बदलाव प्रतिनिधि, दिल्ली

गुरुग्राम में रेयान इंटरनेशनल स्कूल में मासूम प्रद्युम्न की हत्या की ख़बर से देश सन्न रह गया । लिहाजा हर कोई अपने-अपने तरीके से गुस्से का इजहार कर रहा और प्रद्युम्न को इंसाफ दिलाने के लिए धीरे-धीरे ही सही आवाज हर तरफ से उठने लगी है । दिल्ली में जंतर-मंतर पर आज शाम कैंडल मार्च की ख़बर सोशल मीडिया पर आने के बाद बदलाव बाल क्लब की टीम ने दिल्ली के मयूर विहार फेस-3 स्थित पॉकेट 4 के केंद्रीय पार्क में प्रद्युम्न के लिए एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया । जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे और उनके अभिभावक शामिल हुए । हाथ में मोमबत्ती लिए बच्चों ने दो मिनट का मौन धारण किया और प्रद्युम्न की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की । इस दौरान प्रद्युम्न की हत्या के बाद देवांशु झा के दिल से निकली कविता… मां जब कहती है कि उसे ईश्वर ने आंखें ही क्यों दीं, का पाठ कुलदीप श्रीवास्तव ने किया । जिससे हर किसी की आंखें नम हो गईं ।

छोटे-छोटे बच्चे जो ये तो नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर प्रद्युम्न की हत्या क्यों हुई, लेकिन ये जरूर समझ रहे थे कि प्रद्युम्न की हत्या स्कूल में हुई है । उस स्कूल में जिसे शिक्षा का मंदिर समझकर मां-बाप अपने जिगर के टुकड़े को बिना किसी सवाल के भेज देते हैं । सुजीत मिश्रा ने प्रार्थना सभा में आए लोगों से अपील की कि अब वक्त आ गया है जब हम स्कूल से सवाल करें और पूछें कि वो हमारे बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए हैं । अंजनि सिंह ने शिक्षा के मंदिर में बढ़ते अपराध पर चिंता जाहिर की और कहा कि शहरों की ये बीमारी अब गांवों तक बढ़ने लगी है, जिसके बारे में हमें सोचना पढ़ेगा । वहीं अरुण यादव ने प्रद्युम्न की हत्या के लिए शिक्षा के बाजारीकरण को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि प्रद्युम्न की हत्या के लिए हमारी सरकारें जिम्मेदार हैं क्योंकि सरकार की नाकाबी की वजह से ही शिक्षा का बाजीरकरण हुआ है ।प्रार्थना सभा में बड़ी संख्या में मिक्स हाउसिंग सोसायटी के लोग भी शामिल हुए ।

प्रद्युम्न को हर कोई अपनी-अपनी तरह से श्रद्धांजिल दे रहा है… न्यूज़ चैनल में काम करने वाले अमित कुमार ने प्रद्युम्न पर कुछ लाइनें लिखी हैं आप भी पढ़िए—

मैं प्रद्युम्न बोल रहा हूं..
मैं तो चाहता था आपकी दुनिया में रहना
जिसने मुझे सबसे दूर किया उसे छोड़ना मत
जिसने मुझे जानवरों की तरह तड़पाया, उसे छोड़ना मत
जिसने बेरहमी से मेरा गला काटा उसे छोड़ना मत ।

पापा कहते थे प्रद्मुम्न का मतलब होता है कृष्ण का पुत्र
उन्हें क्या पता था एक दिन कंस आएगा
और उनके लाडले को उनसे छीन ले जाएगा।
जिसने मेरे पापा को रुलाया उसे छोड़ना मत
जिसने मेरी मम्मी को रुलाया उसे छोड़ना मत ।

मेरे स्कूल की ऊंची-ऊंची लाल दीवारें
कितनी प्यारी लगती थीं मुझे
लेकिन इक दिन इन्हीं दीवारों को
कोई मेरे खून से रंग देगा, ये मैंने सोचा नहीं था
जिसने स्कूल को काल कोठरी समझा
उस हैवान को छोड़ना मत ।

मेरा तो सब पीछे छूट गया
स्कूल बैग, किताबें, होमवर्क
दोस्तों के साथ लंच
खेलना, कूदना, दौड़ना, भागना
अब कुछ भी तो नहीं
अब कभी तो नहीं
मेरा तो हर सपना टूट गया
जिसने मेरा सपना तोड़ा, उसे छोड़ना मत ।

क्लास में जब बजती छुट्टी की घंटी
मैं भागता था दरवाज़े की तरफ
घर पहुंचने की जल्दी
मां से मिलने की जल्दी
बहन के साथ खेलने की जल्दी
लेकिन अब कुछ भी तो नहीं
मेरी तो दुनिया से ही छुट्टी हो गई।
जिसने मुझे मेरी बहन से छीना..उसे छोड़ना मत
जिसने मेरी सांसों को मुझसे छीना उसे छोड़ना मत
मेरी उम्मीदों को तोड़ना मत ।

मुझे पता है मुझे अब सब जान गए हैं
लेकिन उन वजहों से नहीं
जैसा मैं चाहता था
मैं तो चाहता था कि गर्व करे दुनिया मुझ पर
सिर ऊंचा करूं हर हिंदुस्तानी का
लेकिन ये क्या
मेरी वजह से मेरा देश रो रहा है
मेरी जिस मौत पर इस देश को रोना आया
वो मौत देने वाले राक्षस को छोड़ना मत
मेरी उम्मीदों को तोड़ना मत।                                                                            अमित कुमार के फेसबुक वॉल से साभार

 

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