ब्रह्मानंद ठाकुर

कश्मीर घाटी आज आतंकवाद की मार झेल रही है । एक तरफ आतंकवाद और दूसरी तरफ सियासी चालबाजी में कश्मीर की आवाम बुरी तरह पिस रही है और उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है । हर कोई कश्मीर मसले को अपने-अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है । लेकिन किसी को ना तो कश्मीरियत की फिक्र है और ना ही कश्मीर की चिंता । अलगाववादी कश्मीर को बांटने की बाते करते हैं तो हमारे सियासत दां कश्मीरियत को तोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं । लिहाजा कश्मीरियों का दर्द वही समझ सकता है जो कश्मीरियों के बीच  रहता हो ।

जब भी कश्मीर से बासर जाता हूं और किसी को मुस्कुराते देखता हूं तो मुझे तीस साल पहले का कश्मीर याद आ जाता है। पिछले तीन दशक में कश्मीरी जनता के चेहरे से हंसी गायब है। आतंकवाद के नाम पर प्रतिदिन 3-4 युवक शहीद हो रहे हैं। खुद मेरा तीन बार अपहरण हो चुका है और आज मैं जिन्दा हूं, आपके सामने हूं। ये बातें ‘ सिसकियां लेता स्वर्ग ‘ पुस्तक के लेखक निदा नवाज ने मुजफ्फरपुर में अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में कही।  उन्होंने कहा- कि धार्मिक कट्टरवाद और घटिया राजनीति आज पूरी तरह घुल-मिल गई है, इसी का यह परिणाम है। कश्मीर के आतंकवाद को ब्लैक एन्ड ह्वाइट में नहीं देखा जा सकता। संजीदगी से कोई नहीं चाहता कि घाटी से आतंकवाद का जड़ मूल से खात्मा हो सके। डाक्टर नवाज ने आगे कहा कि कश्मीर घाटी की परिस्थितियों के साथ हमेशा एक बड़ी विडंबना यह रही है कि इनको पूरी तरह से किसी ने भी चिह्नित नहीं किया। हमारे देश का मीडिया कश्मीर के हालात को दर्शाते समय ‘राष्ट्र हित का छौंक पहले लगाता है और कभी भी गृहमंत्रालय की प्रेस विज्ञप्तियों से आगे नहीं निकलता। सुरक्षाबलों की तरफ से हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन को देश भर में बढ़ा-चढा कर प्रस्तुत तो किया जाता है जबकि फर्जी झड़पों, एजेन्सियों की ड्रामेबाजियों और पुलिस की ज्यादतियों को कोई हमेशा नजर अंदाज किया जाता रहा है । आज कश्मीर घाटी की परिस्थितियों को लेकर जो दृश्य देश के आम आदमी के दिमाग में उभरता है, वह हमारी मीडिया और देश भर में फैले कट्टरवादी संगठनों के उस प्रचार पर आधारित है जो कश्मीर को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। डाक्टर निदा नवाज ने अपने सम्बोधन के दौरान अपनी कविता विस्थापन और मैं उस सड़क में रहता हूं का भी जिक्र किया ।

निदा नवाज को उनकी पुस्तक ‘ सिसकियां लेता स्वर्ग ‘ के लिए इस साल का अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान से नवाजा गया है । डाक्टर वीर भारत तलवार, डाक्टर रवीन्द्र कुमार रवि और डाक्टर वीरेन नन्दा की त्रिसदस्सीय समिति ने इसबार 11 वें अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान देने का फैसला किया था । जिसके लिए आज बिहार के मुजफ्फरपुर में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया । इस समारोह में बनारस से आए डाक्टर कमलेश वर्मा ने कहा कि पुरस्कार चयन समिति ने सिसकियां लेता स्वर्ग को अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति पुरस्कार के लिए चयन कर हिन्दी को कश्मीर तक पहुंचाने का काम किया है। 26 अध्यायों वाली डायरी नुमा इस पुस्तक में 14 मार्च 1991 से 9 जनवरी 1915 तक का कश्मीर का घटनाक्रम व्योरेवार लिखा गया है। इसमें कश्मीर का 24 सालों का इतिहास दर्ज है। इस पुस्तक को पढ़कर वहां का इतिहास समझा जा सकता है। इस आत्मकथ्य परक डायरी में लेखक ने जो भोगा है, वही लिखा भी है। इसतरह इसे 24 सालों में कश्मीर में घटने वाली घटनाओं का प्रमाणिक दस्तावेज कहा जा सकता है। यह कश्मीर के आम आदमी को केन्द्र में रख कर लिखा गया है। लेखक की चिंता कश्मीरियत को बचाने की है।
पटना से आए कवि, लेखक ध्रुव गुप्त ने कहा कि वे खुद कश्मीर के बारे में कम जानते हैं लेकिन सिसकियां लेता स्वर्ग पढ़कर लगा कि यह एक मर्मभेदी डायरी है। यह दुखद है कि कश्मीर आज हमारे साथ नहीं है। यह भौगोलिक रूप से तो हमसे जुड़ गया लेकिन भावनात्मक रूप से आज भी अलग है। हमने कश्मीर को सेना के हवाले कर दिया लेकिन सेना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। आज देश की जनता मान रही है कि कश्मीर हमारा है लेकिन तमाम कश्मीरियों का झुकाम कुछ ना कुछ पाकिस्तान की तरफ जरूर है इसकी वजह चाहे जो भी हो लेकिन हमें इस सोच को बदलने की जरूरत है। आपसी मेल-मिलाप और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से यह सम्भव है। यह काम लेखक और संस्कृतिकर्मी ही सफलता पूर्वक कर सकते हैं।
सम्मान सम्मारोह को सम्बोधित करते हुए सम्वेद और सबलोग पत्रिका के सम्पादक किशन कालजयी ने कहा कि आज पुरस्कार का मायने बदल गया है, लोग कहते हैं कि साहित्यकारों को पुरस्कार के लिए जुगाड़ बैठाना पडता है। पुरस्कार का मतलब यदि जुगाड़ हो तो उसका महत्व घट जाता है। निदा नवाज को अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति पुरस्कार के लिए चयन कर समिति ने एक नई ऊंचाई पायी है। पिछले दस बर्षों में दस नामचीन साहित्यकारों, कृष्ण बलदेव वैद्य, (2008 ), अखिलेश (2009), शेखर जोशी (2010), तुलसी राम (2011), डाक्टर रोज केरकेट्टा (2012), अनिल यादव (2013), सुधीर विद्यार्थु (2014), विनय कुमार (2015), पंकज विष्ट (2016), वाल्टर भेंगरा तरुण (2017) को अयोध्याप्रसाद खत्री स्मृति सम्मान से नवाजा जा चुका है । 2018 का सम्मान पाने वाले डाक्टर निदा नवाज जान जाने की परिस्थितियो में लेखन किया है। समारोह का संचालन अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक डाक्टर वीरेन नन्दा और धन्यवाद ज्ञापन कामेश्वर प्रसाद ने किया । इस अवसर पर डाक्टर पूनम सिंह, आरती कुमारी, डाक्टर नन्द किशोर नन्दन, कुंदन कुमार, नदीम खान, निलेश मिश्रा, सीमा नन्दा, शशिकांत झा समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार, प्राध्यापक, बुद्धजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे ।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।