सचिन कुमार जैन

indo-pak-warयुद्ध ऐसी भूख है
जो जिन्दा को खाती है
इंसान हो, जानवर हो
नदी हो, या बर्फ के पहाड़
उसे तो बस लाशें भाती हैं
जितनी ज़्यादा लाशें
भूख युद्ध की
उतनी ही बढ़ती जाती है,

घर जमीन की लूट की खातिर
युद्ध हो जाते हैं
घर जलता देख
लोग शरणार्थी हो जाते हैं
शिविर बनाने वाले
बुद्ध हो जाते हैं
किसका घर जला
किसका घर हुआ रोशन
सवाल ऐसे अनुत्तरित रह जाते हैं,

युद्ध व्यापार है
युद्ध हथियारों का बाज़ार है
युद्ध गुलामी की राह है
युद्ध दिमागों को बाँधने का औज़ार है,

युद्ध बस जन्म लेता है
युद्ध जन्म लेने के बाद मरता नहीं है
मरती है इंसानियत,
युद्ध ऐसा बोझ है
जिसे ढोती हैं पीढियां
पेट युद्ध का कभी भरता नहीं है,

युद्ध के मैदान में नहीं लड़ते हैं बच्चे
चुपचाप दबे पाँव पलने तक जाता है
बचपन को युद्ध, खा जाता है,

युद्ध होता है हमेशा
अन्याय के पक्ष में
और न्याय के विरुद्ध,

युद्ध एक आंधी के रूप में आता है
दिल से दिमाग के रिश्ते तोड़ जाता है,

युद्ध तो भावनाओं से खेलता है
यद्ध सियासत को सान कर खून से
सत्ता की रोटियां बेलता है,
जब सच आने लगता है बाहर
सीमा के इस पार
सीमा के उस पार
सम्राट युद्ध की संभावना ठेलता है,

जब नशाखोर हो जाता है जगत
युद्ध के पक्ष में खड़ा नज़र आता है मत
जहर बुझे मन के लिए
युद्ध मनोरंजन का मंच हो जाता है,

उन्माद आग है किताब के लिए
उन्माद चुनौती है मज़हब के लिए
उन्माद चुनौती है राष्ट्र के लिए
फिर भी उन्माद का जोर है,

उन्माद को रोकने का
जतन करता इंसान
राष्ट्र के खिलाफ है
नियम आजकल यही चारों ओर है।


sachin kumar jainसचिन कुमार जैन। विकास संवाद नाम की स्वयंसेवी संस्था से जुड़े हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर स्वतंत्र चिंतन और अभिव्यक्त करने का जोखिम उठाने का माद्दा रखते हैं।

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