नूतन डिमरी गैरोला

दूसरों के चेहरों की मुस्कानों से
उल्लसित हो जाना
तृप्त हो जाना
मुस्कानों के सिलसिलों का
खुद के
चेहरे से जारी हो कर
दुनियां भर में फ़ैल जाना।
कितना आसां है।
पर जितनी आसानी से मुस्काने बिखर सकती है
उतनी ही दुरूह हो गयी हैं।

यूं नहीं कि आधी आबादी
भूखे पेट सोती है
भरपेट भी हो तो
यूं कि
गर उसके हाथ में रोटी है
तो क्यों है?


नूतन डिमरी गैरोला। पेशे से डॉक्टर। दिल से कवि। कानपुर से उच्च शिक्षा। संप्रति-देहरादून में निवास।

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