पुष्यमित्र

पारिवारिक वजहों से लगभग आधा अगस्त महीना सहरसा आते-जाते गुजरा। इस दौरान मैने महसूस किया कि सड़क मार्ग से सहरसा से मधेपुरा जाने में ठीक-ठाक हिम्मती लोग भी घबरा जाते हैं। महज 18 किमी के इस रास्ते पर लोग बाइक से सफर करने में भी घबराते हैं। जो बसें चलती हैं उन्हें अमूमन दो घंटे का वक़्त लग जाता है और सवारियों की हड्डियों का कचूमर निकल जाता है।

लोकसभा चुनाव के वक़्त भी शरद यादव जैसे प्रत्याशी इस दूरी को हेलीकाप्टर से पाटते थे। यह पूर्णिया से महेशखूट तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा है। इस रास्ते पर आगे भी सड़क की हालत खस्ता ही है। काफी पहले से है। 2016-17 में भी मैं इस सड़क की बदहाली पर रिपोर्ट कर चुका हूं। यह नमूना है कि कैसे बिहार की सड़कें फिर से प्री 2005 युग में पहुंचने लगी हैं।पूर्णिया जिला जो एक वक़्त अच्छी सड़कों के लिए जाना जाता था, उसकी सड़कें भी जर्जर होने लगी हैं। NH 31 का हाल भी काफी बुरा है। कटिहार में भी सड़कों की स्थिति ठीक नहीं है। गिरिन्द्र के गांव में जो सड़क पहली दफा बनने वाली थी, वह भी अधर में है।ले देकर इस इलाके में स्वर्णिम चतुर्भूज वाली सड़क बची है जिसके सहारे पटना आना जाना हो रहा है। ये सड़कें नीतीश के इकबाल पर भी सवाल खड़े कर रही हैं, क्योंकि अच्छी सड़कों की ब्रांडिंग कर के ही उन्होने सुशासन बाबू का खिताब हासिल किया था। चुनाव सर पर है और लोग परेशान हैं। अब देखना है कि वे इसे कैसे संभालते हैं। उन्हें डबल इंजन का दूसरा इंजन गाढ़े वक़्त पर धोखा दे रहा है। NH की मरम्मत तो उन्हीं के जिम्मे है ।

बहरहाल मधेपुरा में जागरुक लोग सड़क के लिए सड़क पर उतर गये हैं। इन्हें पूरा समर्थन है। देखिये यह क्रांति क्या रंग लाती है।

पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल