पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

मेरे पापा। हर बेटे की तरह मेरा भी दावा है सबसे अलहदा हैं मेरे पापा। पापा ने जिंदगी में कब पैंट-शर्ट छोड़ कुर्ता -पायजामा धारण कर लिया, अब तो ठीक से याद भी नहीं। खादी का कुर्ता-पायजामा। खुद उसे धोने की आदत। आयरन भी खुद ही करना पसंद करते हैं। और हां, पापा के कुर्ते में दो-चार जगह ‘तुरपन’ का काम न हो, ऐसा कम ही होता है। मां और घर के दूसरे लोग लाख मना करें लेकिन जब तक खुद का मन न हो किसी कुर्ते या पायजामे को ‘रिटायर’ नहीं करते पापा।

भोपाल के दिनों में ‘संध्या छाया’ नाम का एक नाटक देखा था। बुजुर्ग पति-पत्नी को अपनी मन की दुविधाओं को साझा करते देखना झकझोर गया था। भरे-पूरे परिवार के बीच भी मां-पापा एक दूसरे से न जाने कितनी बातें साझा कर लिया करते हैं। कितनी बातों पर पर्दा डाल लिया करते हैं। और हां, संध्या छाया के ‘बुजुर्ग नायक’ की तरह पापा अपने लिए काम तलाश ही लिया करते हैं। कभी गाड़ी साफ करना। कभी दरवाजे की सफाई। सब्जी-दूध और बाजार का सामान लाना। बच्चों को स्कूल पहुंचाना। दुकान पर राउंड लगा आना। ऐसे काम के लिए 70 पार की उम्र में भी पापा के मन में कोरोना के डर को चकमा देने की ख्वाहिश रहा करती है।

मेरी जिंदगी के आदर्श रहे हैं मेरे पापा। सीधा-सादा जीवन। पापा ने बैंक बैलेंस की कभी फिक्र नहीं की। प्रभु की कृपा से उनका कभी कोई काम रूकते भी नहीं देखा। पापा ने ज्यादा महत्वाकांक्षाएं नहीं पालीं। कारोबारी होने के बावजूद एक संत सरीखा जीवन काट लिया। धन से ज्यादा मान-सम्मान कमाया। आत्मबल हमेशा ऊंचा रखा और यही सीख हम भाईयों को भी दी।

“साईं इतना दीजै, जामे कुटुंब समाए। मैं भी भूखा न रहूं, पथिक न भूखा जाए।” पापा को इसी भाव से जीवन जीते देखा। पथिक को भूखा न लौटने देने की उनकी आदत से मां कई मौकों पर खीझ तो गईं लेकिन इस धर्म को तब तक निभाया, जब तक हाथ-पांव चलते रहे। 20-25 लोगों की रोटियां बेलेने की नौबत भी आईं तो मां ने कभी इंकार नहीं किया। फादर्स डे पर पापा का ‘महिमागान’ मुमकिन ही तब है, जब मां सरीखीं सरल हृदय जीवनसंगिनी उनके साथ हैं।

फादर्स डे पर मदर्स डे की बखार के बाद ‘ब्रदर्स धर्म’ की बात भी करता चलूं। पापा दो भाई थे। अब छोटे पापा और बड़े पापा का चलन है लेकिन हमारे तो चाचा ही थे। पिता की तरह चाचा भी इस ‘प्रवासी बेटे’ पर अपार स्नेह लुटाया करते। पापा-चाचा ने हमें सिखाया कि भाईयों के बीच कैसे प्रेम का धागा मजबूत रखा जाता है। बड़े भाई को चाचा ने असीमित अधिकार दे रखे थे और इसलिए असीमित प्यार के हकदार भी बने रहे ता-जिंदगी। चाचा अब हमारे बीच नहीं लेकिन ‘भैया-भाभी’ की डांट खाते और मुस्काते चाचा की कई सारी प्यारी तस्वीरें जेहन में कैद हैं। फादर्स डे पर प्यारे चाचा को भी नमन।

बहरहाल, दुनिया भर की चिंता लिए रहते हैं पापा। दो भाई वहीं पूर्णिया में रहते हैं। दीदी फिलहाल बेंगलुरू में हैं और मैं यहां दिल्ली एनसीआर की खाक छान रहा हूं। साल दो साल से नहीं बल्कि लगभग दो दशकों से। मुझे लगता है परदेस में रहने की वजह से मेरी कुछ ज्यादा ही चिंता करते हैं पापा। उन्हें लगता है- जिंदगी की बहुत सारी तिकड़में नहीं सीख पाया हूं अब तक। मेरी चिंता करते पापा को देख कई लोगों को चिंता हो जाती है। कितना सुखद होता है जीवन में चिंता करने वाले पिता का होना।

आईलव यू पापा। वी लव यू पापा। वी लव यू ताऊजी। वी लव यू दादा। वी लव यू मामा। वी लव यू नाना। चिंता छोड़िए और फादर्स डे पर हम सभी बच्चों का कहा और अनकहा प्यार महसूस करते रहिए पापा।