शराब के लिए ‘बाइपास’

शराब के लिए ‘बाइपास’

लोगों से मिलते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड।

उत्तराखंड सरकार द्वारा 64 स्टेट हाई वे जिला सडक में बदलने का नोटीफिकेशन सर्वोच्च न्यायालय की आखों में धूल झौंकना तो है ही, प्रत्यक्षरुप से शराब माफिया के हितों का संरक्षण और जनता की जेब में डाका डालने, स्वास्थ्य को जानबूझ कर बिगाडने, सामाजिक माहौल खराब होने को दावत देना है । जिन चिंताओं को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल व स्टेट हाई वे से शराब की दुकानें हटाने का निर्देश दिया था, उन चिन्ताओं को नजरअंदाज करने का काम उत्तराखण्ड सरकार ने किया है । उत्तराखण्ड में राजस्व का रोना रोकर शराब को प्रोत्साहन ही बल्कि राजस्व पर अर्थ व्यवस्था की निर्भरता बताने वाली निर्लज्ज सत्ता को आधी आवादी के सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है। नोटीफिकेशन के यथावत रहने वाली 155 शराब ठेकों से 300 करोड रुपए राजस्व की बात कही जा रही है, ये मान लिया जाय कि 300 करोड सरकार को राजस्व देने वाले शराब माफिया को उन होने वाली दुर्घटनाओं, बिमारियों, सामाजिक व आर्थिकी को नुकसान करने का पूरा लाइसेंस नहीं मिल गया। सरकार को दिये जाने वाले राजस्व के बदले माफिया क्या 10 गुना नहीं कमायेगा और यह लूट परिवार के उन दुश्मनों की जेब से ही आयेगी जिस जेब से घर-परिवार, बच्चों के खान-पान, चिकित्सा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, शिक्षा- दीक्षा पर खर्च करना था ।

सत्ता चाहे कांग्रेस ती हो या भाजपा की वह माफिया हितों की संरक्षक रही है । क्या कारण है कि उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा चमोली, रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी जिलों में शराब की दुकान बन्द करने के निर्णय के विरुद्ध सरकार सर्वोच्च न्यायालय जाकर स्थगनादेश लाती है लेकिन विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति व अस्पतालों में चिकित्सकों की नियुक्ति पर मौन साध लेती है ? अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर वे फुटबाल बने हैं लेकिन सरकार आश्वासन की घुट्टी के अलावा कुछ नहीं करना चाहती। बच्चों की पढाई और शिक्षण माहौल की चिन्ता नहीं है। उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है और रिकार्ड तोड से बहमुत से आयी भाजपा को उसे अच्छा प्रदेश बनाने से यदि कोई रोकता है तो उसके निहित स्वार्थ हो सकते हैं, उसकी जनता के प्रति प्रतिबद्धताओं का आभाव हो सकता है और सबसे अधिक उस जनता को ठेंगा दिखाने का दु:साहस है जिसके बूते सत्ता मिली है।

सरकारों के भरोसे रहने के बजाय जनता को अपने बूते शराब के खिलाफ कमर कसनी होगी और वर्तमान आंदोलन को संगठित आन्दोलन में तब्दील करना होगा। शाराब के खिलाफ जो भी आन्दोलन हुए वे सरकार के निर्णयों के खिलाफ रहे हैं और आन्दोलन के दबाव ने कई बार शराबबन्दी करने को बाध्य किया है। एक बार फिर सरकार जन आन्दोलन को आमंत्रण दे रही है जनता को शराब से मुक्ति के लिए यह चुनौती स्वीकारनी होगी।


पुरुषोत्तम असनोड़ा। आप 40 साल से जनसरोकारों की पत्रकारिता कर रहे हैं। मासिक पत्रिका रीजनल रिपोर्टर के संपादक हैं। आपसे  purushottamasnora @gmail.com या मोबाइल नंबर– 09639825699 पर संपर्क किया जा सकता है ।

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