pedon-kee-chhanv-1कई बार यह विचार आता है कि हम अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में जनहित और समाजहित के लिए कितना वक्त निकाल पाते हैं। समाज की बुराइयों से लड़ने की अपनी-अपनी शैली होती है। इन्हीं में से एक शैली है साहित्य के जरिए समाज के मन को बदलने की प्रक्रिया। समाज को संवेदनशील बनाए रखने की कोशिश। और ऐसी ही एक कोशिश गाजियाबाद में पिछले दो साल से चल रही है- पेड़ों की छांव तले रचना पाठ। इस कार्य में संलग्न संयोजक अवधेश सिंह से बात की टीम बदलाव ने।

 बदलाव : इस प्रकार के साहित्यिक आयोजन का खयाल कैसे आया और इस सिलसिले को आप कैसे शुरू कर पाए।

अवधेश सिंह : विचार को मूर्त रूप देना बहुत सहज हो जाता है जब उन विचारों को समर्थन करने वाले व्यक्तियों की संख्या में बढ़ोतरी होने लगे और विचार के उद्देश्य निस्वार्थ और निष्कपट हों। ‘पेड़ों की छांव तले रचना पाठ’ की सोच के पीछे कविता और कविता कर्म को जन मानस में सार्वजनिक और सुलभ करने का था। जो एक बात प्रारम्भ से ही मैं इस योजना में समाहित रखना चाहता था वह बात थी बंधन मुक्त, बाध्यता रहित निश्छल सरल भाव-प्रवण कविता का प्रवाह। मैं चाहता था साहित्यिक आंदोलनों, विधायी विवादों और शास्त्रीयता के कलिष्ट गुणा भाग से परे मानवीय संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति हो। मैं चाहता था हरा भरा शीतल मनोरम प्रकृतिक नैसर्गिक मंच हो। वह आयोजन जिसके लिए आज के आर्थिक विषमता के युग में अर्थ मायने न रखे , अहं को कोई विशेष स्थान न हो, व्यक्तिवाद न हो , अतीत के पूर्वागृह से उपजी विषमताएं न हों।

pedon-kee-chhanv-2बदलाव: दो साल से अनवरत चल रही इस साहित्यिक गोष्ठी की सफलता को कैसे रेखांकित करेंगे ।

अवधेश सिंह – कविता को जन सामान्य तक पहुंचाने की दिशा में पच्चीस आयोजन मायने रखते हैं।  पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” संवेदनात्मक कोमल भावपूर्ण अनुभूति और अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने का वह नैसर्गिक प्राकृतिक मंच है जो मुझे पहले तो एक छोटा सा आयोजन लगता था लेकिन आज समय की पच्चीसवीं सीढ़ी पर पहुँच कर, मुझे यह जिंदगी की जरूरत सा लगने लगा है। क्यों न ऐसा लगे, हमारे कवि मित्र, हमारे श्रोता इस बैठक का इंतिज़ार जो करते हैं। मोबाइल ,एसएमएस और व्हाट्सएप पर हमसे आयोजन की तारीख सुनिश्चित करने का क्रम पंद्रह दिन पहले से प्रारम्भ हो जाता है। हरे भरे पार्क मेंनैसर्गिक वातावरण में , तमाम तामझाम से हट कर गाजियाबाद स्थित वैशाली सेंट्रल पार्क में पहली बार साहित्य के प्रति यह भावनात्मक जुड़ाव दिख रहा है जो अद्भुत है। कितना मित्रवत है कितना स्नेहयुक्त है यह सब, बताना मुश्किल है।

 बदलाव : समाज को इससे अतिरिक्त क्या लाभ दिख रहा है ।

अवधेश सिंह – पेड़ों की छांव तले रचना पाठसाहित्यक गोष्ठी में हम एक महीने में एक बार एक साथ आते हैं और रचनाए पढ़ते हैं। प्रतिक्रिया होती है, विचार को बल मिलता है और मिलती है अपनी विधा को अपनों की शाबाशी। यह मंच एक ओर व्यावहारिक लेखन की आदतों का समर्थन करता है। दूसरी ओर अवसाद मुक्त समाज में मौलिक लेखन का वृहत समुदाय बनाने का उद्देश्य भी यहाँ अपना रास्ता तय करता है ।

pedon-kee-chhanv-3बदलाव : कई बार सफल हो रहे कार्यक्रम का सेहरा लोग स्वयं के ऊपर लेते हैं , इस कार्यक्रम की सफलता किसके कारण हुई ।

अवधेश सिंह – इस आयोजन / संयोजन में हमारे साथ सबसे पहले जुड़ने वाले प्रबुद्ध हिन्दी प्रेमियों में सर्वश्री डॉ वरुण कुमार तिवारी , डॉ रघुवीर शर्मा , डॉ देवेन्द्र कुमार देवेश , मनीष सिंह , राजेन्द्र परदेशी , रमेश तैलंग , ठाकुर प्रसाद चौबे , संजय मिश्र, संजीव ठाकुर , दयाल चंद्र , कपिल देवनागर रहे, जिनके लगातार समर्थन और सहभागिता के लिए हम आभारी हैं। फिर इस समूह का आकार स्वतः बड़ा होने लगा ।

बदलाव : स्थायी रूप से जुड़े साहित्यकार और श्रोताओं में आप किसका नाम लेना चाहेंगे ।

अवधेश सिंह – इस मासिक रचना पाठ की श्रंखला में स्थायी रूप से जुड़े वरिष्ठ साहित्यकार व प्रबुद्ध श्रोताओं के जिसमें सर्वश्री डॉ राधेश्याम बंधु , शिवा नन्द सहयोगी ,संजय शुक्ल , बृजेश तरुवर , ईश्वर सिंह तेवतिया, जगदीश पंकज , मनोज दिवेदी मृत्युंजय साधक , अमर आनंद , श्रीमती मीना पाण्डेय, श्रीमती अंजु सुमन साधक , पूनम माटिया, प्रतिभा माही , पशुपति शर्मा देवी सिंह , श्री बालकृष्ण बेगराज , श्री शिवानंद तिवारी, श्री कैलाश पाण्डेयश्री भीष्म दत्त शर्मा, श्री रघुबर दयाल , श्री रतिराम सागर , श्री धीरेन्द्र नाथ तिवारी , श्री हिमांशु भूषण शर्मा ,श्रीमती नीतू शर्मा , श्रीमती अनीता पंडित , श्रीमती निशा शर्मा श्री शत्रुघन प्रसाद आदि प्रमुख हैं।


awadheshji profileअवधेश कुमार सिंह। साहित्य सेवी, रंगकर्म में अभिरुचि। इन दिनों बीएसएनएल में कार्यरत। कानपुर के मूल निवासी। इन दिनों गाजियाबाद में रहना हो रहा है। आप वेबसाइट  www.hellohindi.com  पर आपकी रचनाओं की झलक देख सकते हैं

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