पुष्यमित्र

जेपी आंदोलन का नाम लेते ही 70 के दशक में युवा रहे आजकल के नेता अपने संघर्षों की कहानियां सुनाने से खुद को रोक नहीं पाते । आखिर सुनाएं भी क्यों ना जेपी आंदोलन की बदौलत ही तो आज ये लोग नेता बन पाए या यूं करें कोई मंत्री हैं तो कई मुख्यमंत्री । लेकिन यहां हम जिक्र ऐसे लोगों की नहीं कर रहे जो सिर्फ जेपी आंदोलन की पगडंडी पकड़कर सियासत की सीढ़ियां चढ़ते गए और भुलते गए जेपी बताए उपदेशों, समाज के लिए दायित्व और कर्तव्यों को । खैर कुछ ऐसे लोग आज भी हैं जो सियासत में तो नहीं हैं, लेकिन जेपी आंदोलन से निकलकर समाजसेवा के लिए ही अपना जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक शख्स जब पत्रकार पुष्यमित्र से मिलने आए तो उनके बारे में पुष्यमित्र लिखने से खुद को रोक नहीं पाए।

ौौ1ौवे दोपहर दो बजे के करीब मुझसे मिलने आये थे। हाथ में एक दर्जन पन्ने की प्रेस रिलीज थी। हालांकि मैं किसी बीट का रिपोर्टर नहीं हूं, मगर कई दफा लोग मुझे भी रिलीज देने पहुंच जाते हैं. चुकि यह मामला चंपारण से जुड़ा है, इसलिए भी उन्हें लगा कि इस मामले में मेरी रुचि होगी। उनकी धारणा थी कि मैं भी चंपारण का ही रहने वाला हूं। मगर मेरी रुचि उनमें बढ़ने लगी। पॉलिस्टर का पुराना मुड़ा हुआ कुरता और पुरानी सी पैंट पहने और कांख में एक छोटा सा मैला-कुचैला बैग टांगे यह व्यक्ति चंपारण के भूमिहीनों और किसानों की लड़ाई लड़ रहे हैं. इनका नाम निर्मल चंद नंदी है। ये चंपारण भूमि अधिकार आंदोलन समूह के संयोजक हैं। इन्होंने रिलीज मेरे हाथ में थमा कर कहा कि आपकी बहुत तारीफ सुनी थी पंकज जी से, आज मुलाकात हो गयी। अनायास ही मेरी नजर अपने कपड़ों, घड़ी और मोबाइल पर पड़ने लगी. मैं संकोच से गड़ा जा रहा था। एसी दफ्तर में बैठकर ज्ञान हांकने वाले एक औसत इंसान की लगभग मेरी जितनी उम्र से गरीबों की लड़ाई में झोंक चुका इंसान तारीफ कर रहा है. आखिर मैंने किया ही क्या है।

निर्मल चंद नंदी जी ने बताया कि वो जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे थे। बाद में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़े और अपने दूसरे साथियों की तरह तय किया कि राजनीति से दूर रहकर समाज की लड़ाइयां लड़ेंगे। इस सिलसिले में दो-ढाई साल बोधगया मठ की जमींदारी के आंदोलन में भी जुटे रहे। जहां इन लोगों ने 14 हजार एकड़ से अधिक जमीन मठ के कब्जे से छुड़ाई और गरीबों में बंटवाया। उस आंदोलन में पहली बार बिहार में जमीन महिलाओं के नाम से बांटी गयी। फिर वे पंकज जी, चंपारण के सत्याग्रही के साथ आ जुटे। तब से चंपारण के जमीनी सवाल से जुड़े हैं। इस दौर में जब जेपी का थैला ढ़ोने वाले लोग मंत्री और मुख्यमंत्री बनते रहे हैं, जेपी का कोई सिपाही इस हाल में हो, यह मैं सोच नहीं पा रहा था। छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के भी कई सदस्यों से मिल चुका हूं, वे जमीनी लड़ाई लड़ते रहे हैं। मगर ज्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक ठाक है। नंदी जी आज भी हर आंदोलन में झोला ढ़ोने वाले किसी सिपाही जैसे हैं। इन्हें जेपी पेंशन भी नहीं मिलता, क्योंकि वे मीसा एक्ट के तहत जेल नहीं गये थे, इमरजेंसी के दौरान सत्याग्रही के रूप में जेल गये थे।

कभी सोचा नहीं, अपने लिए परिवार के लिए। पूरी उम्र गुजार चुके हैं दूसरों की लड़ाई लड़ने में? जवाब में कहते हैं, यही अपनी कमाई है। बच्चों के लिए यही छोड़ जाऊंगा। पत्नी ब्यूटी पार्लर चलाती है, उसी के पैसे से घर चलता है। बच्चे बड़े हुए उसी की कमाई से। अब बच्चे भी कहीं न कहीं कमाने लगेंगे। पत्नी ने कह दिया कि तुम दुनिया को देखो, घर देखना मेरा काम है। बच्चों ने कह दिया कि आप लोगों का काम कीजिये, जो पुण्य आपके हिस्से आयेगा उसी से काम चलायेंगे।

आज के जमाने में ऐसा होता है क्या? कैसा घर है नंदी जी का। कहां से ऐसी पत्नी, ऐसे बच्चे मिले। और ऐसा स्वभाव कि कभी इस बात पर ध्यान नहीं जाता कि पॉलिस्टर के बदले खादी का ही कुरता होता। पैसे नहीं होते, मगर मंचों पर बुला कर सम्मानित किया जाता। समाज सेवा के अवार्ड मिलते, तारीफें होतीं। कोई मैग्सेस अवार्ड मिल जाता, पद्मश्री हो जाते, नहीं, कहते हैं, लोगों का काम हो जाये यही उनका अवार्ड है। जेपी ने जो शपथ दिलाई है उसे ताउम्र निभाना है। 64-65 साल के हो गये हैं। मगर रिटायर होने का भी इरादा नहीं हैं। जब तक जिंदा हैं, तब तक काम करना है। लोगों का, अपना नहीं। ऊपरवाला किस फैक्ट्री में ऐसे लोगों को बनाता है?


PUSHYA PROFILE-1पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।