उमेश जोशी

अखाड़ेबाज़ शब्द आसपास मंडराते हैं
ये हर पल रिश्तों की नींव हिलाते हैं

ख्वाबों की चादर ओढ़ कर यादें सो गईं
थके हुए एहसास अब रातभर जगाते हैं

बीते पलों को कहीं रख कर भूल गए
वो कौन-से पल हैं जो हर पल रूलाते हैं

जज़्बात गुनहगार हैं तो भी गिला नहीं
दो पल का सुकून भी वो ही दिलाते हैं

परिंदे की मानिंद कब वक्त उड़ गया
अब कदमों के निशान फड़फड़ाते हैं


उमेश जोशी। वरिष्ठ पत्रकार। दूरदर्शन के शुरुआती दौर के उन समाचार वाचकों में हैं, जिन्होंने इस विधा को साधा और नई पीढ़ी को तैयार किया। शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बेहद संजीदा पत्रकार। कॉपी राइटिंग का हुनर आपकी स्वाभाविक और सहज पहचान है। दूरदर्शन के बाद टोटल टीवी के साथ लंबी पारी खेली।

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