सोशल मीडिया पर पिछले दो दिनों से शुभकामनाओं का सिलसिला चल रहा है, ऐसे में एक पोस्ट पर नज़र गई। वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन जी की ये पोस्ट नए साल में हमारे सामने एक नया चैलेंज पेश करती है। आपको कुबूल है क्या?

प्रियदर्शन जी की फेसबुक पोस्ट

सप्ताह में पचास घंटे की नौकरी के बाद पढ़ने का समय मिल नहीं पाता। समय चुरा कर पढ़ना पड़ता है। फिर जो नई पुरानी किताबें पढ़ पाया इस साल, उनमें
१. चेतन क्रांति का ‘वीरता से विचलित’ (साथ में पुराना भी पढ़ गया)
२ शेफाली फ्रास्ट का ‘अभी मैंने देखा’
३ किरण सिंह का ‘यीशू की कीलें’
४ इंदिरा दांगी का रपटीले राजपथ
५ मनोहर श्याम जोशी का एक पेच और
६ मृणाल पांडे का हिमुली हीरामणि कथा
७ मुकेश कुमार का फेक एनकाउंटर
८ जाबिर हुसैन का चाक पर रेत
९ कृष्णा सोबती का पाकिस्तान गुजरात से हिंदुस्तान गुजरात
१० अशोक भौमिक का जीवनहाटपुर जंक्शन
११ नीलिमा चौहान का पतनशील पत्नियों के नोट्स
१२ कृष्ण कुमार का दीवार के इस्तेमाल
१३ पवन करण का इस तरह मैं
१४ विमल कुमार का नया संग्रह
१५ वाज़्दा खान के दो संग्रह
१६ गीत चतुर्वेदी का कविता संग्रह न्यूनतम मैं
१७ राना अयूब की गुजरात फाइल्स
१८ मुराकामी का काफ्का आॅन द शोर
१९ अमिताव घोष का हंगरी टाइड
२० आ लाए का खोखला पहाड़
२१ अमिताव घोष का शैडो लाइन
२२ ओम प्रकाश वाल्मीकि के जूठन का दूसरा खंड
२३ अरुंधती रॅाय का मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस

जैसी किताबें तत्काल याद आती हैं। हालांकि इनमें से कुछ कविता संग्रह आधे-अधूरे पढ़े। एरिक हॅाब्सबॅाम और आशीष नंदी की भी कुछ किताबें आधी पढ़ीं। कुछ महत्वपूर्ण लेख पढ़े। लेकिन बहुत सारा पढ़ना बचा रह गया। इसके अलावा मेरी आदत है कि पसंदीदा पुराने कवियों, लेखकों और शायरों को बार-बार दुहराता रहता हूं। यानी मूर्द्धन्यों का साथ बराबर बना रहा। इस साल बार-बार मुक्तिबोध की कविताओं-कहानियों और उनके लेखों में भी दाखिल होता रहा।

priydarshan


प्रियदर्शन। ‘सत्याग्रह’ के नियमित स्तंभकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं। रांची के निवासी प्रियदर्शन का ठिकाना इन दिनों उत्तरप्रदेश का गाजियाबाद है। आप प्रियदर्शन को अपनी साहित्यिक अभिरुचि से  इलेक्ट्रानिक मीडिया को कुछ संवेदनशील और मायनीखेज बनाने वाले चंद संजीदा लोगों की श्रेणी में रख सकते हैं।