सहमी सांसों के लिए आपको नहीं चुना नीतीशजी

सहमी सांसों के लिए आपको नहीं चुना नीतीशजी

सुदीप्ति

nitish biharहाल ही में एक खबर मिली। ननिहाल की पड़ोस का एक लड़का अपना एक छोटा-सा काम करते हुए मारा गया। उसका काम ए टी एम मशीन में पैसा डालने का था। वो पैसे ले जाने का ज़ोखिम भरा काम कर रहा था। पीछे अपराधी लग गए। नौकरी और जान बचाते हुए जब वह भागा तो उन्होंने गोली चला दी। पैसे उठाए और चलते बने।

और वह जो मारा गया, पाँच बेटियों के बाद हुआ बेटा था। हम सब तो उसके माँ- बाप को बड़ी हिकारत से देखते, उनकी पिछड़ी सोच पर तरस खाते थे। आज क्या करें? दिलासा दें? किस हिम्मत से?

बरसों पहले देखा था उसे। स्कूल जा रहा था। उसी सफ़ेद-नीली स्कूल ड्रेस में, याद है। माँ बताते हुए रो दे रही है। इसी साल सरस्वती पूजा के चंदा के लिए आया और कैसा मिठबोलिया था। ‘था’- जब आप बीस साला नौजवान के लिए ऐसे था का इस्तेमाल करते हैं, छाती फटती नहीं आपकी?

नीतीश जी आपने पिछले दो टर्म में खूब सब्ज़-बाग़ दिखाए। नतीजा यह निकला कि बिहार के युवा छोटी-मोटी नौकरियों के लिए पलायन करने की जगह बिहार में ही उग आई छोटी-मोटी निजी नौकरियों की पौध पर टिकने लगे। शान से कहते थे- जब वही 10-12 हज़ार गाँव-घर में मिल जाते तो दिल्ली-बॉम्बे भागने की क्या जरुरत? ऐसी बढ़िया बातें करते ये युवा मन को भाते भी थे।

पर आपका यह तीसरा टर्म इन युवाओं के बुजुर्ग माँ-बाप पर बहुत भारी गुज़र रहा है। आपके लिए बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन हम सब जो अपने गाँवों में आये बदलाव को देखते हुए सोच रहे थे कि इस पलायन को छोड़ अपने यहाँ कुछ करते हैं। इन छोटी-छोटी घटनाओं से दहल जाते हैं।

हम जब बिहार में अपराध की बढ़ती घटनाओं की बात करते हैं, जब अपराधियों को मिल रही खुली छूट पर बात करते हैं तो ‘सच्चे’ सेक्युलरों की नज़र में सांप्रदायिक ही नहीं इस्लामोफोबिक भी हो जाते हैं। धर्म देश के हर हिस्से में, हर जगह अपराधियों को ढंकने और बचाने का ऐसा सरल उपाय तो कभी नहीं था।

एक साल भी नहीं हुए जब बिहार में नीतीश की लालू संग हुई वापसी पर कई दोस्तों से हमारी झड़प हुई थी। तब लगा कि सांप्रदायिक राजनीति को सबक सिखाने वाले इस मतदान पर आक्षेप है। आज लगता है वे लोग ग़लत नहीं थे।
और यह इसलिए नहीं लिख रही हूँ कि परिचित बच्चा मारा गया, इसलिए नहीं कि किसी करीबी ने सब देखा और झेला है, इसलिए कि यह बढ़ रहा है। उन दिनों की वापसी हो गयी है कि जब तक पिता घर नहीं आते चैन नहीं पड़ता। इस आशंका और डर में रखने के लिए नहीं चुना है लोगों ने, आपको नीतीश जी।


sudipti-profileसुदीप्ति। जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर। बिहार के महाराजगंज की मूल निवासी। इन दिनों राजस्थान के मेयो कॉलेज में प्राध्यापिका। किसी भी मुद्दे पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखती हैं।

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