोह गई । सूरज की किरणें जैसे-जैसे अपना तेज बढ़ा रही थीं नदी का रंग वैसे-वैसे चमकीला होता गया । पठा के पत्थरों का रंग सूर्य की चमक से और चमक उठा ।सुर्ख लाल हो चुकी सूर्य की रक्तिम आभा जब अठखेलियां करती नदी की लहरों को स्पर्श करती तो ऐसा लगता जैसे सोन मछली जल-क्रीड़ा कर रही हो। कल-कल बहता कैथन नदी का जल जब संगमरमर सी चमकती चटटानों से टकराती तो कानों में संगीत की मधुर धुन सुनाई देती । नदी का यह दृश्य बड़ा ही मनभावन लगने लगा । ये सुबह हम सभी के लिए किसी कल्पना से कम नहीं थी ।

सुबह के इस अप्रितम सौन्दर्य को निहारते जी नहीं भरा। अल्लहड़पन भरा बचपन, विभावरी का प्रथम आलिंगन, कैथन की चंचल चितवन निरंतर बहती धारा में मन रम सा गया ।सूर्य का प्रकाश जैसे-जैसे तीक्ष्ण होता गया नदी पर बने डैम पर आने-जाने वालों की भीड़ भी बढ़ने लगी । लिहाजा हम लोगों ने भी प्राकृतिक छटा का अवलोकन कर घर लौटने की तैयारी करने लगे, तभी अचानक रेत में से काँच का एक टुकड़ा चमका। हम कुछ और आगे बढ़े ही थे कि कचरे का ढेर नदी किनारे पड़ा दिखा और मन उदास सा हो गया कि आखिर नदी क्या सोचती होगी। यह सोच ही रहा था की चिड़ियों ने फिर एक चक्कर लगाया। उनके पंखो की फड़फड़ाहट वातावरण में गूंजने लगी। धूप की चमक और तेज हो गई थी। पंछी उड़ान भरते हुए मेरे सिर के ऊपर से निकले। पानी में छोटी मछलियां इधर से उधर हो रही थी। चिड़ियां भी पानी में छपा छप कर गोते लगा रही थीं। मैं वापस पलट गया। ऐसा लगा रहा था जैसे नदी हमारे साथ ही टहल रही हो और हम नदी के साथ चल रहे हों । लेकिन हम नदी को दो छोर की तरह थे, मिलन की आतुरता कभी इन्हें पास ले आती है किन्तु कर्तव्यबोध पुनः इन्हें अलग कर देता हैं, नदी के ये दो किनारे जो कहना चाहते हैं मगर कहते नही और कहते भी हैं तो बस एक लहर की ध्वनि से। एक किनारे से जब उठती है एक हिलोर तो दूसरे किनारे से उठती है और भी ऊंची हिलोर, तब शायद यह सुन लेते हो अपने-अपने प्रतिउत्तर और मुस्कुरा देते हैं । एक-दूसरे की तरफ जिसे दूसरा देख शायद ही देख पाता हो बस वो तो अनुभव ही कर सकता है। वो नदी के पानी के सहारे करते हैं एक-दूसरे को स्पर्श, सहलाते हैं एक-दूसरे का तन, मगर मिल नही पाते। फिर भी तट खुश हैं इस आशा के साथ कि कहीं तो होगा मिलन चाहे तलहटी की गहराइयों में ही सही ।

और फिर वे बहने लगते हैं  उसी उल्लास, उसी लय, सुर, ताल के साथ । बिना रुके, बिना थके और उसी क्षण पूरी नदी एक सुख से परिपूर्ण मुस्कान से भर जाती है जो नदी को बना देती है पावन, पवित्र, मधुर, पापहरणी, तारिणी। नदी की महिमा का गुणगान करते हुए मैं नदी को अलविदा कहने के लिए मुड़ा और अगली बार मुलाकात के मूक वायदे के साथ घर की ओर चल पड़ा। सुबह का सौंदर्य और नदी के किनारे अब पीछे छूटने लगे थे और सूर्य भी अपना तेज बढ़ाने लगा और मैं अपने बढ़ते कदमों के साथ यह सोचता हुआ घर पहुंचा कि ये सुबह फिर कभी तो आएगी ।


पुरु शर्मा / मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में पड़ने वाले खोपर गांव के निवासी । बचपन से ही प्रकृति से गहरा लगाव । पढ़ने और लिखने का शौक । संप्रति वक्त ग्रेजुएशन के छात्र ।