पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

”जब आप किसी संस्थान से जुड़ते हैं तो ये पता नहीं होता कि ये सफर कैसा होगा । लेकिन खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ अगर 6 साल लंबा वक्त आप किसी संस्थान में गुजारते हैं तो वहां काम करने वालों के साथ लगाव होना लाजमी है । खासकर मीडिया में काम करने के दौरान भले ही अपने-पन का एहसास जताने का वक्त ना मिलता हो, लेकिन जब आप संस्थान से विदा होते हैं तो साथ काम करने वालों के प्रति आपका रिश्ता शब्दों के जरिए बयां हो ही जाता है । कुछ ऐसा ही हुआ जब 6 साल के लंबे सफर के बाद एडिटर (आउटपुट) पशुपति शर्मा ने 16 नवंबर को जब न्यूज़ नेशन को अलविदा कहा । पशुपति जी ने फेसबुक पर अपने साथियों के साथ बिताए खट्टे-मीठे अनुभवों को साझा किया ।”

जो सफ़र प्यार से कट जाए, वो प्यारा है सफ़र। और ऐसे ही एक प्यारे सफ़र के हमसफ़रों से विदा लेते वक्त, मन कुछ अजीब सा हो चला है। पिछले एक हफ़्ते के दौरान आप सभी की स्नेहिल मुलाक़ातों और शुभकामनाओं के सिलसिले ने ये एहसास और पक्का कर दिया कि रिश्तों का एक संसार जो न्यूज़ नेशन में बना है, वो ता-उम्र मन को मजबूती देता रहेगा, आत्मीयता से सराबोर करता रहेगा। आख़िरी पलों में जितने का हक़दार था, उससे कहीं ज्यादा मिले प्यार ने अभिभूत कर दिया है।

करीब 6 साल। एक लंबा वक्त। ये कहना बेईमानी होगा कि इस दौरान मैंने हर पल आप लोगों की भावनाओं का खयाल रखा। कई मौको पर मुझसे चूक हुई। कई मौकों पर अपने सीनियर्स से लड़ा-झगड़ा। कई मौकों पर जूनियर्स पर बरस भी पड़ा। लेकिन किसी ने मेरे कहे लफ़्ज़ों को दिल से नहीं लगाया। अधिकार बोध ही कुछ ऐसा था कि कई मौकों पर हदों का खयाल न रख सका। अपनापन ही कुछ ऐसा था कि न्यूज़ चैनल की आपा-धापी के बीच भी रिश्तों की डोर मजबूत होती रही। अतुल सर, अनिल सर, संजय सर, अजय सर, सर्वेश सर, सोलंकी सर, अजय वर्मा सर, ब्रज सर…. सभी ने न्यूज़ रूम का लोकतांत्रिक माहौल बनाए रखने की कोशिश की। पूंजी के दबावों के बीच न्यूज़ रूम का ‘समाजवाद’ ज़िंदा रखा। सोलंकीजी की हर दिन की ‘टी-पार्टी’ की कमी महसूस होगी।

कहने की जरूरत नहीं कि न्यूज़ रूम में विपुलजी, मयंकजी, शंभुजी जैसे वरिष्ठ साथियों ने हमेशा कुछ नया सोचने-करने को प्रेरित किया। अब्यज, अशरफजी, सत्याजी, प्रमोद, रवि किशोर, सत्येन, साजिद, पूर्णेन्दु और न्यूज़ रूम के उन तमाम साथियों का शुक्रिया, जिनके साथ काम करते हुए कुछ न कुछ सीखता रहा।अमित ओझा और अनिल यादव (गेस्ट को-ऑर्डिनेशन) जैसे चुनिंदा चेहरे आंखों के सामने घूम रहे हैं, जिन्होंने मेरे ग़ुस्से को बड़े भाई की फटकार मान कर हवा में उड़ा दिया।

रंजेश, अरुण, विनोद, सुबोध, आनंद सीनियर और जूनियर, शीतलमणि सुजीत, मनीष सीनियर, मनीष झा, मनोज चंद्रा, आशीष माणिक, अवधेश, अरविंद, शुभम, पुरुषोत्तम, चंद्रशेखर, ललिता, खुशबू, दीवान, कामरान, इरम, तान्या… इस फेहरिश्त में वो तमाम नाम जोड़ने की ख्वाहिश है, जिन्होंने न्यूज़ रूम में दाखिल होते ही हमेशा गर्मजोशी दिखाई, जिनके बूते अगले 8-9 घंटे सहजता और सकारात्मकता के साथ काम कर सका।

 नीरजजी, अमित शर्मा, निशांत, श्रेष्ठ, रिषी और पीसीआर की पूरी टीम का तो कहना ही क्या, वो तो रनडाउन से लड़ते-झगड़ते भी जो बैलेंस बनाए रखते हैं वो कमाल का है। बड़े इवेंट्स पर नीरजजी की रिसर्च से ग्राफिक्स तक की दौड़, बेचैनी, गुस्सा और फाइनल आउटपुट देने की तड़प भी सीखने लायक चीज़ रही। आईटी टीम के साथी भी याद रहेंगे। शैलेशजी और कैमरा टीम, अशोक जी और पीसीआर टीम भी जेहन में है। एंकर्स बिरादरी से पिनाज़ जी, करुण जी, रवीश, अनुरागजी, विद्या, विशाल, अक्षय, निधि, श्वेता जया, श्वेता श्रीवास्तव समेत तमाम सुदर्शन चेहरों का साधुवाद। न्यूज नेशन के गोल घेरे के साथ आउटपुट की अनबन भी चलती रही। अनिमेषजी, सचिन जी, पुनीत जी, दीपंकरजी और सभी साथियों ने कभी इसे अन्यथा नहीं लिया। बुलेटिन दर बुलेटिन, लाइव दर लाइव लड़ाई बढ़ती गई, मज़ा बढ़ता गया। धीरेंद्र पुंडीरजी की काव्यात्मक रिपोर्टिंग और बाकी ब्यूरो टीम, रिपोर्टर्स से जुड़ी कई यादें, जो फिर कभी।

युद्धवीरजी और वीडियो एडिटर्स की टीम के तमाम साथियों ने हमेशा मुझे हंसते-हंसते झेला। ग्राफिक्स में अनंत सुधाकर सर, रंधीर जी, रक्षित जी समेत तमाम साथियों ने मेरे ‘बचकाने’ खयालों को कई बार बड़ी खूबसूरती से साकार किया और इसकी मुझे वाकई बेहद खुशी है। कई मौकों पर हरनीथ सर और आईटी टीम की ‘अग्निपरीक्षा’ का साक्षी रहा। ट्रांसपोर्ट विभाग के साथी ही तो सफ़र को मुमकिन बनाते हैं।हदें तोड़ते हुए यूपी और एमपी की टीम भी यादों में रहेगी जिनके साथी मिले तो कैंटीन में, लेकिन टीम न्यूज नेशन का एहसास मजबूत कराते रहे।

और अंत में एडमिन, अकाउंट्स और एचआर टीम को साधुवाद, जो न्यूज़ रूम के इस चक्र को चलायमान रखने के लिए सतत क्रियाशील रहते हैं। साथियों, इस छोटे से सफ़र में आपने जितने प्यारे और मीठे अनुभव दिए हैं, वो अपने साथ ले जा रहा हूं। आप भी मेरी कड़ुवाहट के लिए माफ़ कर जो कुछ ‘मीठा-मीठा’ एहसास करा पाया हूं, अपने साथ रखिएगा। न्यूज़ रूम का प्रोड्यूसर होने के नाते मुझे ‘अलविदा’ के बुलेटिन के वक्त का खयाल है। एक और सफ़र पर निकलना है… आप सभी की शुभकामनाओं की दरकार है… शुभकामनाओं का आख़िरी मोंटाज़ जरूर चलाएं दोस्तों।

आपका ही
पशुपति


 

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