बदलाव प्रतिनिधि, मुज़फ़्फ़रपुर

अमेरिका के शिकागों में स्वामी विवेकानंद के जिस ओजस्वी वक्तव्य ने पूरी दुनिया को हिंदुस्तान का मुरीद बना दिया था आज उसी भाषण के 125 साल पूरे हो गए । इस मौके पर दिल्ली से लेकर बिहार तक हर तरफ विवेकानंद को याद किया गया । दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम मोदी ने विवेकानंद की याद में आयोजित कार्यक्रम में विवेकानंद के विचारों को देश के युवाओं के सामने रखा, लेकिन सवाल ये है विवेकानंद के विचार महज तालियां बटोरने के लिए थे या फिर उन्होंने जिस बात के लिए भारत की तारीफ आज से 125 साल पहले की क्या आज के भारत में उन विचारों को आगे बढ़ाने की कोई कोशिश की जा रही है ।

हम ये बात इस लिए कर रहे हैं क्योंकि अपने भाषण के बीच में विवेकानंद ने कहा था- मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिकता ग्रहण करने का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे बेहद गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मो के अस्वस्थ और अत्याचारित लोगों को शरण दी है।

लेकिन आज के हिंदुस्तान में क्या हो रहा है, हमारे समाज में सहनशीलता घटती जा रही है, अत्याचार और अनादर बढ़ता जा रहा है । धर्मों के प्रति द्वेष बढ़ रहा है, संविधान से ज्यादा धर्म को महत्व दिया जा रहा है । विवेकानंद जिस दौर में थे उस वक्त हिंदुस्तान संवैधानिक देश नहीं बल्कि एक गुलाम भारत था, लेकिन आज हिंदुस्तान लोकतांत्रिक देश है जहां सबसे बड़ा धर्म संविधान है, हिंदू या मुसलमान नहीं फिर भी कुछ लोग धर्म और आस्था के नाम पर इंसान की जान लेने में भी पीछे नहीं रहते और देश का प्रधान सेवक महज आंसू बहाने के सिवाय कोई और कदम नहीं उठाता, ऐसे में हम एक भारत, श्रेष्ठ भारत और विश्वगुरु भारत की बात करते हैं, सुनने में ये जरूर अच्छा लगता है लेकिन आज के दौर में उसकी कितनी एहमियत है ।

इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशने के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया । परिचर्चा का विषय रखा गया, “वर्तमान परिवेश में विवेकानंद के विचारों की प्रासंगिकता” । सेवानिवृत शिक्षक ब्रह्मानंद ठाकुर की अध्यक्षता में हुई इस परिचर्चा में हिस्सा लेने आए प्रभात ख़बर के संपादक शैलेंद्र कुमार ने लोगों को बताया कि कैसे गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत का एक युवा आज से 125 साल पहले अपने विचारों से पूरी दुनिया का दिल जीत लिया था ।

परिचर्चा में शिरकत करने आए वरिष्ट साहित्यकार डॉ संजय पंकज ने कहा कि स्वामी जी केवल मनुष्य मात्र नही थे । 40 वर्ष की उम्र में उन्होंने जो कर दिखाया वह आज तक कोई नहीं कर सका । यानी आपके विचार और आपकी वाणी एक समान रहे तो आप अपने विरोधियों पर भी राज कर सकते हैं जैसा कि स्वामी जी ने किया । यही वजह रही कि जिस स्वामी विवेकानंद को महज दो मिनट बोलने का समय निर्धारित किया गया था उनका भाषण खत्म होने के बाद 5 मिनट तक सिर्फ तालियों की गड़गड़ाहबट सुनाई दी ।

समाजसेवी सह संस्कृतिकर्मी नीरज नयन ने कहा कि आज भी भारत के युवाओ के लिए स्वामी जी आदर्श और प्रेरणा के स्रोत हैं। बदलाव प्रकृति का नियम है। समय के साथ बहुत कुछ बदला है, लेकिन नहीं बदला है तो वह है  हमारी संस्कृति, संस्कार, विचार। हिंदुस्तान भारत से इंडिया बना। उसके बाद भी आज हमारी संस्कृति कायम है और यही हमारी ताकत भी है ।इस मौके पर मों इकबाल अहमद, मनोज कुमार, दीपक साह, शंकर कुमार चौधरी, ब्रजभूषण मिश्रा, हरेंद्रनाथ तिवारी, रामकिशोर चौधरी, नरेश साह, मो0 कलाम, रेखा कुमारी, कस्तूरबा विद्यालय की वार्डेन रूबी गुप्ता, विन्देश्वर राय, विमलेश ठाकुर ने भी अपने विचार रखे ।

आखिर में शिकागो सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद के वक्तव्य का कुछ हिस्सा आप भी पढ़िये ।

“अमेरिका के बहनों और भाइयों

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय प्रसन्नता से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्रचीन संत परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मो की जननी की तरफ से धन्यवाद कहूंगा और सभी जात, संप्रदाय के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की तरफ के आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं।

मेरा धन्यवाद उन वक्ताओं के लिए भी है, जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिकता ग्रहण करने का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे बेहद गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मो के अस्वस्थ और अत्याचारित लोगों को शरण दी है।

मुझे यह बताते हुये बहुत गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय से उन इजराइलियों की स्मृतियां संभाल कर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़ कर नष्ट कर दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे गर्व इस बात का है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें प्यार से पाल-पोष रहा है।

भाइयों, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा, जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है।

रुचीनां वैचित्र्याटृजुकुटिलनानापथजुषाम्

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामवर्ण इव।

(जैसे विभिन्न नदियां अलग-अलग  स्रोतों से निकल कर समुद्र में मिल जाती हैं। ठीक उसी प्रकार अलग-अलग रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते जानेवाले लोग अंत में भगवान में ही आकर मिल जाते हैं)

यह सभी जो अभी तक के सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है। स्वत: ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्

मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:

(जो कोई मेरी ओर आता है, वह चाहे किसी प्रकार का हो। मैं उसको प्राप्त होता हूं। लोग अलग-अलग रास्तों द्वारा प्रयत्न करते हुए अंत में मेरी ओर आते हैं।)

सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और इसके भयानक वंशज लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजे में जकड़े हुये हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी ही बार यह भूमि खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं को विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुये हैं। अगर ये भयानक दैत्य नहीं होते, तो आज मानव सभ्यता कहीं ज्यादा उन्नत होती, लेकिन अब समय पूरा हो चुका है।

मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वो तलवार से हों या कलम से। सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा। इसे सुन विश्व धर्म सम्मेलन में मौजूद लोग तालियों की गड़गड़ाहट से स्वामी जी का स्वागत किया।