गरीबी के अंधकार से निकली ‘आनंद’ की रौशनी

गरीबी के अंधकार से निकली ‘आनंद’ की रौशनी

anand-5आनंद कुमार 

सुपर 30, वो नाम जिसका जिक्र आते ही देश के तमाम गरीब बच्चों की आंखों में उम्मीद की किरण जग जाती है । जिसके हुनर और लगन का कायल हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबाम भी हैं । सादगी ही जिसका हमराही है और गरीब बच्चों को ताकत देना जिसका लक्ष्य । तमाम खूबियों से भरे सुपर 30 के संचालक आनंद कुमार को दीपावली पर उनके ही पढ़ाए बच्चों की सफलता की सूचना मिली तो उनको जो सुखद एहसास हुआ उसे आनंद कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर साझा कि । आप भी पढ़िये और ‘आनंद’ की अनुभूति कीजिए

नये सफर पर ‘बेटी शिवांगी’

ये तस्वीरें आईना भी हैं और अश्क भी । इनमे कल भी है और आज भी।  सुर भी है साज भी । इन तस्वीरों में बीते कल की ख़ामोशी है और आज की बुलंदी भी । ये दोनों तस्वीरें मेरी शिष्या शिवांगी की हैं । एक उस समय कि जब शिवांगी आपने पिता के साथ सुपर 30 में पढ़ने आई थी और एक अभी की । स्कूल के समय से ही वह अपने पिता को सड़क के किनारे मैगज़ीन और अख़बार बेचने में मदद किया करती थी । जब पिता थक जाते या खाना खाने घर जाते तब शिवांगी ही पूरी जिम्मेवारी संभालती थी, लेकिन उसे जब भी समय मिलता पढ़ना वह नहीं भूलती थी। शिवांगी उत्तर-प्रदेश के एक छोटे सी जगह डेहा (कानपुर से कोई 60 किलोमीटर दूर) के सरकारी स्कूल से इंटर तक की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी । एक दिन उसने अख़बार में सुपर 30 के बारे में पढ़ा और फिर मेरे पास आ गई ।

anand2सुपर 30 में रहने के दरमियान मेरे परिवार से काफी घुल-मिल गयी थी । मेरी माताजी को वह दादी कह कर बुलाती थी और हमलोग उसे बच्ची कहा करते थे । कभी माताजी की तबीयत ख़राब होती तब वो उनके साथ ही सो जाया करती थी । आई. आई. टी. का रिजल्ट आ चुका था और वह आई. आई. टी. रूड़की जाने की तैयारी कर रही थी । उसकी आँखों में आसू थे और मेरे परिवार की सभी महिलाएं भी रो रहीं थीं, जैसे लग रहा था कि घर से कोई बेटी विदा हो रही हो । उसके पिता ने जाते-जाते कहा था कि लोग सपने देखा करते हैं और कभी-कभी उनके सपने पूरे भी हो जाया करते हैं, लेकिन मैंने तो कभी इतना बड़ा सपना भी नहीं देखा था |

आज भी शिवांगी मेरे घर के सभी सदस्यों से बात करती रहती है । अभी जैसे ही उसकी नौकरी लग जाने की खबर हमलोगों को मिली मेरे पूरे घर में ख़ुशी की लहर सी दौड़ गयी । सबसे ज्यादा मेरी माँ खुश हैं और उनके लिए आखों में आंसू रोक पाना मुश्किल हो रहा है । उन्होंने बस इतना ही कहा कि अगले जनम मुझे फिर से बिटिया कीजियो ।

जब अंकित के एक फोन से मिला दिवाली गिफ्ट

anand-3दीपावली के वक्त अंकित रंजन का भी फ़ोन आया | मैंने सोचा कि दीपावली की बधाई देगा, लेकिन जब अंकित ने बताया कि उसकी नौकरी टाटा मोटर्स में लग गयी है, तब मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं रहा और मैं कई साल पीछे चला गया।  मुझे याद आया अंकित के पिताजी का चेहरा । वे बड़े विनम्र भाव से हाथ जोड़े मेरे सामने खड़े थे और बोल रहे थे कि मैं एक मामूली लाइन मैन हूँ, टेलीफोन डिपार्टमेंट में । प्लीज आप मेरे बेटे को रख ले अपने शरण में । मैंने अंकित के टैलेंट और उसके पिता के व्यवहार से प्रभावित होकर उसे अपने पास रख लिया ।

अंकित बहुत ही मेहनती तथा टैलेंटेड था । सुपर 30 में कई बच्चों की समस्यायों का समाधान भी कर देता था । एक दिन चुपके से उसके पिताजी मुझसे मिलाने आये और उन्होंने कहा कि सर आज से समझ ले कि अंकित आपका ही बेटा है । बड़ी तारीफ करता है वह आपकी । अब वह आपकी ही जिम्मेवारी है । सच में मैं उसके बाद अंकित को अपने बेटे जैसा मानने लगा । इंटर की परीक्षा शुरू होने ही वाली थी कि अचानक एक मनहूस खबर मुझे मिली कि अंकित के पिता का एक्सीडेंट हो गया है और वे अस्पताल में भर्ती हैं । अंकित को संभालना काफी मुश्किल हो रहा था । चार दिनों के बाद उसके पिताजी इस दुनिया को छोड़ कर चल बसे । तब जितना भी हो सका मैंने अंकित को पिता और गुरु दोनों का प्रेम देने का प्रयास किया । इस बीच आई. आई. टी. का रिजल्ट आ गया था और अंकित खुश था । आज जब अंकित ने बताया कि उसकी नौकरी लग गयी है तब मुझे लगा कि जैसे मेरे ही अपने बेटे को सफलता मिली हो।

मुझे आज ऐसा लग रहा कि अंकित के पिताजी मेरे सामने मुस्कुराते हुए खड़े हैं और उनके हाथों में एक मिठाई का डब्बा है और उसे मेरे आगे बढ़ाते हुए जैसे कह रहें हों – सर आज दीपावली के एक दिन पहले ही मैं बहुत खुश हूँ, क्योकि आज मेरे नहीं बल्कि आपके बेटे अंकित ने मेरे सपने को पूरा कर दिया है। हैप्पी दीपावली सर ।                                                                                                                                                                         आनंद कुमार के फेसबुक वॉल से साभार


आनंद कुमार/  गरीबी में पले-बढ़े, गणित के अंकों से खेलने में माहिर । पैसों की कमी की वजह से मनचाहा लक्ष्य नहीं मिला तो गरीब बच्चों के सपने साकार करने को ही अपना लक्ष्य बना लिया । करीब 13 साल पहले पटना में सुपर 30 का सफर शुरू किया । आज इनके पढ़ाये बच्चे देश के हर IIT  में दाखिला ले चुके हैं और अब देश-दुनिया में अपने हुनर का लोहा मनवा रहे हैं ।  हिंदुस्तान से लेकर अमेरिका तक के राष्ट्रपति तारीफ कर चुके हैं लेकिन इन्होंने किसी से कोई सहायता नहीं मांगी । आज अपने दम पर गरीब और जुनूनी बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का काम कर रहे हैं ।