The Prime Minister, Shri Narendra Modi addressing the Nation on the occasion of 70th Independence Day from the ramparts of Red Fort, in Delhi on August 15, 2016.सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में अब सवर्णों को भी 10 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा । अब तक आरक्षण का फायदा SC, ST और OBC को मिल रहा था, कुछ राज्यों में सवर्णों के लिए भी आरक्षण का प्रयास किया गया था । लेकिन अब पूरे देश में गरीब सवर्णों को भी इसका फायदा मिल सकेगा । दरअसल दशकों से आर्थिक आधार पर आरक्षण नीति बनाने की मांग हो रही थी, लेकिन कोई भी सरकार ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर पायी। क्योंकि पहले से आरक्षण पा रहे तबकों के नाराज़ होने का खतरा था । लेकिन पहली बार मोदी सरकार ने सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला ले कर सबको चौंका दिया है । इसे लागू करने के लिये सरकार संसद में संविधान संशोधन विधेयक लायेगी । इसे पास कराने के लिये तीन चौथाइ सांसदों के समर्थन की ज़रूरत होगी जो सरकार के पास नहीं है और सवाल यही पर है कि, क्या कांग्रेस, एसपी, BSP जैसी पार्टियां सवर्ण आरक्षण का विरोध करेगी…? संसद में साफ हो जायेगा कि कौन सवर्णों के पक्ष में है और कौन विरोध में लेकिन उससे पहले सवर्ण आरक्षण की सियासत को समझना होगा। इस बात को जानना होगा कि क्या ये बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक है या दूसरों के मुद्दों को अपना मुद्दा बना कर चुनावी शतरंज की तैयारी तो नहीं ।

संविधान में 50% आरक्षण की सीमा है । अगर सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा तो आरक्षण सीमा 60 फीसदी तक पहुंच जाएगी । इसलिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा । इसके लिए सरकार संविधान संशोधन बिल लाएगी । इसके तहत गरीब सवर्णों को आरक्षण का प्रावधान दिया जाएगा । अब मोदी सरकार पूरे देश में लागू करेगी तो इन्हें मिलेगा फायदा-
1- जो लोग EWS कैटेगरी (गरीब) में आते हैं ।
2- जिनकी आय 8 लाख रुपए सालाना से कम है ।
3- जिन सवर्ण किसानों के पास 5 हेक्टेयर से कम ज़मीन है।
4- 1 हजार स्क्वायर फ़ीट से कम ज़मीन वाला घर हो ।
5- 109 गज से छोटा रेजिडेंशियल प्लॉट हो शहर (म्युनिसिपलिटी) में ।
6- 209 गज से छोटा प्लॉट हो गांव या छोटा शहर में ।
7- आरक्षण का लाभ उठाने के लिए आपको आय प्रमाण पत्र दिखाना होगा ।
8- इसके अलावा आरक्षण का फायदा उठाने के लिए जाति प्रमाण पत्र, बीपीएल कार्ड और पैन कार्ड भी दिखाना होगा ।
9- आरक्षण का लाभ उठाने के लिए यही नहीं आधार कार्ड, बैंक पास बुक और इनकम टैक्स रिटर्न भी दिखाना जरूरी होगा । जब बिल सामने आएगा तो टर्म एंड कंडीशन साफ हो जाएगा ।

अब सवाल ये है कि क्या ये बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक है ? या नाराज सवर्णों को मनाने के लिए लॉलीपॉप ? या संघ के एजेंडे को लागू करने का फॉर्मूला अपनाने की ये पहली कड़ी है ? क्योंकि संघ भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करता रहा है । मकसद भी है कि आरक्षण में संशोधन कर उसे आर्थिक आधार पर किया जाए । वहीं दूसरे नजरिये से देखा जाए तो बीएसपी, एलजेपी, आरपीआई, कांग्रेस, एसपी की मांगों को पूरा बीजेपी सरकार पूरा करेगी । बीएसपी अध्यक्ष मायावती भी लंबे समय से सवर्ण आरक्षण की समर्थक रही हैं । हमेशा गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात कही है। एलजेपी ने 15 फीसदी सवर्ण आरक्षण की वकालत करती रही है। वहीं महाराष्ट्र के दलित नेता रामदास आठवले ने 25 फीसदी आरक्षण की मांग करते रहे हैं । कांग्रेस 10 फीसदी तो वहीं आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को छोड़कर एसपी भी 10 से 25 फीसदी आरक्षण देने की वकालत करती रही हैं । हाल ही में दलित आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने कहा था कि गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। बीजेपी इन मांगों को देखते हुए संविधान संसोधन करने वाली है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद संसद में ये बिल लटकना तो नहीं चाहिए क्योंकि सवर्ण आरक्षण के लिए ज्यादातर पार्टियां आवाज उठाती रही हैं ।

ऐसा नहीं है कि सवर्णों के आरक्षण के लिए ये पहला प्रयास है । पहले आजादी के बाद के इतिहास को पढ़िए फिर आजादी से पहले मिलने वाले आरक्षण पर बात करेंगे। लेकिन उससे पहले समझिए क्या कहता है संविधान?
संविधान की माने तो आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता है और किसी की आय और संपत्ति के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 16(4) के मुताबिक, आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है और किसी व्यक्ति को नहीं। इस आधार पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के फैसलों पर रोक लगा चुका है। अपने फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।

2 साल पहले अप्रैल, 2016 में गुजरात सरकार ने जनरल वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की थी। सरकार ने अपने फैसले में 6 लाख रुपये से कम सालाना आय वाले परिवारों को इस आरक्षण के अधीन लाने की बात कही थी । हालांकि अगस्त 2016 में हाईकोर्ट ने इसे गैरकानूनी और असंवैधानिक बताया था। इसी तरह का प्रयास राजस्थान सरकार ने भी किया था ताकि सवर्ण गरीबों को थोड़ी मदद हो जाए । सितंबर 2015 में राजस्थान सरकार ने जनरल कैटेगरी के गरीबों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 14 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था। हालांकि दिसंबर, 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस आरक्षण बिल को रद्द कर दिया था और ऐसा ही हरियाणा में भी हुआ था। यानी 2015 से 2017 के बीच तीन राज्यों की कोशिश पर कोर्ट ने पानी फेर दिया । हवाला संविधान का दिया गया । 1978 में बिहार में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने आर्थिक आधार पर सवर्णों को 3 फीसदी आरक्षण दिया था। बाद में इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ और कोर्ट ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया ।

1991 में मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के ठीक बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया था और 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी । लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे निरस्त कर दिया था । हर बार संविधान का हवाला देकर सरकारों के प्रयासों पर कोर्ट ने पानी फेर दिया । हालांकि किसी सरकार ने संविधान में संशोधन कर इसे लागू करने की कोशिश नहीं की । चूंकि राज्य सरकारों के पास संविधान संशोधन का पावर नहीं है इसलिए उनके द्वारा दिया गया आरक्षण लागू नहीं हो सका । अब पीएम मोदी की सरकार बकायदा संविधान में संशोधन कर सवर्णों को आरक्षण देने जा रही है और इसके लिए बकायदा राज्यसभा कार्यवाही की अवधि भी बढ़ा दी गई है ताकि लोकसभा में पास होने के बाद राज्य सभा में बिल पास हो जाए । अधिकांश पार्टियां इसके पक्ष में भी हैं । कांग्रेस, बीएसपी, एसपी, आम आदमी पार्टी समेत कई पार्टियों ने समर्थन भी किया है । लेकिन आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने विरोध किया है । उनका कहना है कि 15 फीसदी सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण और 85 फीसदी बाकी वर्गों को सिर्फ 50 फीसदी आरक्षण । खैर आरक्षण को लेकर अब एक नई राजनीति शुरू हो गई है ।
देश में आरक्षण (रिजर्वेशन) का मुद्दा सालों से चला आ रहा है। आजादी से पहले ही नौकरियों और शिक्षा में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण देने की शुरुआत कर दी गई थी। इसके लिए अलग-अगल राज्यों में विशेष आरक्षण के लिए आंदोलन होते रहे हैं। राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट और अब गुजरात में पाटीदारों (पटेल) ने आरक्षण की मांग उठाई है। आरक्षण का सवाल नया नहीं है । वरिष्ठ पत्रकार आशीष महर्षि ने इस मामले में इतिहास से कुछ रोचक जानकारी भी दी है । उन्होंने अपने सोशल साइट पर कुछ तथ्य पोस्ट किये हैं और बताया है कि कैसे हुई आरक्षण की शुरुआत ?

आजादी के पहले प्रेसिडेंसी रीजन और रियासतों के एक बड़े हिस्से में पिछड़े वर्गों (बीसी) के लिए आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1901 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी (नौकरी) देने के लिए आरक्षण शुरू किया था। ये भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है।
– 1908 में अंग्रेजों ने प्रशासन में हिस्सेदारी के लिए आरक्षण शुरू किया। 1921 में मद्रास प्रेसिडेंसी ने सरकारी आदेश जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मण के लिए 44 फीसदी, ब्राह्मण, मुसलमान, भारतीय-एंग्लो/ईसाई के लिए 16-16 फीसदी और अनुसूचित जातियों के लिए 8 फीसदी आरक्षण दिया गया।
– 1935 में भारत सरकार अधिनियम 1935 में सरकारी आरक्षण को सुनिश्चित किया गया। 1942 में बाबा साहब अम्बेडकर ने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग उठाई।
आरक्षण का उद्देश्य केंद्र और राज्य में सरकारी नौकरियों, कल्याणकारी योजनाओं, चुनाव और शिक्षा के क्षेत्र में हर वर्ग की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए की गई। जिससे समाज के हर वर्ग को आगे आने का मौका मिले। सवाल उठा कि आरक्षण किसे मिले, इसके लिए पिछड़े वर्गों को तीन कैटेगरी अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में बांटा गया। फिलहाल महाराष्ट्र में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 16% आरक्षण दिया गया। तमिलनाडु में सबसे अधिक 69 फीसदी आरक्षण लागू किया गया है। इसके बाद महाराष्ट्र में 52 और मध्यप्रदेश में कुल 50 फीसदी आरक्षण लागू है।

कानून कहता है कि – अगर 15(4) और 16(4) के तहत साबित हो जाता है कि किसी समाज या वर्ग का शैक्षणिक संस्थाओं और सरकारी सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो आरक्षण दिया जा सकता है। 1930 में एच. वी. स्टोर कमेटी ने पिछड़े जातियों को ‘दलित वर्ग’, ‘आदिवासी और पर्वतीय जनजाति’ और ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ (OBC) में बांटा था। भारतीय अधिनियम 1935 के तहत ‘दलित वर्ग’ को अनुसूचित जाति और ‘आदिम जनजाति’ को पिछड़ी जनजाति नाम दिया गया और इन्हें हर क्षेत्र में आरक्षण दिया गया। साथ ही कोई क्रीमीलेयर का प्रावधान नहीं है। जबकि अन्य पिछड़े वर्ग में 8 लाख सालाना कमाई करने वाले लोग क्रीमीलेयर में आते हैं और उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है, वो सामान्य कैटेगरी में आते हैं ।


एस के यादव, टीवी पत्रकार

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