धीरेंद्र पुंडीर

“सोना सभी का रक्त बहाता और फिर भी अपने स्थान पर रहता है
कोई ऐसा नहीं जो कि सोने से सबके रक्त का बदला ले।” – बरनी

रानी पद्मावती का इतिहास में कोई जिक्र नहीं आता ये लाइनें आजकल अभिव्यक्ति की आजादी का नाम जपने वालों की पहली पसंदीदा लाइन है। और ये जायसी की उपज है। उनके मासूमियत भरे इस तर्क में उनकी मक्कारी छिपी हुई है। दरअसल वो इतिहास को कभी ढाल बना लेते हैं और कभी इसका तलवार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। और इसकी वजह सिर्फ एक देश से नफरत और उसको खत्म करने की हद तक जाकर आत्मलीनता। ऐसा नहीं है कि उनको इतिहास की जानकारी नहीं है बल्कि इससे उलट उनको इतिहास की आम आदमी से ज्यादा जानकारी है। और वो जानते है कि पद्मावती इतिहास की किताबों से भी आगे गांव-देहात और भाषा के दरियाओं को पार कर लगभग देश के हर इलाकों में किस्सों में गाई जाती है।

पद्मावती विवाद कथा-दो

स्वांग और लोकगीतों में सती पद्मावती के किस्से हैं। आजादी की जिस लड़ाई के दम पर देश को गालियां देने में जुटे अभिव्यक्ति के ये व्यापारी मस्त हैं, उसकी लड़ाई में महिलाओं को शामिल करने के लिए जो लोकगीत गाए जाते रहे हैं, उनमें भी पद्मावती का बड़ा उल्लेख होता रहा। और अगर इन विद्वानों की बातों को इसी तरह स्वीकार किया जाए तो आजादी की पूरी लड़ाई और मध्यकाल के उस अंधेरे काल के दौरान गांव-गांव में धार्मिक अत्याचारों के सामने थोड़ा बहुत साहस बचाने में लगी स्त्रियों के गीतों को भी झूठ मान लेना चाहिए। और बात अगर सिर्फ इतिहास में रखें तो फिर ये भी देखना चाहिए कि इन अभिव्यक्ति के दीवानों ने इतिहास को सही से रखा या नहीं। उसको पवित्र मानने की जिस जिद का हवाला आजकल दे रहे हैं, उस इतिहास को आम जनता से बचा कर रखने की कोशिश क्यों की गई।

अभी एक जेहादी मानसिकता के साथ अभिव्यक्ति में लीन एक महिला पत्रकार का ट्वीट देख रहा था कि अलाउद्दीन एक ऐसा बादशाह हुआ है, जिसने हिंदुस्तान को एक किया है। ये हैरान कर देने वाला ट्वीट था। खैर बात वहीं से शुरू करते है कि भंसाली का नायक अलाउद्दीन डर के शाहरूख खान की तरह से नायक बन कर निकलेगा लेकिन मैं इतिहास के पन्नों से कुछ लाइनें निकाल कर शेयर कर रहा हूं।

“सुल्तान ने बुद्धिमानों को उन अधिनियमों तथा कानूनों को तैयार करने के विषय में आज्ञा दी जिनके द्वारा हिंदुओं को दबाया जा सके और धन संपत्ति, जो कि विद्रोह तथा उपद्रव की जड़ है , उनके घरों में शेष न रहने पाएं। खूत तथा बलाहर, खिराज (भूमिकर) अदा करने में एक नियम का पालन करें और निर्बल लोगों को धनधान्य वाले लोगों के जगह पर खिराज न देना पड़े। हिंदुओं के पास इतना शेष न रह जाए कि वे घोड़ों पर सवार हो सकें, हथियार लगा सकें, अच्छे वस्त्र पहन सकें तथा निश्चिंत होकर आराम से जीवन व्यतीत कर सकें”। ( तारीख फिरोजशाही- बरनी, पेज 68 )

सभी गांवों से करही तथा चराई वसूल होने लगी। इस कार्य को इतने सुव्यवस्थित ढंग से किया कि चौधरियों, खूतों और मुक्दमों में विरोध, विद्रोह, घोड़े पर सवार होना, हथियार लगाना, अच्छे वस्त्र पहनना, तथा पान खाना पूर्णतया बंद हो गया। खिराज अदा करने के विषय में सभी एक आदेश का पालन करते थे। वे इतने आज्ञाकारी हो गये कि दीवान का एक चपरासी कस्बों के बीसियों खूतों मुक्दमों और चौधरियों को एक रस्सी में बांधकर खिराज अदा करने के लिए मारता पीटता था। हिंदुओं के लिए सिर उठाना संभव न था। हिंदुओं के घरों में सोने चांदी , तनके और जीतल तथा जन संपत्ति का चिन्ह भी न रह गया था। दरिद्रता के कारण खूतों और मुकद्मों की स्त्रियां मुसलमानों के घर जाकर काम करने लगीं और मजदूरी पाने लगी। ( पेज 69)

अब काजी मुगीसुद्दीन के साथ एक संवाद भी है जो काफी विवादित रहा था लेकिन बर्नी ने इसको बाकायदा अपनी किताब में दर्ज किया है।

सुल्तान अलाउद्दीन ने काजी मुगीस से पहला मसला ये पूछा कि “हिंदू खिराज गुजार और खिराज देह के विषय में शरा कि क्या आज्ञा है।” ?
काजी ने उत्तर दिया कि “हिंदू खिराजगुजार के विषय में शरा की यह आज्ञा है कि जब दीवान का कर वूसल करने वाला उससे चांदी मांगे तो वह बिना सोचे-विचारे और बड़े आदर-सम्मान तथा नम्रता से सोना अदा कर दे।
यदि कर वसूलने वाला उसके मुंह में थूकना चाहे तो वह बिना किसी आपत्ति के मुंह खोल दे जिससे वह मुंह में थूक सके। उस दशा में भी वह कर वसूलने वाले की आज्ञाओं का पालन करता रहे। इस प्रकार अपमानित करने, कठोरता प्रकट करने तथा थूकने का ध्येय यह कि इससे जिम्मी का अत्याधिक आज्ञाकारी होना सिद्ध होता रहे। इस्लाम का सम्मान बढ़ाना बहुत आवश्यक है। दीन को अपमानित करना बहुत बुरा है। खुदा उनको अपमानित करने के लिए इसी तरह से कहता है विशेषकर हिंदुओं को अपमानित करना दीन के के लिए अत्यावश्यक है कारण कि वे मुस्तफा के दुश्मनों में सबसे बड़े दुश्मन है। मुस्तफा अलैहिस्सलाम ने हिंदुओं के विषय में ये आदेश दिया है कि उनकी हत्या करा दी जाए। उनकी धन संपत्ति लूट ली जाए या उनको बंदी बना दिया जाए। या तो उनसे इस्लाम स्वीकार कराया जाएं या फिर उनकी हत्या करा दी जाए और उनकी धन संपत्ति छीन ली जाए। “

और ये कारनामे भी दया का हिस्सा हैं क्योंकि बाकि सब फिरकों के बारे में भी काजी मुगीस ने इस संवाद में बताया कि क्यों ये हिंदुओं के लिए दया है।

“इमामें आजम अबू हनीफा के अतिरिक्त जिनके हम अनुयायी हैं (बाकि तीन शाफईस मालिकी और हमबली ) अलावा किसी ने भी हिंदुओं से जजिया वसूल करने की आज्ञा नहीं दी है। दूसरों ने इस प्रकार की कोई रवायत नहीं लिखी है। उनके आलिम हिंंदुओं के विषय में केवल ये आदेश देते हैं कि या उनकी हत्या कर दी जाए या फिर उनसे इस्लाम स्वीकार कराया जाए।”

अब उन मोहतरमा और अभिव्यक्ति के दीवानों के नायक का जवाब भी सुन लेना चाहिए।

“ए मौलाए मुगीस , तू बड़ा बुद्धिमान है किंतु तुझे कोई अनुभव नहीं। मैं पढा़ लिखा नहीं किंतु मुझे अनुभव प्राप्त है। तू समझ ले कि हिंदू उस वक्त तक मुसलमान का आज्ञाकारी नहीं होता जबतक कि वह पूर्णतया निर्धन या दरिद्र नहीं हो जाता। मैंने यह आदेश दे दिया है कि प्रजा के पास केवल इतना धन रहने दिया जाए कि वह प्रत्येक वर्ष कृषि तथा दूध और मट्ठे के लिए प्रर्याप्त हो और वे धन संपत्ति एकत्रित न कर पाएं। ”


dhirendra pundhirधीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंडीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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